Friday, October 16, 2026
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विभाजन और वापस आने की बेचैनी : एक बार फिर तकलीफ़ उकेरती हुई फिल्म

आज़ादी के साथ ही तोहफे में मिला विभाजन भारत के करोड़ों लोगों की त्रासदी है जो जब भी खुलती है तो एक नया दर्द लेकर आती है। यह कल्पना की जा सकती है कि दोनों तरफ से अपना देश छोड़कर जाते लोगों ने कितने दुःस्वप्नों के बीच अपना जीवन गुजारा होगा और किस तरह अपनी बिखरी ज़िंदगियों को फिर से पटरी पर चलने लायक बनाया होगा। दुर्भाग्य से आज़ाद भारत में अभिव्यक्ति का सबसे ताकतवर माध्यम बन जाने वाले भारतीय सिनेमा ने उसे चलते-फिरते निपटा दिया है। पिछली सदी के अंतिम दशक तक आते-आते हिन्दी सिनेमा ने जहाँ भारत-पाकिस्तान के बीच के अंतर्विरोधों को बिकाऊ माल बना दिया वहीं विभाजन की विभीषिका के साथ वह न्याय नहीं कर सका। अब तो सिनेमा को दो देशों के बीच विद्वेष को राजनीतिक औज़ार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। कहना जरूरी है कि ऐसा सिनेमा नफरत को बढ़ाते हुए दिमाग में फफोले पैदा कर रहा है। इसी बीच आई इम्तियाज़ अली की फिल्म मैं वापस आऊँगा एक अलग अनुभव के साथ आई है। इस फिल्म ने एक अधूरे छूट गए प्रेम के बहाने त्रासदियों और तकलीफ़ों का जो जखीरा पेश किया है वह स्तब्ध कर देता है। इसे देखकर विचलित हुए बिना नहीं रहा जा सकता। इसके बहाने विभाजन और उसके अनेक आयामों के साथ इम्तियाज़ अली के सिनेमा का गंभीर विवेचन करता सिनेमा के अध्येता डॉ राकेश कबीर का यह लेख -

सुपौल : कोसी के बाढ़ पीड़ितों की सेवा करते हुए शहीद हुए युवा चिकित्सक को दी गई श्रद्धांजलि

महाराष्ट्र के एक युवा डॉक्टर, चंद्रकांत पाटिल ने कोसी के दुख को अपना समझा। वर्ष 2008 की राष्ट्रीय आपदा के दौरान बाढ़ पीड़ितों की सेवा करते हुए डॉ पाटिल शहीद हुए। 18 वर्ष बाद कटैया ने शहीद हुए डॉ पाटिल को याद किया। कार्यक्रम में उनकी शहादत को याद करते हुए कबीर के निर्गुण भजन हुए, जिसमें इंसानियत ने एक बार फिर सरहदों, भाषाओं और पहचानों से ऊपर उठकर अपना चेहरा दिखाया।

यादवों ने किस कृष्ण का निर्माण किया है?

पिछड़ों के साहित्य की खोज में जेल की कोठरियों की छानबीन, अदालती पराजयों का गहन अध्ययन, फांसी के फंदों और थानों की हवालातों के विश्लेषण से पिछड़ों का साहित्य खोजने की परिकल्पना की गई है। इसके साथ ही आदि लिपिकार पथरकटों, आदि आविष्कारक चरवाहों, किसानों, देशों के अन्वेषक और खोजी मल्लाहों, नाइयों, धोबियों, बुनकरों की ऐतिहासिक जीवन यात्राओं के अलावा विभिन्न घटनाओं के प्रभावों का गहन अध्ययन भी एक मुख्य परिकल्पना है और मुझे लगता है इन्हीं सब में एक विराट पिछड़ा साहित्य मौजूद है।

फिलिस्तीनी जनता का प्रतिरोध : हम किसी भी हालत में अपना देश नहीं छोड़ेंगे

 नई दिल्ली में 2 जुलाई, 2026 को में गाज़ा में नरसंहार के 1000वें दिन को कविताओं और एकजुटता भाषणों के साथ याद किया गया। सभा के विशेष अतिथि, फ़िलिस्तीन राज्य के राजदूत डॉ. अब्दुल्ला एम. अबू शावेश ने आईपीएसएन को इस सार्थक कार्यक्रम के आयोजन पर धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि वे फ़िलिस्तीनी लोगों के लिए न्याय, आज़ादी और सम्मान की माँग में आईपीएसएन के साथियों की इस एकजुटता और प्रतिबद्धता से बहुत प्रभावित हैं।

