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विभाजन और वापस आने की बेचैनी : एक बार फिर तकलीफ़ उकेरती हुई फिल्म

आज़ादी के साथ ही तोहफे में मिला विभाजन भारत के करोड़ों लोगों की त्रासदी है जो जब भी खुलती है तो एक नया दर्द लेकर आती है। यह कल्पना की जा सकती है कि दोनों तरफ से अपना देश छोड़कर जाते लोगों ने कितने दुःस्वप्नों के बीच अपना जीवन गुजारा होगा और किस तरह अपनी बिखरी ज़िंदगियों को फिर से पटरी पर चलने लायक बनाया होगा। दुर्भाग्य से आज़ाद भारत में अभिव्यक्ति का सबसे ताकतवर माध्यम बन जाने वाले भारतीय सिनेमा ने उसे चलते-फिरते निपटा दिया है। पिछली सदी के अंतिम दशक तक आते-आते हिन्दी सिनेमा ने जहाँ भारत-पाकिस्तान के बीच के अंतर्विरोधों को बिकाऊ माल बना दिया वहीं विभाजन की विभीषिका के साथ वह न्याय नहीं कर सका। अब तो सिनेमा को दो देशों के बीच विद्वेष को राजनीतिक औज़ार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। कहना जरूरी है कि ऐसा सिनेमा नफरत को बढ़ाते हुए दिमाग में फफोले पैदा कर रहा है। इसी बीच आई इम्तियाज़ अली की फिल्म मैं वापस आऊँगा एक अलग अनुभव के साथ आई है। इस फिल्म ने एक अधूरे छूट गए प्रेम के बहाने त्रासदियों और तकलीफ़ों का जो जखीरा पेश किया है वह स्तब्ध कर देता है। इसे देखकर विचलित हुए बिना नहीं रहा जा सकता। इसके बहाने विभाजन और उसके अनेक आयामों के साथ इम्तियाज़ अली के सिनेमा का गंभीर विवेचन करता सिनेमा के अध्येता डॉ राकेश कबीर का यह लेख -

पिछले महीने आज़ादी की 79वीं सालगिरह की पूर्व संध्या पर 14 अगस्त 2026 को आजमगढ़ जनपद के हरिऔध कला सभागार में विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के कार्यक्रम में सन 1947 में पाकिस्तान से भारत आने वाले परिवार सम्मिलित हुए। जिले की सबसे वरिष्ठ नागरिकों में से एक सुदर्शन कौर चावला ने 96 साल की उम्र में अपनी स्मृतियाँ साझा की। बोलने के क्रम में वे अपनी आँखें मूँदकर शायद उस दौर के भयानक दृश्यों को याद कर रही हों। जिस ट्रेन से वे आयी थीं उसमें लाशें ज्यादा थीं और आदमी कम। इसलिए ट्रेन की छत पर बैठकर उनका परिवार आगरा में अपने रिश्तेदार के यहाँ रुका था। उनकी माँ उस समय 8 महीने की गर्भवती थीं और ऐसी हालत में उनके लिए ट्रेन की छत पर चढ़ना और यात्रा करना बहुत ही कष्टदायक अनुभव था। सुदर्शन कौर ने कहा कि वे घटनाएँ आज भी उन्हें जब याद आती हैं तब वे चौंक जाती हैं।

