आप उनके बारे में क्या सोचते हैं जिनके पास रोजगार नहीं है !

रामजनम

0 176

यह संसार ऊपर से जितना समृद्ध दिखाई देता है उसके नीचे शोषण और अन्याय की उतनी ही भयावह कहानियाँ दबी हैं । दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि समृद्धि मजदूरों के शोषण के अलावा कुछ नहीं है । जितना अधिक शोषण उतना अधिक जगमगाता पूंजी का संसार। इसी तरह पूंजी और पूंजीवाद जितना ज्यादा महिमामंडन होगा मजदूर वर्ग उससे भी ज्यादा गर्त और अंधेरे में होगा । उसकी आवाज नहीं मिलेगी । उसको अपराध और अंधेरे में धकेल दिया जाएगा और उसके प्रतिनिधि धीरे-धीरे खत्म होते जाएंगे। अखबार-टी वी और कहानियों उपन्यासों से वह गायब होता जाएगा और उसकी जगह मिडियाकर घेरते जाएंगे। आज भारत ही नहीं दुनिया भर में मजदूरों के यही हालात हैं । औद्योगिक क्षेत्रों में मजदूरों को अपनी आवाज उठाने पर पूरी तरह प्रतिबंध है । उनके खिलाफ कई कानून बनाए जा चुके हैं । कोरोना के दौर में उनकी दुर्दशा और सरकार की क्रूरता भारतीय इतिहास का सबसे घिनौना पन्ना है । जिधर देखिये उधर यही सब है । चाहे भारत में सौ दिन के रोजगार और रोजगार न मिलने पर बेरोजगारी भत्ता देने के बुनियादी एजेंडे का ही मामला क्यों न हो ।

गाँव-गरीब के लिए बनाई गई ज्यादातर योजनायें और कानून हाथी के दांत ही साबित हो रहें हैं I ऐसी योजनायें तथा कानून लागू करवाने में जनप्रतिनिधियों,अधिकारियों और कर्मचारियों का मनमानापन ही दिखता है I मनरेगा कानून कहता है कि जिनके पास रोज़गार का कोई जरिया नहीं है ,उनके लिए गाँव में ही सौ दिन के काम की गारंटी की जाएगी I इस क़ानून में लिखा हुआ है कि सौ दिन का काम नहीं दे पाने की स्थिति में सरकार की ओर से हर्जाने के रूप में बेरोज़गारी भत्ता दिया जायेगा लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है I जॉब कार्ड बनवाने से लेकर काम के लिए आवेदन हेतु सभी स्तरों पर लापरवाही एवं भ्रष्टाचार पूर्ण रूप से व्याप्त है I ऐसा लगता है कि मनरेगा में काम मांगना मजदूरों का अधिकार न होकर भीख मांगने जैसी दयनीय गतिविधि है । संवैधानिक रूप से यह काम का अधिकार है लेकिन इसका नाम सुनकर लगता है जैसे यह जनप्रतिनिधियों के रहमोकरम जैसी कोई चीज है। एक तरफ केंद्र और कतिपय राज्य सरकारों  द्वारा इसकी नियमितता को लगातार बाधित किया जाता रहा है तो दूसरी ओर चुनावी मौसम में इसे वोट बटोरने के एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया जाता है ।

अब यह सवाल केवल उठाया जाना ही नहीं बल्कि इसका हल भी बहुत जरूरी है कि सातवें वेतन आयोग के आलोक में मजदूरों की मजदूरी भी न्यायोचित होनी चाहिए I मनरेगा के कार्य क्षेत्र का विस्तार किया जाए I इन मजदूरों को खेती , वृक्षारोपण ( ज्यादा मात्रा में ) पशुपालन इत्यादि से जोड़ा जाए I इससे इनके जीवकोपार्जन का स्थायी साधन उपलब्ध होगा और गाँव में मनरेगा के प्रति नजरिया भी बदलेगा तथा अमन-चैन के साथ श्रम का सम्मान भी बढ़ेगा I

उत्तर प्रदेश के पूर्वान्चल के वाराणसी और चंदौली के तीन दर्जन मनरेगा मजदूरों से बातचीत करने से पता चलता है कि बेरोज़गारी भत्ता की तो छोड़िए, काम करने के छः माह बाद भी मजदूरी का भुगतान नहीं हो पाया है I कभी-कभी तो ऐसा होता है कि यह अवधि साल भर या उससे भी अधिक हो जाती है । कई गाँवों से शिकायत आ रही है कि बैंक से भुगतान के बाद भी ग्राम प्रधान और रोज़गार सेवक ने अपना-अपना कमीशन (हिस्सा) मजदूरों से बैंक के  बाहर वसूल कर लिया है I मस्टर रोल बन गया ,काम हो  गया लेकिन जॉब रजिस्टर पर हाजिरी नहीं चढ़ायी  जाती है I उसके लिए  हीला-हवाली और कमीशन इत्यादि की बातें बाहर चलती है I जिसके चलते मजदूर अन्य तमाम सरकारी योजनायों से वंचित हो जाता है I जब उनको लगता है कि मनरेगा में काम करना किसी बड़े झमेले से कम नहीं है तब मनरेगा में लगे मजदूर अपने गाँव का काम छोड़कर शहरों की ओर पलायन करते हैं I ज्यादातर मजदूरों का मानना है कि मनरेगा में कोई फायदा नहीं है I मात्र मजबूरी का धंधा है I जिस तरह से खेती और बुनकरी चौपट होती जा रही है , उसी तरह से मनरेगा भी दम तोड़ रहा है I वर्तमान सरकार भी इसको मारने की योजना बना चुकी है I अभी हाल में  ही  मोदी सरकार ने मनरेगा मजदूरों में एक रुपए से लेकर साढ़े बारह रुपए तक का इजाफ़ा किया I जब देश में सातवाँ वेतन आयोग लागू हो चुका है और तमाम माननीय लोगों के वेतन और सुविधा हज़ार  से  बढ़कर लाख तक पहुँच चुकी है I लेकिन जिनके श्रम की कीमत पर हम सब मौज-मस्ती कर रहें हैं Iउनकी मजदूरी एक रुपए बढ़ रही है I वाह रे देश ,वाह रे व्यवस्था I

