किसके लिए बन रहा है आजमगढ़ अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा

अपर्णा

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पहला हिस्सा 

आज़मगढ़ में बनाए जानेवाला मंदुरी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा कई विडंबनाओं का शिकार हो चुका है। अब न केवल उसके औचित्य पर सवालिया निशान लग रहा है बल्कि उसके लिए भूमि अधिग्रहण करने के सरकारी तौर-तरीके पर भी गंभीर सवाल हो रहे हैं। आधी रात को पुलिस-पीएसी के साथ ज़मीन की पैमाइश करने जाना और ऐतराज करने पर महिलाओं और बुजुर्गों पर बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज करना तथाकथित रामराज्य की नीयत की कालिमा ज़ाहिर करता है। इसके बाद ड्रोन से सर्वे करना और अखबारों में लगातार यह बयान छ्पवाना कि हमने सर्वे करके ऊपर भेज दिया है और वहाँ से आदेश आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं भी एक धमकी के मनोविज्ञान के साथ काम करना है। आजमगढ़ के सांसद दिनेश लाल यादव निरहुआ का खुलेआम योगी आदित्यनाथ के कड़क शासन का हवाला देते हुये स्वयं को चुननेवाली जनता को मनबढ़ और अपराधी कहकर ठीक कर देने को धमकाना उत्तर प्रदेश शासन की उस मंशा का ही नंग-प्रदर्शन है कि मौका मिलते ही किसानों को मारपीट कर ज़मीनें ले ली जाएंगी और कोई कुछ नहीं कर पाएगा।

यह संविधान का खुलेआम उल्लंघन है। बल्कि यह कहना ज्यादा सही है पूरी की पूरी प्रक्रिया ही संविधान विरोधी है। आजमगढ़ के एक अधिकारी से जब मैंने पूछा कि क्या ज़मीन लेने की प्रक्रिया के पहले की शर्तों को आप लोग फॉलो कर रहे हैं तो उन्होंने कहा कि हमारा काम शासनादेश को लागू करना और उसमें आनेवाली बाधाओं को हटाना है। मैंने फिर कहा लेकिन मेरा मतलब है कि क्या आपलोग भू अधिग्रहण अधिनियम 2013 को फॉलो कर रहे हैं? वह तो संसद ने पास किया है। इस पर उन्होंने कुछ कहने के लिए मुंह खोला लेकिन मेरे हाथ में अधिनियम की कॉपी देखकर बगले झाँकने लगे।

मुझे यह जानकर दुख और आश्चर्य हुआ कि हवाई अड्डे के लिए जानेवाले आठ गाँवों में अनेक लोग यह मानकर चल रहे हैं कि ये गाँव ले लिए जाएँगे और करीब साढ़े चार हज़ार परिवारों को आशंका है कि आगे क्या भविष्य होगा? मुट्ठी भर ऐसे लोग भी हैं जिनके पास बहुत ज्यादा ज़मीनें हैं वे आजमगढ़ शहर में बसने अथवा स्थानीय इलाकों में व्यावसायिक संभावनाओं के अनुसार कुछ नया करने का सपना देख सकते हैं लेकिन बहुत बड़ी तादाद ऐसे लोगों की है जिनके पास अपने घर के अलावा कुछ नहीं है। उनकी यह चिंता बहुत गहरे तक बेधने वाली है कि यहाँ से उजड़ेंगे तो कहाँ जाएंगे?

जमुआ हरीराम गाँव की सड़कें विकास की बात खुद-ब-खुद कह रही हैं

ऐसे तकरीबन चार हज़ार परिवार हैं जिन्होंने तिनका-तिनका जोड़कर अपना घर बनाया है। किसी-किसी के घर में पलस्तर भी नहीं हुआ है तो किसी का दरवाजा टिन के पतरों से बना है। ये ज़्यादातर दलित और पिछड़े परिवार हैं। ये लोग इन्हीं गाँवों के सम्पन्न लोगों के खेतों में मजदूरी करते हैं। जमुआ हरिराम के प्रवेश निषाद ने कहा कि ज़्यादातर दलित पुरुष मंदुरी बाज़ार में आनेवाले गिट्टी-बालू उतारने का काम करते हैं। महिलाएं खेतों में काम करती हैं। आप देख रही होंगी कि पुरुष काम करने जाता है तब महिलाओं को आंदोलन में जाने का मौका मिल पाता है। अगर दोनों लोग आंदोलन में जाएंगे तो चूल्हा जलना मुश्किल हो जाएगा।’