विभाजन को लेकर अपने अनुभव सुनती हुई आजमगढ़ की सुदर्शन कौर चावला

विभाजन को लेकर अपने अनुभव सुनती हुई आजमगढ़ की सुदर्शन कौर चावला

इम्तियाज़ अली की इस वर्ष की चर्चित फिल्म मैं वापस आऊंगा  का नायक कीनू भी 95 साल का है। उसकी स्मृतियों की अनेक टूटी-फूटी कड़ियाँ हैं जिन्हें जोड़कर एक श्रृंखला में पिरोना इस फिल्म का निहितार्थ है। विडम्बना यह है कि इन टूटी कड़ियों को जोड़ने की दिलचस्पी कीनू के बच्चों में नहीं है और वे सभी चाहते हैं कि बूढ़ा यथाशीघ्र निपट जाय। संयोग है कि लंदन में रहनेवाला कीनू का पोता अपने दादा से गहरे वाबस्ता है और वही इन बिखरी हुई कड़ियों को जोड़ने की कोशिश करता है और अंततः कामयाब भी होता है। सम्बन्धों के लिहाज से देखा जाय तो विभाजन के बाद वाली पीढ़ी शायद अपने उन ज़ख़्मों को कुरेदने में कतई दिलचस्पी नहीं रखती। उसके अपने सरोकार हैं और अपनी व्यस्तताएँ हैं। लेकिन जिसने अपने जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी के रूप में विभाजन को देखा और जिया है वह उन बुरी और लोमहर्षक यादों को कैसे भूल सकता है? चाहे कीनू हो या सुदर्शन कौर उनके लिए वह एक ऐसा दुःस्वप्न है कि जब भी वे फुर्सत में होते हैं उनके जेहन में आठ दशक पहले की वह बेचैनी, अफरा-तफरी, मारकाट और चीख-पुकार पहले से भी ज़्यादा तेजी से आँखों से गुजर जाते हैं। हालाँकि बँटवारे की यादों को लेकर लिखी गई और संपादित किताबों को पढ़ते हुए कई बार यह लगता है कि उसका हर पीड़ित यथा-संभव भुला दिया गया है। अगर कुछ नहीं तो उस पर खामोशी का गहरा पर्दा पड़ा रह जाता है। इसके बावजूद हर किताब और सिनेमा में कोई न कोई नया पहलू सामने आ ही जाता है।

इस संदर्भ में मुझे विद्वान लेखिका उर्वशी बुटालिया की किताब द अदर साइड ऑफ साइलेंस जिसे हिन्दी में खामोशी के उस पार नाम दिया गया है, बेसाख्ता याद आती है। बुटालिया ने दिल्ली में अपने घर से ऑफिस जाते हुए एक ऑटो चालक सरदार के साथ बातचीत से यह सिलसिला शुरू किया और लगभग एक दशक के शोध कार्य, सैकड़ों स्त्रियों, प्रौढ़ों और बच्चों से लम्बी अंतरंग बातचीत और ढेर सारे दस्तावेजों, रिपोर्टों, संस्मरणों, डायरियों तथा संसदीय रिकार्डों के आधार पर यह किताब लिखी है। इसके पन्नों पर उन बेशुमार आवाजों और वृत्तान्तों को संवेदनशीलता के साथ उकेरा गया है जो आजादी हासिल करने के पचास साल बाद भी ह्रदयहीनता और उपेक्षा के मलबे में दबी पड़ी थीं, क्योंकि उनसे मुठभेड़ करने का साहस हम नहीं जुटा पाये हैं। इस मुठभेड़ के बगैर यह समझ पाना मुश्किल है कि किन लक्ष्यों को ध्यान में रखकर विभाजन स्वीकार किया गया था और हकीकत में क्या-क्या घटित हुआ–खासकर महिलाओं के साथ। भारत का बँटवारा (1947) इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक है। एक करोड़ बीस लाख लोग बेघर हो गये, दस लाख जानें गईं, पचहत्तर हजार स्त्रियों के बारे में कहा जाता है कि वे अगवे और तरह-तरह की जबरदस्तियों का शिकार हुईं, परिवार बिखरे, सम्पत्ति छूटी और घर उजड़े।

इम्तियाज़ अली की फिल्म भी इन्हीं भुलाए गए लोगों और खामोश हो गए उसी यथार्थ का एक हिस्सा है। सुदर्शन कौर चावला या कीनू  जैसे अलक्षित रह गए लोगों के पास इन दुखद स्मृतियों का एक ज़ख़ीरा है लेकिन सबकुछ खोकर शून्य से जीवन शुरू करने वाले इन लोगों ने उस पर पत्थर रख लिया। एक लंबा अरसा बीत जाने के बाद जब वे फुर्सत में आए तब उन्हें उस दौर की याद आई और मन के भीतर जो हाहाकार मचा उसने हमेशा के लिए बिछड़ गए सरगोधा, स्यालकोट, सिंध, रावलपिंडी, पेशावर, लाहौर जैसी अनगिनत जगहों को फिर से जगा दिया और उन गली-कूँचों की स्मृतियों में जाने को विवश कर दिया जहाँ कोई न कोई प्रियजन छूट गया था।

