TAG
#Rachnayadav
राजेंद्र यादव : स्वतंत्र लेखन के जोखिम के साथ एक जन बुद्धिजीवी
राजेंद्र यादव के बिना बीसवीं शताब्दी के हिन्दी साहित्य की कल्पना नहीं की जा सकती। उन्होंने एक उपन्यासकार, कथाकार, आलोचक, चिंतक और संपादक के रूप में जो मानक रखे उसे छू पाना किसी के लिए भी एक असाध्य यात्रा होगी। सही अर्थों में राजेंद्र यादव हिन्दी साहित्य में समकालीनता के पर्याय हैं। उनका पूरा जीवन मनुष्य की चुनौतियों, संकटों, संघर्षों और सीमाओं के आंकलन-मूल्यांकन और उनका मार्मिक चित्रण करने के लिए समर्पित था। समाज को प्रभावित करने वाले बदलावों पर न केवल उनकी तीखी नज़र रहती थी बल्कि वे उनपर बिना लिखे रह भी नहीं पाते थे।