हवाई अड्डे के विरोध में खिरिया बाग में चल रहे धरना-आंदोलन में महिलाओं की उपस्थिति और सहभागिता उल्लेखनीय बनी हुई है। ये वे महिलाएं हैं जो अपने घर के बहाने उन लोगों को भी उजड़ने से बचाने की मुहिम में लगी हुई हैं जो अभी दूर-दूर से नफा-नुकसान देख रहे हैं। बहुत से लोग अच्छे मुआवजे की उम्मीद में भी हैं और वे अपनी बात से लोगों को सहमत कर रहे हैं कि विकास होगा तो फाइदा सभी को होगा। विरोध करनेवाले तो एक दिन घर चले जाएँगे। क्यों उनके फेर में पड़ते हो। लेकिन ज़्यादातर आंदोलनकारी इन्हीं गाँवों के स्थायी निवासी हैं।बताते हैं कि मेरा गाँव और खेत भी इसी में है।

ज़मीन मकान बचाओ संयुक्त मोर्चा के संयोजक रामनयन यादव

लेकिन बातें बहुत तरह की हैं। मंदुरी चौराहे पर एक राय साहब मिले जो कहते हैं कि वे ठेकेदार हैं और उनके घर कई पीढ़ियों से ठेकेदारी होती रही है। वे देर तक मोदी जी के विकास के बारे में हमें समझाते रहे और फिर कहा कि ‘यादव लोग आज सबसे ज्यादा विरोध कर रहे हैं लेकिन जब मुलायम सिंह यादव हवाई पट्टी बनवा रहे थे और दूसरे लोगों ने रोका तो इन्हीं यादवों ने नाक का सवाल बना लिया था लेकिन आज मोदी जी के अभियान को रोकने के लिए आंदोलन चला रहे हैं।’ फिर वे स्वयं मोदी जी के विकास मॉडल की आलोचना करने लगे कि सारा कारोबार नष्ट होता जा रहा है। थोड़ी ही देर में उन्होंने नई पीढ़ी के अंधेरे भविष्य पर तब्सरा किया और चले गए। पता नहीं उनकी कौन सी बात सही थी क्योंकि बाज़ार के अन्य लोग मुस्करा रहे थे।

मन्दुरी चौराहे की यह दुकान हवाई अड्डे में जानेवाली है

लेकिन हवाई अड्डे के पक्ष में एक विकासवादी हवा चल रही है। लोगों का मन-मिजाज कूतने-आँकने और मुआवज़ा लेने की सहमति बनाने का काम शुरू हो चुका है। प्रवेश निषाद ने यह चिंता ज़ाहिर की कि ‘लोग तेजी से सक्रिय हो गए हैं। लोगों को उल्टा-सीधा समझा रहे हैं। कभी-कभी तो यह भी कहा जा रहा है कि जो मिल रहा है ले लो नहीं तो यह भी नहीं मिलेगा।’ इन गाँवों में महिलाओं का प्रतिरोध देखने लायक है। वे बहुत शिद्दत से अपनी बात रखना सीख गई हैं। पहले दिन जब हम गाँव में घूम रहे थे तो एक महिला गुस्से से बिफर गई और बोली कि ‘यह घर मैंने अपने खून-पसीने से बनवाया है। जो भी इसे छीनने आएगा उसे मारकर भगा दूँगी।’ एक और महिला अपनी बेटियों की ओर संकेत करते हुये भरभराई आवाज में बोली कि ‘इनके पिता कई साल पहले गुजर गए। यहाँ उजड़ने पर इनको लेकर कहाँ जाऊँगी?’ और बात खत्म होते-होते उसके आँसू निकल पड़े।