खास मायने रखती है यह फिल्म

यह अचरज का विषय हो सकता है कि देश विभाजन जैसे बड़े मुद्दे पर बॉलीवुड ने कोई खास तवज्जो नहीं दिया। तमस जैसे महाकाव्यात्मक सिनेमाई प्रयास को फिर दुहराया नहीं जा सका। हिन्दी, पंजाबी और अंग्रेजी में गिनी-चुनी फिल्में बनी हैं जिनमें कभी केंद्रीय और कभी प्रकारांतर ढंग से विभाजन आता है लेकिन उनमें खास अपील नहीं दिखती। तमस (गोविंद निहलानी) के अतिरिक्त गरम हवा (एम एस सथ्यू), पिंजर (डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी), अर्थ 1947 (बाप्सी सिधवा) और ट्रेन टू पाकिस्तान (पामेला रुक्स) ने ही संवेदनात्मक रूप से दर्शकों को छुआ। हालाँकि छलिया (मनमोहन देसाई) धर्मपुत्र (यश चोपड़ा), हे राम (कमल हासन), गदर एक प्रेमकथा (अनिल शर्मा) बेगम जान (सुजीत मुखर्जी) और भाग मिल्खा भाग (राकेश ओमप्रकाश मेहरा) भी उल्लेखनीय है। लेकिन यह सवाल फिर भी रह जाता है कि जिस त्रासदी के शिकार तकरीबन एक करोड़ से ज़्यादा लोग रहे हों उस पर सिनेमा ने कितना कम काम किया। इसके बावजूद कि हिन्दी सिनेमा में काम करनेवाले बड़े-बड़े निर्देशक इस त्रासदी को बहुत नज़दीक से देख ही नहीं चुके द बल्कि इसे भोग भी चुके थे। इसके समानान्तर हॉलीवुड ने होलोकास्ट पर सौ से ज़्यादा यादगार फिल्में बनाई हैं।

हमारी चेतना से लगभग विस्मृत इस विषय पर इम्तियाज़ अली ने बड़ी शिद्दत से काम किया है और उस दौर में हिन्दी सिनेमा का सम्मान बढ़ाया है जब वह अपनी रीढ़ खो रहा है। सिनेमा सत्ता का औज़ार बन गया है और ज़्यादातर हिन्दुत्व के प्रोपोगंडा वाली फिल्में ही बन रही हैं। ऐसे में अपने अंतिम समय में बेचैन और अपने वादे को निभाने के लिए बेज़ार एक बूढ़े की लालसा को सिनेमा के पर्दे पर देखना एक अद्भुत अनुभव है। नसीरुद्दीन शाह ने कीनू के चरित्र को जो ऊँचाई दी है वह अलग से चर्चा किए जाने का विषय है।

अपने अनेक दृश्यों में मैं वापस आऊंगा ने एक-एक कहानी के सूत्र छोड़े हैं। हर सूत्र एक अलग फिल्म की मांग करता है। जब कीनू का पोता उससे सात बजे सुबह उजाले में चलने की बात करता है तब वह तेजी से कहता है नहीं…नहीं…नहीं… उजाले में नहीं। उजाले में हैवानियत का जो खेल उसने देखा है उसने उसके भीतर उजाले को लेकर एक खौफ पैदा कर दिया है। शायद इसीलिए किसी शायर ने लिखा है – मैं रौशनी के शहर में ज़ुल्मत पसंद था। इसी तरह कीनू अपनी बहू की मौत के लिए अपने बड़े बेटे को जिम्मेदार मानता है। विभाजन की त्रासदी महिलाओं ने जिस तरह झेली है वह भयानक है। इस एक दृश्य से यह भी पता चलता है कि उस समय के कत्लेआम से बहुत से लोगों ने अपने घर की महिलाओं को छोड़ दिया या मार डाला। फिल्म के एक दृश्य में प्रगतिशील लेखक संघ की एक मीटिंग के दौरान प्रेमचन्द की देशप्रेम पर आधारित कहानी दुनिया का सबसे अनमोल रतन की चर्चा होती है जिसके नायक और नायिका दिलफिगार और मल्लिका दिल फरेब हैं। फिल्म के नायक कीनू फिल्म की नायिका का उपनाम ‘मल्लिका दिल फरेब’ रख देता है और अपनी कलाई पर उस नाम को गुदवा कर रखता है। उस ज़माने में प्रगतिशील लेखक संघ का बड़ा नाम और सम्मान हुआ करता था। सज्जाद जहीर, फैज़ अहमद फैज़, अहमद नदीम कासमी, सआदत हसन मंटो, हबीब जालिब और अहमद फ़राज़ जैसे बड़े साहित्यकार प्रगतिशील लेखक संघ के सदस्य थे।

