राजेंद्र शर्मा
संस्कृति
सिस्टम के डंके ने बजते ही पोल खोलने की दी गारंटी
मोदी सरकार की गारंटी का डंका इतना बज रहा है कि लगातार उन पर परोक्ष हमले जारी हैं, चाहे किसान आंदोलन हो, एलेक्टरोल बॉन्ड पर कोर्ट का फैसला हो, चंडीगढ़ का मेयर चुनाव के फैसले पर बाजी पलटी हो, या फिर गूगल के आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस टूल जैमिनी हो, जिसने मोदी के फासीवादी होने के सवाल का जवाब दिया..सभी जगह उनकी पोल खोलते हुए डंका बज रहा है
साहित्य
मूँदहु आंख भूख कहुं नाहीं
अब गरज तो विश्व गुरु कहलाने से है, भूख बढ़ाने में विश्व गुरु कहलाए तो और भूख मिटाने में विश्व गुरु कहलाए तो। उसके ऊपर से 111 की संख्या तो वैसे भी हमारे यहां शुभ मानी जाती है। भारत चाहता तो पिछली बार की तरह, भूख सूचकांक पर 107वें नंबर पर तो इस बार भी रह ही सकता था। पर जब 111 का शुभ अंक उपलब्ध था, तो भला हम 107 पर ही क्यों अटके रहते? कम से कम 111 शुभ तो है। भूख न भी कम हो, शुभ तो ज्यादा होगा।
साहित्य
गांधियों… रास्ता छोड़ो!
डेमोक्रेसी की मम्मी की गद्दी पर मोदीजी ने दावा ऐंवें ही थोड़े ठोक रखा है। खैर! नेहरूओं की छोड़ें, पर ओरिजिनल वाले गांधी इन नकली गांधियों के रास्ते पर क्यों चल पड़े? दावेदारी राष्ट्रपिता के पद की और चिंता सिर्फ अपनी कि बच्चों को सब बताओ कि गोडसे ने गोली मारी; कि गोडसे हिंदू अतिवादी था; कि ओरिजिनल वाले सरदार ने आरएसएस पर पाबंदी लगायी थी; वगैरह, वगैरह...!
साहित्य
अब… हिस्ट्री नहीं पढ़ाएंगे!
हां! बुढ़ऊ गांधी के अंत की नयी कहानी को अभी भी व्हाट्सएप से निकलकर, स्कूलों की किताबों तक पहुंचने में कुछ टैम लगेगा। आत्महत्या से लेकर बुढ़ापे की बीमारियों तक, अंत के आप्शन पहले ही सर्कुलेशन में हैं। इतिहास अनुसंधान परिषद 2025 तक शोधपूर्वक इनमें से किसी न किसी विकल्प को प्रमाणित कर देगी और स्कूली किताबों में नयी कहानी थेल ही देगी। तब तक के लिए चुपके से पहली वाली कहानी से खाली करवा दी है।