जड़ से उखड़ने का दर्द क्या होता है यह विस्थापित होने वालों से बात कर जाना जा सकता है। बात करने पर सभी गाँव वालों ने यही कहा कि कहाँ जाएंगे? कहाँ बसेंगे? खेती की जमीनें कहाँ मिलेंगीं? सभी ने यही कहा कि हमारी पुश्तैनी जमीनें भी एक दिन की खरीदी हुई नहीं हैं, बल्कि दादा-परदादाओं ने बहुत मेहनत से कमाई थी। अब तो हम सपने में भी इतनी जमीनें खरीदने की नहीं सोच सकते क्योंकि अब इतनी कमाई भी नहीं है और जमीनों का भाव भी आसमान छू रहा है। यहाँ हम पैदा हुए, पूरा जीवन इसी गाँव में बिताया। हर पड़ोसी हमारा अपना है। हर सुख-दुख में खड़े होने वाला। यहाँ से अन्य जगह जाने पर न कोई पड़ोसी मिलेगा न ही अपना।

आंदोलन वाली जगह पर स्त्रियों के थोड़े हटकर पीछे बिखरे हुए समूह में हर उम्र के पुरुष बैठे हुए थे। वहाँ पहुंचकर केदार यादव, जिनकी उम्र अस्सी वर्ष से ज्यादा की हो चुकी है, अपना घर-द्वार न देने की बात कहते हैं। उन्होंने कहा कि ‘सरकार अपना हवाई अड्डा वापस ले।’ हसनपुर के पारसनाथ यादव, जो चौदह बीघा जमीन के मालिक हैं, कोरोना से पहले मुंबई में ऑटो-टैक्सी चलाते थे। उन्होंने कहा कि ‘इस क्षेत्र के आठ गांवों की जमीनें जा रही है लेकिन जमुआ हरीराम गाँव पूरा का पूरा खत्म हो जाएगा।’ सभी गाँव वालों का एक ही सवाल है कहाँ जाएंगे? हमें मुआवजा नहीं चाहिए। मुआवजा लेकर कहाँ जाएंगे? इसका नतीजा क्या निकलेगा? पूछने पर पारसनाथ ने कहा कि ‘नतीजा तो सरकार की तरफ से आएगा लेकिन हम लोग किसान आंदोलन की ही तरह सरकार के कानों तक बात पहुंचाना चाहते हैं और बताना चाहते हैं कि यहाँ हवाई अड्डा की बिल्कुल जरूरत नहीं है।

पारसनाथ यादव और केदार यादव और उनके साथी आंदोलन में शामिल होने रोज पहुँच रहे हैं.

भय, आशंका, भावुकता और प्रतिरोध का यह मिला-जुला दृश्य बहुत से लोगों को आपस में जोड़ रहा है लेकिन इसके साथ ही एक बहुत बड़ा गड़बड़झाला भी चारों तरफ है। अभी आधिकारिक रूप से कुछ भी घोषित नहीं है। जैसे उत्तर प्रदेश सरकार की असंवैधानिक बुलडोजरवादी नीति है ठीक उसी तरह यह हवाई अड्डा भी है। हो सकता है कि यह सरकार का रिहर्सल हो और किसी दिन जबरन लोगों को उजाड़ने का वह मंसूबा बांध रही हो लेकिन लोगों के पास संविधान जैसा महत्वपूर्ण औज़ार है। और कोई भी सरकार संविधान से ऊपर नहीं होती। लोगों को संविधान का उपयोग करना होगा। लेकिन जब सामाजिक कार्यकर्ता वल्लभाचार्य ने वहाँ पूछा कि ‘संविधान द्वारा तय किए गए भू अधिग्रहण अधिनियम 2013 के अनुसार आपलोगों के यहाँ ग्रामसभा हुई है? यह तो बाकायदा संसद में संविधान के द्वारा बनाया गया कानून है कि जब तक सत्तर फीसदी लोगों की सहमति और उनको होनेवाले नुक़सानों का सही-सही आकलन न किया जाय तब तक किसी को विस्थापित नहीं किया जा सकता।’ इस पर अमूमन लोग चुप हो गए।

 

