Friday, June 21, 2024
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सामाजिक न्याय

आज की स्थिति में आधी आबादी को आर्थिक-सामाजिक समानता मिलना दूर की कौड़ी

किसी भी देश की आर्थिक असमानता उस देश के सामाजिक जीवन को पूरी तरह से प्रभावित करती है। भारत जैसे बड़े लोकतान्त्रिक देश में वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब की ताजी रिपोर्ट से यह बात सामने आई है कि पिछले दस वर्षों में सवर्णों की संपत्ति में हिस्सेदारी उत्तरोत्तर बढ़ती गई है, जबकि ओबीसी और एससी की हिस्सेदारी में हर वर्ष गिरावट आई है। जब तक स्थिति यही रहेगी, कभी भी समानता की कल्पना नहीं की जा सकती।

विकास के नाम पर आदिवासी अपने मूल स्थान से लगातार विस्थापित किए जा रहे हैं

विस्थापन का एक बड़ा कारण विकास परियोजना के अंतर्गत बड़े-बड़े बांधों का निर्माण है। सरकार द्वारा भले ही बहूद्देशीय बांध बनाए जा रहे हैं लेकिन आदिवासियों का विस्थापन उन्हें  विकास की श्रेणी से अनेक साल पीछे धकेल दे रहा है। केवल बांधों से विस्थापित होने वाले आदिवासियों की जनसंख्या 2 से 5 करोड़ तक है

लैंगिक असमानता और आर्थिक व सामाजिक विषमता से पार पाने का एक अभिनव विचार!

संविधान में समानता के चाहे जितने कानून बने हो लेकिन व्याहारिक जीवन में जेंडर गैप दिखाई देता है। भारत में आर्थिक और सामाजिक असमानता  का सर्वाधिक शिकार महिलाएँ हैं और महिलाओं में भी सर्वाधिक शिकार क्रमशः दलित और आदिवासी महिलाएँ हैं। जहां सवर्ण समुदाय की महिलाओं को आर्थिक समानता अर्जित करने में 300 साल लग सकते हैं, वहीं दलित महिलाओं को 350 वर्ष लग सकते हैं।

संविधान और आरक्षण के मुद्दे पर विश्वास लायक नहीं हैं संघ और मोदी  

लोकसभा चुनावी भाषणों में अराक्षण और संविधान को लेकर मोदी और संघ के सुर इधर बदले हुए सुनाई दे रहे हैं लेकिन वास्तविकता यही है कि आरएसएस और भाजपा का निर्माण हिंदुत्ववादी विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए हुआ। इस कारण संघ अपने जन्मकाल से लेकर आज तक लोकतंत्र, संविधान, सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता का स्वाभाविक हिमायती न बन सका। आज भी 400 सीट पाने का मुख्य उद्देश्य आसानी से संविधान में बदलाव करते हुए आरक्षण को पूरी तरह से खत्म करना है।

नारी शक्ति वंदन के दावे के बावजूद दो चरणों के चुनाव में महज आठ प्रतिशत महिला उम्मीदवार

लोकसभा के दो चरणों के चुनाव हो चुके हैं लेकिन कुल उम्मीदवारों में महिलाएँ केवल आठ प्रतिशत हैं। यह नारी शक्ति वंदन मंशा और सामाजिक न्याय की अवधारणा के लिए गंभीर संकेत है।

आज की स्थिति में आधी आबादी को आर्थिक-सामाजिक समानता मिलना दूर की कौड़ी

किसी भी देश की आर्थिक असमानता उस देश के सामाजिक जीवन को पूरी तरह से प्रभावित करती है। भारत जैसे बड़े लोकतान्त्रिक देश में वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब की ताजी रिपोर्ट से यह बात सामने आई है कि पिछले दस वर्षों में सवर्णों की संपत्ति में हिस्सेदारी उत्तरोत्तर बढ़ती गई है, जबकि ओबीसी और एससी की हिस्सेदारी में हर वर्ष गिरावट आई है। जब तक स्थिति यही रहेगी, कभी भी समानता की कल्पना नहीं की जा सकती।

विकास के नाम पर आदिवासी अपने मूल स्थान से लगातार विस्थापित किए जा रहे हैं

विस्थापन का एक बड़ा कारण विकास परियोजना के अंतर्गत बड़े-बड़े बांधों का निर्माण है। सरकार द्वारा भले ही बहूद्देशीय बांध बनाए जा रहे हैं लेकिन आदिवासियों का विस्थापन उन्हें  विकास की श्रेणी से अनेक साल पीछे धकेल दे रहा है। केवल बांधों से विस्थापित होने वाले आदिवासियों की जनसंख्या 2 से 5 करोड़ तक है

लैंगिक असमानता और आर्थिक व सामाजिक विषमता से पार पाने का एक अभिनव विचार!

संविधान में समानता के चाहे जितने कानून बने हो लेकिन व्याहारिक जीवन में जेंडर गैप दिखाई देता है। भारत में आर्थिक और सामाजिक असमानता  का सर्वाधिक शिकार महिलाएँ हैं और महिलाओं में भी सर्वाधिक शिकार क्रमशः दलित और आदिवासी महिलाएँ हैं। जहां सवर्ण समुदाय की महिलाओं को आर्थिक समानता अर्जित करने में 300 साल लग सकते हैं, वहीं दलित महिलाओं को 350 वर्ष लग सकते हैं।

संविधान और आरक्षण के मुद्दे पर विश्वास लायक नहीं हैं संघ और मोदी  

लोकसभा चुनावी भाषणों में अराक्षण और संविधान को लेकर मोदी और संघ के सुर इधर बदले हुए सुनाई दे रहे हैं लेकिन वास्तविकता यही है कि आरएसएस और भाजपा का निर्माण हिंदुत्ववादी विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए हुआ। इस कारण संघ अपने जन्मकाल से लेकर आज तक लोकतंत्र, संविधान, सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता का स्वाभाविक हिमायती न बन सका। आज भी 400 सीट पाने का मुख्य उद्देश्य आसानी से संविधान में बदलाव करते हुए आरक्षण को पूरी तरह से खत्म करना है।

नारी शक्ति वंदन के दावे के बावजूद दो चरणों के चुनाव में महज आठ प्रतिशत महिला उम्मीदवार

लोकसभा के दो चरणों के चुनाव हो चुके हैं लेकिन कुल उम्मीदवारों में महिलाएँ केवल आठ प्रतिशत हैं। यह नारी शक्ति वंदन मंशा और सामाजिक न्याय की अवधारणा के लिए गंभीर संकेत है।

जातिगत भेदभाव : मैं ‘जय भीम’ वालों को काम पर नहीं रखती, कहने वाली महिला के खिलाफ केस दर्ज

14 अप्रैल को कम्पनी मालिक नेहा दत्त ने युवक को व्हाट्सएप पर एक मैसेज किया था। इस मैसेज में नेहा ने युवक से पूछा था कि, 'तू जय भीम वाला है क्या' इस पर युवक ने जवाब देते हुए हामी भरी थी, इसके बाद नेहा ने उत्तर में लिखा, 'मैं जय भीम वाले को नौकरी नहीं देती हूँ।'