Sunday, June 23, 2024
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शिक्षा

पिछड़ों को मुख्यधारा में शामिल करने की चुनौती और पेपरलीक के बढ़ते मामले

4 जून से पहले, चुनाव को लेकर जहां पूरे देश में अलग-अलग पार्टियों की राजनीति चर्चा केंद्र में थी, वहीं 4 जून को नीट के नतीजे आने बाद नीट पपेरलीक होने की चर्चा हो रही है। फिर 18 जून को नेट परीक्षा का पेपरलीक हो गया। परीक्षा एजेंसी ने दुबारा परीक्षा करवाने की बात जरूर कही है लेकिन क्या आने वाले दिनों में पेपरलीक नहीं होगा, इसका भरोसा युवा कैसे करें?

उत्तर प्रदेश प्राथमिक शिक्षा : प्रवेश उत्सव का रिकॉर्ड बनाने की धुन में बुनियाद से लापरवाह

हाल ही में उत्तर प्रदेश में शिक्षा विभाग के प्राथमिक शिक्षकों को दस बच्चों के एनरोलमेंट का फरमान जारी किया गया और टार्गेट पूरा न करने पर उनका इंक्रीमेंट रोक देने की धमकी दी गई। लेकिन पिछले अनुभवों के आधार पर देखा गया है कि प्रवेश देने के रिकॉर्ड अभियान को बहुत ज्यादा सफलता नहीं मिली है और बच्चे बड़ी संख्या में ड्रॉप आउट हुये हैं। इस मुद्दे पर अपर्णा की टिप्पणी।

प्रवासी मजदूरों के बच्चों की शिक्षा के लिए सरकार का ठोस कदम उठाना जरूरी

सरकार सर्व शिक्षा अभियान चलाती है, स्कूल खुलने पर प्रवेशोत्सव का आयोजन करती है ताकि गाँव का हर बच्चा स्कूल जाकर साक्षर हो सके लेकिन सवाल यह उठता है कि प्रवासी मजदूरों के साथ शहर जाने वाले बच्चे कैसे स्कूल जाएँ क्योंकि उनका न जनम प्रमाणपत्र बन पाता है और न ही वे लोग लंबे समय तक एक जगह रहकर काम करते हैं। ऐसे में उनके जैसे बच्चे कभी स्कूल का मुंह नहीं देख पाते। 

प्रयागराज : आखिर कब तक विश्वविद्यालयों में दलित, पिछड़े और आदिवासियों को NFS किया जाता रहेगा?

देश के विश्वविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसरों के पदों पर साक्षात्कार के आधार पर चयन किया जाता है। विश्वविद्यालयों की साक्षात्कार समितियों में अधिकतम एक्सपर्ट सवर्ण प्रोफेसर होते हैं।  इसलिए वे बड़ी आसानी से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के कोटे की सीट को None Found Suitable कर देते हैं। ताजा मामला उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में स्थित डॉ. राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, प्रयागराज का है।

स्कूलों का निजीकरण होने के बावजूद सरकारी स्कूल क्यों जरूरी हैं?

दरअसल सरकारी स्कूलों को बहुत ही प्रायोजित तरीके से निशाना बनाया गया है। प्राइवेट स्कूलों की निजीकरण समर्थक लॉबी की तरफ से विभिन्न अध्ययन और आंकड़ों की मदद से बहुत ही आक्रामक ढंग से इस बात का दुष्प्रचार किया गया है कि सरकारी स्कूलों से बेहतर निजी स्कूल होते हैं और सरकारी स्कूलों में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बची है

पिछड़ों को मुख्यधारा में शामिल करने की चुनौती और पेपरलीक के बढ़ते मामले

4 जून से पहले, चुनाव को लेकर जहां पूरे देश में अलग-अलग पार्टियों की राजनीति चर्चा केंद्र में थी, वहीं 4 जून को नीट के नतीजे आने बाद नीट पपेरलीक होने की चर्चा हो रही है। फिर 18 जून को नेट परीक्षा का पेपरलीक हो गया। परीक्षा एजेंसी ने दुबारा परीक्षा करवाने की बात जरूर कही है लेकिन क्या आने वाले दिनों में पेपरलीक नहीं होगा, इसका भरोसा युवा कैसे करें?