आन्दोलन को संबोधित करते हुए सामाजिक कार्यकर्त्ता वल्लभाचार्य

लोगों को भू अधिग्रहण कानून 2013 के बारे में पता नहीं है और न ही इसकी प्रक्रियाओं के बारे में पता है। यह एक विडम्बना ही है कि सरकारी अधिकारियों को भी इसके बारे में कुछ नहीं पता है। अगर पता होता तो वे रात के अंधेरे में पैमाइश के लिए न आते और न ही महिलाओं और बूढ़ों के ऊपर लाठियाँ बरसाते। लेकिन क्या इस पर आसानी से यकीन किया जा सकता है? आखिर वे तो नौकरी ही इसलिए कर रहे हैं कि संसद द्वारा बनाए गए कानून को लागू करें। इसी काम के लिए उनको इतनी शाही सुविधाएं दी जाती हैं कि वे संविधानसम्मत तरीके से काम करें। लेकिन आजमगढ़ अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के लिए ज़मीन लेने की प्रक्रिया में सर्वे करने और शासन को रिपोर्ट भेज देने की जो हड़बड़ी वे दिखा चुके हैं वह तो पूरी तरह संविधान का खुला उल्लंघन है। तो संविधान का यह खुला उल्लंघन वे क्यों और किनके इशारे पर कर रहे हैं? क्या वह इशारेबाज़ सत्ता संविधान से ऊंची हो सकती है? बेशक यह सब जिस तरह अंजाम दिया जा रहा है वह एक संदिग्ध परिदृश्य का निर्माण कर रहा है।

आन्दोलन में शामिल होने पर परिवार का खर्चा कैसे चलेगा? यह सवाल खेतों में मजदूरी कर अपना परिवार चलाने वाली इस महिला ने उठाया

किसके लिए चाहिए अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा

सबसे पहला सवाल यही है और यह अनेक स्तरों पर लोगों के बीच घूम रहा है। मोदी और गोदी मीडिया से लेकर भाजपा के निरहुआ-घुरहुआ तक सब इसके पीछे विकास की बात कर रहे हैं लेकिन यह सवाल भी लगातार मुंह बाए खड़ा है कि किसका विकास? कैसा विकास? और इसका कोई भी स्पष्ट जवाब किसी के पास नहीं है।

वास्तविकता यह है कि देश को आजाद हुए 77 बरस हो चुके है, लेकिन पूरे देश में आधी से ज्यादा आबादी अब भी सड़क पर है। सड़क पर कहने का मतलब आम जनता के लिए उसके आसपास के इलाकों में न शिक्षा की पर्याप्त सुविधा है, न ही स्वास्थ्य केंद्रों या अस्पतालों में दवा अथवा इलाज की कोई समुचित व्यवस्था ही। निजी अस्पतालों की संख्या में बेतहाशा वृद्दि हुई है और अब यह बात किसी से छिपी नहीं है कि यह सब गरीबों के लिए बिलकुल नहीं है। खिरिया बाग की जनसभा में शामिल एक महिला बासमती ने कहा कि ‘मेरा तो वहाँ जाते ही हार्ट फेल हो जाएगा। इलाज तो पता नहीं क्या होगा?

वास्तविकता यह है कि छोटे शहरों और कस्बों के अस्पताल सिर्फ मरीजों को रिफ़र करने के लिए ही बने हुए हैं क्योंकि वहाँ न नियमित डॉक्टर हैं न नर्स। और इससे भी बुरे हालात शहरों में हैं कि मरीज लगातार धक्के खाते हैं लेकिन उन्हें बेड तक नहीं मिल पाते हैं। यहाँ-वहाँ दौड़ते-भागते उनके तीमारदार उन दलालों के चक्कर में फंस जाते हैं जो उन्हें ‘सबसे अच्छे निजी अस्पताल’ तक पहुंचा आते हैं।

खेत मजदूर बासमती उस आर्थिक जमात की एक सदस्य हैं जिन्हें उज्ज्वला योजना में एक सिलेन्डर मिला था लेकिन अब वे लकड़ी और गोइठे से खाना पकाती हैं। सालभर से डेढ़ साल से उनका सिलेन्डर खाली रखा है। जब स्वयं उत्तर प्रदेश सरकार के मुखिया योगी आदित्यनाथ यह दावे से बताते हैं कि प्रदेश के अठारह करोड़ लोगों को राज्य सरकार मुफ्त राशन बाँट रही है तो अमीरों की संख्या का आकलन और गरीबों के हालात को आसानी से समझा जा सकता है। ज़ाहिर है कि लोगों को रोजगार की अधिक जरूरत है ताकि वे अपने लिए राशन , कपड़े और मकान की व्यवस्था कर सकें। जरूरत पड़ने पर दवाइयाँ खरीद सकें।लोगों को नियमित काम और उचित दाम चाहिए और उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में यह आसानी से पता लगाया जा सकता है है कि लोगों को निर्धारित न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिल रही है। भारत की बड़ी आबादी रोजगार के लिए छटपटा रही है।