जैसे गुरु नानक कहते हैं कि वैद तो ऊपर देखकर दावा दे रहा है लेकिन करक तो मेरे कलेजे में हो रही है। वैसे ही कीनू की यादें उसके परिवार को काफी असहज कर देनेवाली हैं। बच्चे आईसीयू में इलाज का खर्च तो कर सकते हैं लेकिन अपने पिता की प्रेमिका की बात को पचा पाना उनके बस का नहीं है। यही इस फिल्म की धुरी है। मैं वापस आऊंगा का कीनू 95 साल के उम्र में जान न छोड़ने की जिद पर लगे हैं क्योंकि उनकी जान अटकी है अपने बचपन की प्रेमिका जिया (मल्लिका दिल फरेब में). उसके बारे में जान लेना है, अगर ज़िंदा हैं तो मिलना है, बातें करनी है, नहीं जीवित है तो दीवार पर लगी उसकी फोटो देखकर ही संतुष्ट हो जाना है और इस दुनिया-ए-फानी से उससे इज़ाज़त लेकर विदा लेना होता है। पंचानबे साल के वृद्ध कीनू का तीन पीढ़ियों का परिवार है, बहु बेटे हैं, नाती पोते हैं, लेकिन उनकी पत्नी गैर मौजूद है। मरणासन्न दादा को अपनी प्रेमिका से मिलने जाना है। अपना अधूरा वादा पूरा करना है।

बहुत पहले बॉलीवुड में राजेश खन्ना और स्मिता पाटिल अभिनीत एक फिल्म बनी थी अमृत। इसमें राजेश खन्ना अमृत शर्मा के रूप में, और कमला श्रीवास्तव के रूप में स्मिता पाटिल हैं। दोनों के जीवन साथी नहीं है। वे अपने बच्चों और नाती-पोतों के साथ रहते हैं। उनके मिलने-जुलने और नजदीकियाँ बढ़ने को गलत बताकर अपमानित किया जाता है और घर से निकाल दिया जाता है। बाद में दोनों साथ रहने लगते हैं।

मैं वापस आऊंगा  फिल्म में दादा और पोते के बीच के भावनात्मक रिश्ते हैं। दोनों समझते हैं एक दूसरे को। जो काम अमृत और अन्य फ़िल्में नहीं कर सकीं वह काम इम्तियाज़ ने कर दिखाया क्योंकि वे आज की पीढ़ी को ज्यादा समझदार मान आश्वस्त होते हैं। यह बात उन्होंने अपने इंटरव्यू में भी कहा है। प्रेम की जटिलता को कितने ही लेखकों कवियों और फिल्मकारों ने अपने अपने तरीके से वर्णित किया है। इम्तियाज अली की नई फिल्म मै वापस आऊंगा  ने प्रेम की नई परिभाषा गढ़ते हुए उसे और ऊंचाई प्रदान की है। आषाढ़ का एक दिन (मोहन राकेश 1958) नाटक  की नायिका मल्लिका हो या मैं वापस आऊंगा (2026)फिल्म की नायिका मल्लिका दिल फ़रेब (अफ़साना/जिया) परिस्थितियों की शिकार हो जाती हैं, समय के साथ बहुत कुछ बदल जाता है। शादी-ब्याह जैसे दस्तूर कर्मकांड भी हो जाते हैं लेकिन प्रेम की टीस वैसी ही रहती है, आजन्म जो वापस लौटने को प्रेरित करती रहती है।