बांडुंग से ब्रिक्स : अमेरिकी साम्राज्यवाद के विकल्प की संभावनाएँ और चुनौतियाँ

ब्रिक्स के सहयोग के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं: राजनीतिक और सुरक्षा, आर्थिक और वित्तीय तथा सांस्कृतिक और जन-जन के बीच आदान-प्रदान। आज अमेरिका को डॉलर-आधारित वर्चस्व का लाभ प्राप्त है। लगभग 67 देशों पर अमेरिकी शक्तियों द्वारा प्रतिबंध लगाए गए हैं। इस वर्चस्व को ध्वस्त करने के लिए ब्रिक्स ने द्विपक्षीय व्यापार, वैकल्पिक वित्तीय संदेश प्रणालियों तथा चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) जैसे व्यापारिक विकल्पों पर ध्यान केंद्रित किया है। ये छोटे, किंतु प्रभावशाली कदम एक बहुध्रुवीय आर्थिक व्यवस्था के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

विभाजन और वापस आने की बेचैनी : एक बार फिर तकलीफ़ उकेरती हुई फिल्म

आज़ादी के साथ ही तोहफे में मिला विभाजन भारत के करोड़ों लोगों की त्रासदी है जो जब भी खुलती है तो एक नया दर्द लेकर आती है। यह कल्पना की जा सकती है कि दोनों तरफ से अपना देश छोड़कर जाते लोगों ने कितने दुःस्वप्नों के बीच अपना जीवन गुजारा होगा और किस तरह अपनी बिखरी ज़िंदगियों को फिर से पटरी पर चलने लायक बनाया होगा। दुर्भाग्य से आज़ाद भारत में अभिव्यक्ति का सबसे ताकतवर माध्यम बन जाने वाले भारतीय सिनेमा ने उसे चलते-फिरते निपटा दिया है। पिछली सदी के अंतिम दशक तक आते-आते हिन्दी सिनेमा ने जहाँ भारत-पाकिस्तान के बीच के अंतर्विरोधों को बिकाऊ माल बना दिया वहीं विभाजन की विभीषिका के साथ वह न्याय नहीं कर सका। अब तो सिनेमा को दो देशों के बीच विद्वेष को राजनीतिक औज़ार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। कहना जरूरी है कि ऐसा सिनेमा नफरत को बढ़ाते हुए दिमाग में फफोले पैदा कर रहा है। इसी बीच आई इम्तियाज़ अली की फिल्म मैं वापस आऊँगा एक अलग अनुभव के साथ आई है। इस फिल्म ने एक अधूरे छूट गए प्रेम के बहाने त्रासदियों और तकलीफ़ों का जो जखीरा पेश किया है वह स्तब्ध कर देता है। इसे देखकर विचलित हुए बिना नहीं रहा जा सकता। इसके बहाने विभाजन और उसके अनेक आयामों के साथ इम्तियाज़ अली के सिनेमा का गंभीर विवेचन करता सिनेमा के अध्येता डॉ राकेश कबीर का यह लेख -

सुपौल : कोसी के बाढ़ पीड़ितों की सेवा करते हुए शहीद हुए युवा चिकित्सक को दी गई श्रद्धांजलि

महाराष्ट्र के एक युवा डॉक्टर, चंद्रकांत पाटिल ने कोसी के दुख को अपना समझा। वर्ष 2008 की राष्ट्रीय आपदा के दौरान बाढ़ पीड़ितों की सेवा करते हुए डॉ पाटिल शहीद हुए। 18 वर्ष बाद कटैया ने शहीद हुए डॉ पाटिल को याद किया। कार्यक्रम में उनकी शहादत को याद करते हुए कबीर के निर्गुण भजन हुए, जिसमें इंसानियत ने एक बार फिर सरहदों, भाषाओं और पहचानों से ऊपर उठकर अपना चेहरा दिखाया।

यादवों ने किस कृष्ण का निर्माण किया है?