जिस देश में बड़ा से बड़ा इन्फ्रास्ट्रक्चर निजी हाथों में दे दिया गया है। प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठा हुआ व्यक्ति अंबानी के ‘जियो’ का प्रचार कर रहा है और बीएसएनएल जैसा सार्वजनिक उपक्रम लगातार दम तोड़ रहा है। कई दर्जन बड़े-बड़े रेलवे स्टेशन ठेके पर दिये जा चुके हैं। हवाई अड्डे अदानी के नाम हो चुके हैं। ऐसे में यह विकास क्यों यह सवाल वाजिब है। यह सवाल वाजिब है कि आजमगढ़ में अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा किसके लिए बन रहा है। जमुआ हरिराम, कादीपुर हरिकेश आदि गांवों की महिलाओं ने रात में सर्वे के लिए आए अधिकारियों से पूछा कि आप क्यों सर्वे करने आए हैं तो ‘सरकार के जिम्मेदार अधिकारियों’ ने उनसे मज़ाक करते हुये कहा कि ‘हवाई जहाज़ पर नहीं चढ़ना है क्या? तुम लोगों के लिए मोदी जी हवाई अड्डा बनवा रहे हैं।’ और जब महिलाओं ने यह कहते हुये विरोध किया कि ‘हमको नहीं चाहिए हवाई अड्डा। हमलोगों की स्थिति तो रेल पर चढ़ने की नहीं है।’ तब उनलोगों के साथ आए पुलिस-पीएसी ने उनके ऊपर बेरहमी से डंडे बरसाए।

 

इसी अपमान और उत्पीड़न के विरोध में 13 अकटूबर से स्वत:स्फूर्त तरीके से खिरिया बाग में यह आंदोलन शुरू हुआ, जिसमें स्त्रियाँ अपने ऊपर हुए उत्पीड़न के जवाब में न्याय हेतु आंदोलन कर रही हैं। यहाँ अन्तराष्ट्रीय हवाई अड्डे के लिए आठ गाँवों को चिन्हित किया गया है, जिनकी 670 एकड़ जमीनें जाएंगी। 310 एकड़ जमीन की पैमाइश की जा चुकी है और अभी 360 एकड़ जमीन का नाप-जोख बाकी है। इस इलाके की जमीनें बेहद उपजाऊ हैं। वर्ष भर यहाँ खेती का काम होता है। इन आठ गांवों में 40000 की आबादी वाले लगभग 4500 परिवार चपेट में आ रहे हैं। आबादी में सबसे ज्यादा यादव और दलित हैं। बाकी मिली-जुली आबादी है। सभी के पास खेती की जमीनें नहीं हैं। जिनके पास कम जमीनें हैं या नहीं है, वे लोग दूसरे के खेतों में काम कर रोजी कमाते हैं।

जमुआ हरीराम गाँव के 65 वर्षीय नंदलाल बताते हैं कि उनके पास कोई खेत नहीं है बल्कि वे दूसरे के खेतों में काम करते हैं। जमीन के नाम पर बस केवल वही जमीन है जिस पर घर बना है। अपनी परेशानी और दुख साझा करते हुए उन्होंने कहा कि ‘सरकार यदि जमीनें ले लेती है तो मैं अपने परिवार को लेकर कहाँ जाऊंगा? कहाँ जमीन मिलेगी? कहाँ रहूँगा? जब तक सरकार मंदुरी हवाई अड्डा का मास्टर प्लान वापस नहीं लेती तब तक यह धरना-प्रदर्शन करते रहेंगे।’ नाराजगी जाहिर करते हुए उन्होंने कहा कि ‘पुलिस-प्रशासन चोरों की तरह रात में सर्वे के लिए आया। उन्हें यह चोरी वाला धंधा बंद कर देना चाहिए। यह चोरों का गाँव नहीं है बल्कि यह किसानों का गाँव है, किसानों की धरती है। किसान अपनी धरती के लिए तब तक धरना दिए रहेंगे, जब तक कि सरकार अपना प्लान वापस नहीं ले लेती। यहाँ के लोग खेती-किसानी कर अपना परिवार चलाते हैं।’