इसे देखते हुए बार-बार टोबा टेक सिंह (सआदत हसन मंटो) के बिशन सिंह की याद आती है। फर्क बस इतना है कि एक को पागल करार दिया जा चुका है लेकिन दूसरा अपने घर में है। जबकि दोनों का अपना अकेलापन है जहां वे अपनी स्मृतियों के जखीरे के साथ हैं। कीनू की ही तरह बिशन सिंह को भी समझ नही आता कि मुल्क का दो हिस्सों में बंटवारा क्यों हो रहा? उसे अपना गाँव छोड़कर कहीं नहीं जाना है। वह पागलखाने में भर्ती है लेकिन उसे अपनी जमीं छोड़कर जाना गंवारा नहीं। सन 1947 में देश के विभाजन के समय भारत और पकिस्तान की सरकारों ने एक-दूसरे के हिन्दू-सिख और मुस्लिम पागलों की अदला-बदली करने पर समझौता किया। लाहौर के पागलख़ाने में बिशन सिंह नाम का एक सिख पागल था जो टोबा टेक सिंह नामक शहर का निवासी था। उसे पुलिस के दस्ते के साथ भारत रवाना कर दिया गया, लेकिन जब उसे पता चला कि टोबा टेक सिंह भारत में न जाकर बंटवारे में पाकिस्तान की तरफ़ पड़ गया है तो उसने जाने से इनकार कर दिया। कहानी के अंत में बिशन सिंह दोनों देशों के बीच की सरहद में कंटीली तारों के बीच लेटा, मरा या मरता हुआ दर्शाया गया। कथा की अंतिम पंक्तियाँ हैं ‘इधर ख़ारदार (कंटीली) तारों के पीछे हिन्दोस्तान था। उधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान। दरम्यान में ज़मीन के उस टुकड़े पर जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेक सिंह पड़ा था।’

अठारहवीं सदी के पंजाबी कवि वारिस शाह, जिन्होंने हीर-रांझा प्रेम और विरह की दास्ताँ लिखी थी उस कवि को संबोधित करते हुए अमृता प्रीतम ने भारत-पाकिस्तान के बंटवारे से जुदा हुए लाखों लोगों के असहनीय दर्द और विक्षोभ को समेटते हुए एक लम्बी कविता अज्ज आखाँ वारिस शाह नूँ लिखी-

आज मैं वारिस शाह से कहती हूँ, अपनी क़ब्र से बोल,
और इश्क़ की किताब का कोई नया पन्ना खोल,
पंजाब की एक ही बेटी (हीर) के रोने पर तूने पूरी गाथा लिख डाली थी,
देख, आज पंजाब की लाखों रोती बेटियाँ तुझे बुला रहीं हैं,
उठ! दर्दमंदों को आवाज़ देने वाले! और अपना पंजाब देख,
खेतों में लाशें बिछी हुईं हैं और चेनाब लहू से भरी बहती है।

यह कविता भारतीय पंजाब और पाकिस्तानी पंजाब दोनों में ही सराही गयी। दोनों तरफ की अवाम ने इस गीत से अपने को जोड़ा और गाया। सन 1959 में बनी पाकिस्तानी पंजाबी फ़िल्म करतार सिंह  में इनायत हुसैन भट्टी ने इसे गीत के रूप में प्रस्तुत किया।

मम्मो (श्याम बेनेगल) फिल्म की मुख्य पात्र बंटवारे का दंश इस तरह झेलती है कि पाकिस्तान में पति के मरने के बाद भारत में अपनी बहन के साथ रहना चाहती है लेकिन वीजा, नियम कानून उसे यहाँ रहने नहीं देते. इस फिल्म का बड़ा ही मार्मिक गीत है:

ये फ़ासले तेरी गलियों के हमसे तय न हुए/हज़ार बार रुके हम, हज़ार बार चले

न रास्ता कहीं ठहरा, न मंज़िलें ठहरें/ये उम्र उड़ती हुई गर्द में गुज़ार चले

न जाने कौन सी मिट्टी वतन की मिट्टी थी/नज़र में धूल, जिगर में लिए गुबार चले

ये कैसी सरहदें उलझी हुई हैं पैरों में/कि पाँव उठाते हैं, ज़ंजीरें खनखना के चले।

इम्तियाज़ अली की सिनेमाकारी 

इम्तियाज़ अली की फिल्मों का नायक अपने व्यक्तित्व में पाई जाने वाली कमियों के साथ सिनेमा के परदे पर आता है। वह अतीतजीवी भी है जो अपने बीते हुए समय में जाकर कुछ ढूंढता रहता है।  शायद कुछ खो गया है जिसकी उसे तलाश है। वह समाज के बनाये नियमों और अनुशासन को तोड़ते हुए खुद की तलाश में भटकता रहता है। उनकी नायिकाएं मजबूत और स्वतंत्र सोच की हैं जो भटकते हुए नायक को न केवल सहारा देती हैं बल्कि उन्हें सही रास्ता भी दिखाती हैं, जैसे सरस्वतीचन्द्र (1968) की नायिका सिखाती है, छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए, यह मुनासिब नहीं आदमी के लिए। प्यार से भी जरूरी कई काम हैं, प्यार सब कुछ नहीं जिंदगी के लिए। अब दिल टूटे या आगे का रास्ता दिखे ये नायक की ज़िम्मेदारी है।  इम्तियाज़ अली ने कई फ़िल्में लिखीं और निर्देशित की। कुछ में अभिनय भी किया। उनकी प्रमुख फ़िल्में हैं – सोचा न था (2005), जब वी मेट (2007), लव आज कल (2009), रॉकस्टार (2011), हाइवे (2014), तमाशा (2015), जब हैरी मेट सेजल (2017), अमर सिंह चमकीला (2024) और मैं वापस आऊंगा (2026)।

इम्तियाज़ अली अविभाजित बिहार के जमशेदपुर शहर के रहने वाले हैं। पटना में भी उन्होंने पढाई की है। वहाँ की भोजपुरिया जिंदगी और भौकाल के वे कायल हैं। उनके मामा खालिद अहमद पाकिस्तान चले गये थे और वहाँ वे जाने-माने टेलीविजन अभिनेता, निदेशक और निर्माता हैं। इम्तियाज़ ने एक चैनल को दिए एक इंटरव्यू में बताया कि उनके मामा अच्छी बांसुरी भी बजाते हैं। दिल्ली के हिन्दू कालेज में पढ़ते हुए और नाटकों में काम करते हुए उन्होंने अभिनय और र्निर्देशन की बारीकियां सीखीं। सन 2005 में सोचा न था’ फिल्म से लेकर वर्ष 2026 में मैं वापस आऊंगा  तक उनकी यात्रा शानदार रही है। पंजाब और पंजाबी चरित्र उन्हें बहुत आकर्षित करते हैं। शायद उन पर दिल्ली की मिली-जुली पंजाबी संस्कृति का असर है। उनकी फिल्मों के पात्र अपने खोये हुए प्यार और खुद की तलाश में, जीवन के अर्थ की तलाश में यहाँ से वहाँ भटकते रहते हैं। वे बंटवारे की जगह दिलों को जोड़ने में यकीन रखते हैं और इसके लिए गाँव-शहर, देश-विदेश की सीमा रेखाएं मायने नहीं रखतीं। इम्तियाज़ की फ़िल्में सिखाती हैं कि हमें अपने इतिहास के उन पन्नों को बार-बार पलटने की जरूरत होती है जहाँ हमारी, हमारे पूर्वजों की प्यारी यादें संजोकर रखी होती हैं। इतिहास को केवल इसलिए नहीं याद रखा जा सकता कि हमारे घाव हरे हो जाएँ और हम प्रतिहिंसा एवं नफरत की भावना से भर उठें बल्कि सीख लें कि दुबारा ऐसी गलतियाँ न हों। इंसानियत का रिश्ता सबसे ऊपर रहे यही लक्ष्य होना चाहिए। डॉ मनोज कुमार झा फ्रंटलाइन पत्रिका में छपे अपने सारगर्भित लेख में लिखते हैं कि मैं वापस आऊंगा में लौटने का अर्थ भौतिक सीमाओं समुद्र, पहाड़ देशों की सीमाओं को पार करने से नहीं है बल्कि हमारी अंतर्मन की यात्रा से है, हमारी स्मृतियों, चेतना और उम्मीद की नाजुक यात्रा से है – ‘मैं वापस आऊंगा एक ऐसी फ़िल्म है जो उम्मीद की बात करती है। ऐसे दौर में जब निराशा न सिर्फ़ हमारी सार्वजनिक बातचीत पर, बल्कि हमारी सामूहिक यादों पर भी हावी होती जा रही है। इसे देखते हुए गरम हवा की यादें ताज़ा हो जाती हैं। इम्तियाज़ अली की बेहतरीन कलाकारी और नसीरुद्दीन शाह द्वारा बेहद संयम के साथ निभाए गए कीनू के किरदार के ज़रिए, हमें टोबा टेक सिंह के सआदत हसन मंटो के अविस्मरणीय पात्र बिशन सिंह की दूर की, लेकिन साफ़ सुनाई देने वाली आवाज़ भी महसूस होती है। इन रचनाओं के बीच का संबंध नकल का नहीं, बल्कि विरासत का है। ये दक्षिण एशियाई कहानी-कहने की उस लंबी परंपरा का हिस्सा हैं जो इंसानियत को तब भी नहीं छोड़ती, जब इतिहास उसे खत्म करने पर आमादा दिखता है।’(झा, 2026)।