उत्तर प्रदेश प्राथमिक शिक्षा : प्रवेश उत्सव का रिकॉर्ड बनाने की धुन में बुनियाद से लापरवाह

हाल ही में उत्तर प्रदेश में शिक्षा विभाग के प्राथमिक शिक्षकों को दस बच्चों के एनरोलमेंट का फरमान जारी किया गया और टार्गेट पूरा न करने पर उनका इंक्रीमेंट रोक देने की धमकी दी गई। लेकिन पिछले अनुभवों के आधार पर देखा गया है कि प्रवेश देने के रिकॉर्ड अभियान को बहुत ज्यादा सफलता नहीं मिली है और बच्चे बड़ी संख्या में ड्रॉप आउट हुये हैं। इस मुद्दे पर अपर्णा की टिप्पणी।

प्रवासी मजदूरों के बच्चों की शिक्षा के लिए सरकार का ठोस कदम उठाना जरूरी

सरकार सर्व शिक्षा अभियान चलाती है, स्कूल खुलने पर प्रवेशोत्सव का आयोजन करती है ताकि गाँव का हर बच्चा स्कूल जाकर साक्षर हो सके लेकिन सवाल यह उठता है कि प्रवासी मजदूरों के साथ शहर जाने वाले बच्चे कैसे स्कूल जाएँ क्योंकि उनका न जनम प्रमाणपत्र बन पाता है और न ही वे लोग लंबे समय तक एक जगह रहकर काम करते हैं। ऐसे में उनके जैसे बच्चे कभी स्कूल का मुंह नहीं देख पाते। 

प्रयागराज : आखिर कब तक विश्वविद्यालयों में दलित, पिछड़े और आदिवासियों को NFS किया जाता रहेगा?

देश के विश्वविद्यालयों में असिस्टेंट प्रोफेसरों के पदों पर साक्षात्कार के आधार पर चयन किया जाता है। विश्वविद्यालयों की साक्षात्कार समितियों में अधिकतम एक्सपर्ट सवर्ण प्रोफेसर होते हैं।  इसलिए वे बड़ी आसानी से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के कोटे की सीट को None Found Suitable कर देते हैं। ताजा मामला उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में स्थित डॉ. राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, प्रयागराज का है।

स्कूलों का निजीकरण होने के बावजूद सरकारी स्कूल क्यों जरूरी हैं?

दरअसल सरकारी स्कूलों को बहुत ही प्रायोजित तरीके से निशाना बनाया गया है। प्राइवेट स्कूलों की निजीकरण समर्थक लॉबी की तरफ से विभिन्न अध्ययन और आंकड़ों की मदद से बहुत ही आक्रामक ढंग से इस बात का दुष्प्रचार किया गया है कि सरकारी स्कूलों से बेहतर निजी स्कूल होते हैं और सरकारी स्कूलों में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बची है

मध्य प्रदेश : प्राथमिक शिक्षा के स्तर में लगातार गिरावट हुई है

मध्य प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा के परिदृश्य में वह सब कुछ है जो किसी बड़ी रिपोर्ट में उसके दयनीय हालात की कहानी बयान करने के जरूरी तत्व होते हैं । मसलन छत और अध्यापक विहीन स्कूल, प्रयोगशाला, पेयजल और शौचालय का अभाव, जाति-वंचना और उत्पीड़न, अध्यापकों को दीगर कामों में लगाने, मिड डे मील और दूसरी वस्तुओं के बजट में भ्रष्टाचार आदि। मध्य प्रदेश प्राथमिक शिक्षा के मामले में कितना पिछड़ चुका है बता रही हैं ग्वालियर की सामाजिक कार्यकर्ता रीना शाक्य