आजमगढ़ में 2018-19 निर्मित हवाईपट्टी

फिर किसको अंतर्राष्ट्रीय चाहिए हवाई अड्डा? यहाँ से सौ-सवा सौ किलोमीटर के दायरे में वाराणसी, गोरखपुर और कुशीनगर जैसे तीन हवाई अड्डे हैं। दो सौ किलोमीटर की दूरी पर लखनऊ हवाई अड्डा है। कुशीनर हवाई अड्डे पर अभी बहुत कम यात्री हैं। स्थानीय यात्री तो किसी भी सूरत में नहीं मिल रहे हैं। स्वयं आजमगढ़ में यह हवाई पट्टी 2018 में बनना शुरू हुई और 2019 में बन गई लेकिन आज तक इसपर कोई भी हवाई जहाज़ नहीं उतरा। यहाँ आजमगढ़ में कोई पर्यटन स्थल भी नहीं है जिसको ध्यान में रखकर इसे बनाया जा रहा हो।

फिर भी कई तरह की बातें हैं। कुछ लोग जो अधिक पैसा कमा रहे हैं उनके लिए लगता है कि यह हवाई अड्डा बनने से वे बनारस-लखनऊ की बजाय सीधे यहीं से उड़ जाया करेंगे। ऐसे अनेक लोग विकास का सिद्धान्त बघार रहे हैं। निजामाबाद बाज़ार के कई निवासी खिरिया बाग आंदोलन से असहमत हैं। उनको लगता है कि ये लोग विकास को रोक रहे हैं। लेकिन जब आंदोलन से जुड़े एक व्यक्ति ने उनसे पूछा कि ‘आपलोगों की सुविधा के लिए अगर हवाई अड्डा जरूरी है तो सरकार को चाहिए कि आपके गाँव और बाज़ार को उजाड़कर वहीं हवाई अड्डा बनाए। मुझे लगता है इससे आपको ज्यादा सहूलियत होगी कि घर से निकलते ही जहाज़ में बैठ कर उड़ जाएंगे। इसमें तो आपको भी कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए? ठीक कह रहा हूँ न?’

ज़ाहिर है कि विकासवादी लोग सकते में ही नहीं आए बल्कि उनके पास कोई जवाब भी नहीं था। विकास तब बहुत ज्यादा अच्छा लगता है जब दूसरों के गाँव-घर उजड़ते हैं।

स्त्रियों की भागीदारी ने प्रतिरोध की मिसाल कायम की 

जब हम पहली बार खिरिया बाग पहुंचे तब आंदोलन शुरू हुये बाइस दिन हो चुके थे और दूसरी बार हम अड़तीसवें दिन वहाँ पहुँचे थे। इन दोनों दिनों में एक बात स्पष्ट रूप से समझ में आई कि महिलाओं की भागीदारी कम नहीं हुई बल्कि उसमें बढ़ोत्तरी ही हुई है। रोज के अपडेट भी यही दर्शाते हैं। यह आंदोलन महिलाओं की आत्माभिव्यक्ति का एक मंच बन गया है। अपनी याददाश्तों में बची हुई लोकधुनों पर उन्होंने वर्तमान चुनौतियों को लेकर गीत रचे। नारे गढ़े और सटीक ढंग से बात रखने की कला सीखी। उनकी अपनी भाषा और उनका अपना तेवर है। यहाँ आनेवाली  महिलाओं ने आंदोलन को बहुत संवेदनशीलता से समझा, अपनी भूमिका को तय किया और इसे संचालित किया।

वे सुबह से ही काम में लगती हैं। यह समय धान की कटाई का है। एक पहर काम करने के बाद वे यहाँ शामिल होती हैं और अपनी कमाई में से यथासंभव दो-चार, दस-बीस रुपए स्वेच्छा से गुल्लक में भी डाल देती हैं। किसान नेता वीरेंद्र यादव कहते हैं ‘इसको मामूली मत मानिए। यह आंदोलन के प्रति उनकी आस्था है। कभी-कभी तो हज़ार-पंद्रह सौ भी हो जाता है गुल्लक में।’