फ़्लैशबैक पूर्वदीप्त शैली का प्रयोग ऐतिहासिक कहानियों और सिनेमा में प्रायः किया जाता है। चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी उसने कहा था से लेकर इम्तियाज़ अली की फिल्म मैं वापस आऊंगा तक कथानक और फिल्मांकन तक फ़्लैशबैक शैली का प्रयोग किया गया है। पुराने दृश्यों को सिनेमा में दिखाने के लिए प्रायः ब्लैक एंड ह्वाइट दृश्यों का प्रयोग किया जाता है। विभाजन की पीड़ा को चित्रित करती कई कवितायें, कहानियां और फ़िल्में हैं। इस क्रम में मैं वापस आऊँगा एक बेहतरीन उपलब्धि है।

ज़िंदगी जीने की ये भला कौन सी किस्म है

दंगे, हिंसा, विभाजन और पलायन के बीच अलग होते पड़ोसीपन और अपनेपन से साथ रहते लोग जानना चाहते हैं ये सब क्यूँ हुआ? भीड़ में अकेले हो जानेवाले और नफरत के दौर में भी मोहब्बत और इंसानियत को बचा लेने की जद्दोजहद करते हुए लोग किस तरह अपने मन के भाव प्रकट करते हैं फिल्म का वो नहीं शीर्षक गीत बखूबी बयान करता है। आज भी दुनिया के कई देश अपने क्षुद्र स्वार्थों को लेकर युद्धरत हैं और अस्पतालों, स्कूलों, भूखे बच्चों की कतारों तक पर बमबारी करने से बाज नहीं आते। इस गीत के साथ परदे पर आज के विश्व में होने वाले युद्धों और पलायनों के दृश्य दीखते हैं जो हमें सोचने को विवश करते हैं :

शहर है, लोग हैं, भीड़ है, काम है/गुनगुनी धूप है, शाम है/मैं भी हूँ, वो नहीं
वो नहीं जो मेरे नाम है/ शोर है, फ़िक्र है/मैं भी हूँ, वो नहीं
है यही सच मेरा/ है यही सच तेरा/ नफ़रतों में मोहब्बत को ना भूलना
हाथ जो है उठा, गर्दनें जो कटीं/ वो भी मैं, वो भी तू, आदमी
नब्ज़ है, ख़ून है, साँस है, जिस्म है/ ज़िंदगी जीने की ये भला कौन सी किस्म है
नाम भी है मेरा, शक्ल भी है मेरी/ दोनों में जो था मैं, वो नहीं

तुम ही हो जो दूर–दूर दिल करते/ तुम ही हो जो रोम–रोम दुख भरते
तुम ही हो जो शाख-शाख बन कटते/तुम ही हो जो प्यार-प्यार नित रटते
तुम ही तो भीड़ और दर्पण जाते/ तुम ही तो लालचों से छन जाते
तुम ही शहर–शहर फिरते हो/ तुम ही जो रोज आँखों से गिरते
तुम ही हो जो साफ–साफ सब दिखते/ तुम ही हो जो झूठ-मूठ सब लिखते

तुम ही हो जो रोज–रोज बढ़ जाते/ तुम ही हो जो जीते जी ही मरजाते
किस तरह अब मेरे दर्द का हो बयान/लफ़्ज़ तो खो गए चीख में
मेरे टुकड़े हुए/ मेरे टुकड़े तो तुम मोड़ दो भीख में/ मैं अभी हूँ यहीं, वो नहीं