पिछड़ों के साहित्य की खोज में जेल की कोठरियों की छानबीन, अदालती पराजयों का गहन अध्ययन, फांसी के फंदों और थानों की हवालातों के विश्लेषण से पिछड़ों का साहित्य खोजने की परिकल्पना की गई है। इसके साथ ही आदि लिपिकार पथरकटों, आदि आविष्कारक चरवाहों, किसानों, देशों के अन्वेषक और खोजी मल्लाहों, नाइयों, धोबियों, बुनकरों की ऐतिहासिक जीवन यात्राओं के अलावा विभिन्न घटनाओं के प्रभावों का गहन अध्ययन भी एक मुख्य परिकल्पना है और मुझे लगता है इन्हीं सब में एक विराट पिछड़ा साहित्य मौजूद है।

फिलिस्तीनी जनता का प्रतिरोध : हम किसी भी हालत में अपना देश नहीं छोड़ेंगे

 नई दिल्ली में 2 जुलाई, 2026 को में गाज़ा में नरसंहार के 1000वें दिन को कविताओं और एकजुटता भाषणों के साथ याद किया गया। सभा के विशेष अतिथि, फ़िलिस्तीन राज्य के राजदूत डॉ. अब्दुल्ला एम. अबू शावेश ने आईपीएसएन को इस सार्थक कार्यक्रम के आयोजन पर धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि वे फ़िलिस्तीनी लोगों के लिए न्याय, आज़ादी और सम्मान की माँग में आईपीएसएन के साथियों की इस एकजुटता और प्रतिबद्धता से बहुत प्रभावित हैं।

बांडुंग से ब्रिक्स : अमेरिकी साम्राज्यवाद के विकल्प की संभावनाएँ और चुनौतियाँ

ब्रिक्स के सहयोग के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं: राजनीतिक और सुरक्षा, आर्थिक और वित्तीय तथा सांस्कृतिक और जन-जन के बीच आदान-प्रदान। आज अमेरिका को डॉलर-आधारित वर्चस्व का लाभ प्राप्त है। लगभग 67 देशों पर अमेरिकी शक्तियों द्वारा प्रतिबंध लगाए गए हैं। इस वर्चस्व को ध्वस्त करने के लिए ब्रिक्स ने द्विपक्षीय व्यापार, वैकल्पिक वित्तीय संदेश प्रणालियों तथा चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) जैसे व्यापारिक विकल्पों पर ध्यान केंद्रित किया है। ये छोटे, किंतु प्रभावशाली कदम एक बहुध्रुवीय आर्थिक व्यवस्था के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

शिक्षण संस्थानों में होने वाले भेदभाव की वास्तविकता और सिनेमा

क्या शिक्षण संस्थानों में भेदभाव होता है? क्या जातीय आधार पर अध्यापक अपने विद्यार्थियों से भेदभाव करते हैं? क्या सिनेमा में इस भेदभाव को यथार्थ ढंग से चित्रित किया गया है? क्या सुधारात्मक कानून समाज के विभिन्न वर्गों के बीच दूरी बढ़ा देते हैं? यह बहुत जटिल, बड़ा और वर्तमान का सबसे ज्वलंत सवाल है, क्योंकि इस सवाल को देखने और समझने की दृष्टि प्रायः पूर्वाग्रहों से भरी हुई होती है। सामाजिक स्तरीकरण और सामाजिक विभेदीकरण दुनिया के सभी समाजों में पाया जाता है। जाति, धर्म, लिंग, रंग और वर्गीय आधार पर लोगों के साथ भेदभाव करना, पूर्वाग्रहों और थोपी हुई निर्योग्ताओं पर आधारित व्यवहार करते हुए एक निश्चित आबादी को उसके मूलभूत, मानवाधिकारों और अवसरों से वंचित करना सामाजिक भेदभाव कहलाता है। पढ़िए जाने-माने कवि और सिनेमा के अध्येता राकेश कबीर का विश्लेषण जिसमें उन्होंने शिक्षण परिसरों में घटनेवाली घटनाओं के बहाने सिनेमा में उसके चित्रण पर कई सवाल उठाये हैं। 
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