जनसहयोग से चल रहे आंदोलन को पचास दिन हो गए

जो सबसे बड़ी बात मैं देखती हूँ वह यह कि ये सभी महिलाएँ अपने संवैधानिक अधिकारों को लेकर चौकस हैं। बारह-तेरह अक्टूबर की रात जब पुलिस ने उनके ऊपर लाठीचार्ज किया तो उन्होंने अपने गुस्से और आक्रोश को आंदोलन की शक्ल में विकसित किया और अब वे किसी से भी नहीं डरतीं। मैंने जब उनसे पुलिस के खिलाफ एफआईआर लिखाने के बारे में पूछा तो कई महिलाओं ने बेसाख्ता कहा कि उस सरकार की पुलिस से क्या उम्मीद रखें जो संवैधानिक तरीके से नहीं बल्कि चोरों की तरह गाँव में घुसती है। अब इस आंदोलन के माध्यम से अपना अधिकार लेंगी। वे इस बात को समझती हैं कि एक बार यहाँ से विस्थापन शुरू हुआ तो फिर न जाने कब आबाद हो सकेंगे। इन महिलाओं ने तिनका-तिनका जोड़कर अपना घर बनाया है। ये महज़ घर नहीं हैं बल्कि उनकी दुनिया है।

युवा पीढ़ी के भविष्य का सवाल

युवा पीढ़ी इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर शामिल है। वे सोशल मीडिया पर इसको लगातार प्रसारित कर रहे हैं। 25-26 साल के आकाश पासी का अपना यू ट्यूब चैनल है जिसके माध्यम से वह यहाँ आनेवाले लोगों से बातचीत और कार्यक्रमों की फुटेज से समाचार बनाते हैं तथा लाइव प्रसारण भी करते हैं। आकाश आंदोलन से बहुत शिद्दत से जुड़े हैं। उनकी बातों से लगता है कि देश में विस्थापन विरोधी आंदोलनों के प्रति उनकी समझ बहुत गहरी है।

इस आंदोलन में पहुंचे युवाओं से भी हमारी बात हुई। एक युवक ने सरकार से सवाल पूछते हुए कहा कि ‘हवाई अड्डा का हम क्या करेंगे? हमें रोजगार चाहिए। 2019 में बीटीसी और टेट परीक्षा पास कर ली लेकिन आज तक कोई भी वैकन्सी नहीं आई। हम नौकरी के लिए भटक रहे हैं। जब भी कोई परीक्षा देने जाना होता है ट्रेन की स्थिति देख कर हिम्मत पस्त हो जाती है। ट्रेन में चढ़ना और जाना मुश्किल हो जाता है। इतनी धक्का-मुक्की होती है कि बैठने को जगह नहीं मिल पाती है। मजबूरी होती है जाना। आजमगढ़ के पास वाराणसी हवाई अड्डा है मात्र दो-ढाई घंटे की दूरी पर। जाने वाले लोग वहाँ से हवाई जहाज़ की सुविधा ले सकते हैं। इस आंदोलन ने आज 37 दिन पूरा कर लिया है। हो सकता है आंदोलन से एक दबाव बने और सरकार अपना फैसला वापस ले ले।’

थके हुए पैर और आंदोलन के लिए बनाया गया पोस्टर एक दिन रंग लाएँगे

दूसरे एक युवा ने कहा ‘यह कैरियर बनाने और पढ़ने-लिखने का समय है लेकिन अभी सरकार के लिए गए निर्णय से पूरे आठ गाँव की आबादी अपना कामधाम छोड़कर इस आंदोलन में शामिल है, क्योंकि सबकी जमीनें और खेत इसके दायरे में आ रहे हैं। हमारा कहना है कि हमारी उपजाऊ जमीनें छोड़कर ऐसी जगह हवाई अड्डा बनाया जाए जहां खाली पड़ी जमीनें हों। शांति से रहते हुए हम अपना गुजारा करना चाहते हैं।’

ग्राम जमुआ हरिराम के 28 वर्षीय किशन उपाध्याय ने पर्यावरण को लेकर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि ‘हवाई अड्डा बनने पर आसपास के जंगल और पेड-पौधों को काट दिया जाएगा। इससे पर्यावरण को नुकसान होगा साथ ही वातावरण प्रदूषित होगा। आठ गाँव के लगभग चालीस हजार लोग सीधे-सीधे लोग प्रभावित हो रहे हैं। सब कहाँ जाएंगे?’