मजदूरों की बातचीत से एक प्रश्न पैदा होता है कि क्या इस देश में क़ानून का राज है ?  वंचित तबकों को जीने का अधिकार है ? श्रम के सम्मान की लड़ाई लम्बी है I साठ के दशक में भी सोशलिस्ट आंदोलन के दौरान कलम और कुदाल के रिश्ते पर एक बहस चलती थी परन्तु आज  के तकनीकी युग में श्रम के महत्व को स्वीकार करते हुए भी श्रम का सम्मान नहीं हो रहा है जिसका नतीजा यह है कि आज मोदी सरकार मजदूरों की  मजदूरी एक रुपए बढ़ा रही है लेकिन बुद्धिजीवियों और मध्यवर्ग ने कभी यह नहीं सोचा कि भला एक रुपए की बढ़ोत्तरी से मजदूर क्या खरीद सकेगा ? मनरेगा में मजदूरी बकाया रखने में केंद्र सरकार का बड़ा खेल  है I जब मराठवाड़ा से लेकर बुंदेलखंड सूखे से जूझ रहे थे। तब सूखा राहत के सवाल पर स्वराज अभियान की ओर से दाखिल मुकदमे में ऐतिहासिक फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को फण्ड की कमी के परदे के पीछे छिपने के बजाय देश के बारह राज्यों के सभी सूखा पीड़ितों तक राहत पहुंचाने का निर्देश दिया ।  मनरेगा की बकाया मजदूरी का भुगतान करने के साथ  अन्य बहुत से प्रावधान भी सम्मिलित किया I राज्य सरकारों के प्रमुखों को भी तलब किया गया I

मनरेगा में असल सवाल यह है कि कानूनन पूरे हक और सम्मान के साथ काम कैसे हासिल किया जाए ? मनरेगा की वास्तविक स्थिति यह है कि 95% मजदूरों को सौ दिन का रोज़गार नहीं मिलता है । मजेदार बात यह है कि साढ़े चौरानबे प्रतिशत लोगों को बारह साल की योजना में एक दिन का भी बेरोज़गारी भत्ता नहीं मिला I उत्तर प्रदेश में मात्र एक ज़िला है जहां जटिल प्रक्रियाओं एवं अनेक कठिनाइयों के परिणामस्वरूप बेरोज़गारी भत्ता मिलना संभव हुआ I मनरेगा में किये गए अधिकतर काम  फर्जी होते हैं । पहले पेड़ लगाए जाते हैं और महीने भर बाद खत्म हो जाते हैं I सड़क,नहर और तालाब ज्यादातर कागजों पर ही बनते हैं और यदि सौभाग्य से बन भी जाते हैं तो आधे-अधूरे ही रह जाते हैं I कार्यरत मजदूरों पर फर्जी मजदूरों का भी कार्यभार सौंप दिया जाता है I

इस देश में सैकड़ों योजनायें गरीबी व गैरबराबरी दूर करने के लिए चलाई जाती है I इसके बाद भी गरीबी और गैर बराबरी तेज रफ़्तार में बढ़ रही है और अमीरों के लिए कोई घोषित योजना नहीं है परंतु अमीरी बहुत तेजी से बढ़ रही है I यह भी इस व्यवस्था का आश्चर्यजनक रूप है I

पूर्वी उत्तर प्रदेश से कई सूचनाएं है कि कई गाँव के लोगों आपस में एकता बनाकर कानूनी हक़ मांगने की शुरूआत कर दिया है I यह काम अपने आपमें सकारत्मक है । ऐसे काम में गाँव के गरीब मजदूरों को सम्मिलित होना चाहिए I

अब यह सवाल केवल उठाया जाना ही नहीं बल्कि इसका हल भी बहुत जरूरी है कि सातवें वेतन आयोग के आलोक में मजदूरों की मजदूरी भी न्यायोचित होनी चाहिए I मनरेगा के कार्य क्षेत्र का विस्तार किया जाए I इन मजदूरों को खेती , वृक्षारोपण ( ज्यादा मात्रा में ) पशुपालन इत्यादि से जोड़ा जाए I इससे इनके जीवकोपार्जन का स्थायी साधन उपलब्ध होगा और गाँव में मनरेगा के प्रति नजरिया भी बदलेगा तथा अमन-चैन के साथ श्रम का सम्मान भी बढ़ेगा I

कोरोना की महामारी और लॉकडाउन ने मजदूरों की कमर तोड़ दी है । सभी बड़े सवालों की तरह मजदूरों की जिंदगी भयावह सच्चाइयों को देखने , समझने और सुलझाने की सख्त जरूरत है । हाल ही में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने कथित तौर पर मजदूरों के खातों में एक हज़ार रुपए देकर अगले साल के चुनाव के लिए एक चारा फेंका है । अखबारों ने अनेक खुशकिस्मत मजदूरों के वक्तव्य और तस्वीरें छापकर सरकार की वाहवाही की लेकिन उनकी वास्तविकता छिप नहीं सकती कि मजदूर अत्यंत बदहाल स्थिति में पहुँच चुके हैं । उनका सवाल इस दौर का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है ।

(लंबे समय से किसानों-मजदूरों के बीच काम कर रहे रामजनम बनारस के प्रमुख सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता हैं ।)

Leave A Reply

Your email address will not be published.