प्रवीण कुमार, जिनके पास मात्र चार बिस्सा जमीन है, ने कहा कि ‘हम उसी जमीन में जैसे-तैसे कमा-खा रहे हैं। सरकार यदि इसे लेकर कोई मुआवजा देती है तो उस राशि से क्या होगा?’ उन्होंने कहा कि ‘यहाँ हवाई पट्टी को हवाई अड्डे में तब्दील करने की जरूरत नहीं है। सरकार कहती है कि आजमगढ़ का विकास हो रहा है।’ नाराजगी दिखाते हुए प्रवीण कुमार ने कहा कि ‘विकास करना है तो एक अच्छा स्कूल बनवाते। यहाँ की आबादी को देखते हुए एक अच्छा अस्पताल बनवाते। इलाज के लिए दूसरे शहर जाना नहीं पड़ता। हमें नहीं चाहिए ऐसा विकास। अपने सांसद दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ को नाचने-गाने से फुरसत नहीं है। सांसद बनने के बाद एक बार यहाँ आए नहीं।’

ऊंचे-पूरे रामसकल यादव एक छोटे काश्त के किसान हैं। वे कहते हैं कि ‘सबसे ज्यादा परेशानी अपनी जड़ के कटने से है? कहाँ जाएंगे अपने परिवार को लेकर?’ यह बात उन्हें परेशान किए हुए है। उन्होंने अपने सांसद दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ पर निशाना साधते हुए कहा कि ‘उन्होंने अपने दलाल छोड़े हैं। कुछ लोगों को 2000-2500 रुपये देकर दलाली करने के लिए इस आंदोलन में भेज रहे हैं। यह देखने कि कौन-कौन इस आंदोलन में भाग ले रहा है और भाषण देकर समर्थन दे रहा है। वे खुद कभी यहाँ नहीं आए। हर जगह हमें प्रताड़ित किया जा रहा है। शासन-प्रशासन के जितने भी कर्मचारी यहाँ आते हैं, अपना रौब दिखाते हैं। उन पर सरकार का दबाव है तो उनका हम पर। हम मानसिक रूप से बहुत दबाव महसूस कर रहे हैं।’

आठवीं पास प्रवेश निषाद ने कहा कि ‘इस विस्तारीकरण में मेरा खेत और घर दोनों जा रहा है। हम सड़क पर आ जाएंगे। इस तरह के विस्थापन को विकास तो नहीं ही कहेंगे। देश के हर हिस्से में बिहार, उत्तरप्रदेश और बंगाल के मजदूर कमाने जाते हैं। उन्हें कोई शौक नहीं है कि अपने परिवार-घर-द्वार को छोड़कर बाहर एक प्रवासी मजदूर का जीवन बिताएँ और अपमान झेलें। सरकार को यदि विकास ही करना है तो यहाँ कारखाने और अच्छे स्कूल-कॉलेज खोले। अपनी धरती और जड़ से उजड़कर बाहर जाने वालों का विकास कम विनाश ज्यादा होता है।’

क्रमशः 

अपर्णा गाँव की लोग की कार्यकारी संपादक और रंगकर्मी हैं। 

3 Comments
  1. Shubham Jayswal says

    This is good thinking for azamgarh
    But u request to PM and CM
    Pls Make it Aims and azamgarh Railway Junction.we will be thankfull to you when My Government make a new rail line from Varansi to Gorakhpur via Azamgarh.
    Railway Hospital University Stadium is primary needs.in this city.
    Thanks
    shubu.azmi@gmail.com

  2. Aman Kumar says

    ग्रामीणों के विस्थापन का दर्द जानकर काफी दुःख हुआ. जब नीजी कम्पनी को ही हवाई अड्डा बनाकर बेचना है तो सरकार के बदले इन कंपनियों को ही इसे बनाना चाहिए.

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