पाकिस्तान के शहर और बॉलीवुड

पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान के शहर भारतीय फिल्मों में लगातार उपस्थिति दर्ज कर रहे हैं। पहले लाहौर, रावलपिंडी, ल्यारी और अब सरगोधा। गुलज़ार का जन्मस्थल दीना कस्बा भी उनके दौरे के समय (फरवरी 2013) बहुत विवादित और चर्चित रहा। पेशावर के किस्साख्वानी बाजार में पैदा हुए दिलीप कुमार जब पाकिस्तान सरकार का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘निशाँ-ए-इम्तियाज़’ लेने वहाँ गए (1998) तो भारत में कई समूहों और संगठनों ने इसका विरोध किया। गीतांजलि श्री के उपन्यास रेत समाधि (अंतर्राष्ट्रीय बुकर सम्मान प्राप्त) के केंद्र में भी पाकिस्तान का खैबर पख्तूनवा शहर है। इस उपन्यास की नायिका ‘अम्मा’ (चंद्रप्रभा देवी) विभाजन से जुड़े अपने अतीत और बिछड़े हुए शौहर अनवर की तलाश में भारत से बिना वीजा के पाकिस्तान की यात्रा करती हैं। पाकिस्तान में उनकी यात्रा सरहदों की सीमाओं को लांघकर एक आत्मिक और जादुई अनुभव में बदल जाती है।  मैं वापस आऊंगा का मुख्य पात्र 95 साल के ईश्वर सिंह ग्रेवाल (नसीरुद्दीन शाह) भी मृत्युशैया पर लेटे हुए अपने जन्मस्थल सरगोधा जाने और अपनी प्रेमिका जिया/मल्लिका दिल फरेब से मिलने की जिद करते हैं। उनका पोता उनकी टूटी-फूटी उलझी बातों की कड़ियाँ जोड़कर पाकिस्तान में जिया के घर पहुँचने की कोशिश करता है और अपने दादा की इच्छा पूरी करता है। एक बार परिस्थितियों के दबाव में अपने प्रियजन से बिना पूछे कहीं जाना पड़ जाए वह अलग बात है, लेकिन दुबारा वही गलती दुहराई नहीं जा सकती। इजाज़त लेना जरुरी होता है। घर से दूर जाना हो या दुनिया से रूखसती, दोनों ही हालात में इजाज़त लेने से अपनापन बना रहता है। जुड़ाव बना रहता है। गुलज़ार निर्देशित और नसीरुद्दीन शाह और रेखा अभिनीत फिल्म इजाज़त(1987) में रेखा (सुधा) अपने दूसरे पति (शशि कपूर) के साथ जाने से पहले नसीर के पैर छूकर जाने की इज़ाज़त लेती है क्योंकि पहली बार वह बिना बताए पहले पति नसीर (महेंद्र) से दूर चली जाती है। न बताने से आधा सच छुपा रह जाता है। बताकर और इजाजत लेकर जाने से दिल को सुकून मिल जाता है। कितने पाकिस्तान उपन्यास से कमलेश्वर ने इस धरती को जाति, धर्म, रंग की लड़ाइयों के कारण बार-बार विभाजित होते जाने के दर्द को चित्रित किया था। आज भी दुनिया ज़मीन, व्यापार, साम्प्रदायिकता और तेल के नाम पर एक-दूसरे का खून पीने में लगी है। ऐसे मुश्किल भरे नफरती दौर में इम्तियाज अली की फिल्म एक उम्मीद देती है। रॉकस्टार और अमरसिंह चमकीला के बाद यह उनका एक और शानदार योगदान है। उनके लिए सम्मान और बढ़ गया। सुभाष घई ने इस फिल्म की तारीफ़ करते हुए इसे “a beautiful poetic love story” कहा है। अनुराग कश्यप ने इस फिल्म को देखने के बाद एक पॉडकास्ट में कहा है, “इम्तियाज़ तीसरी फिल्म भी अगर तूने बना ली ना अच्छी, तो अपने घर में तेरा मन्दिर बना लूँगा”। हर संवेदनशील इंसान को यह फिल्म देखनी और महसूस करनी चाहिये।

लौटने की चाहत क्यों?

हमारा घर लौटने के लिए होता है। गुलज़ार सन 2013 में पाकिस्तान स्थित अपने बचपन के घर दीना कस्बे में लौटकर गए। दिलीप कुमार भी पुरस्कार लेने वहाँ गए। रविन्द्रनाथ टैगोर का काबुलीवाला  भी लौटने के लिए बेचैन है। फिल्म में उसका चरित्र बलराज साहनी ने निभाया है। जब-तब वह ऐ मेरे बिछड़े वतन, ऐ मेरे प्यारे वतन  गाकर अपने देश अफगानिस्तान को याद करता है। मंटो की कहानी टोबा टेक सिंह का पात्र विशन सिंह, मोहन राकेश की कहानी मलबे का मालिक (मुख्य पात्र अब्दुल गनी), अमृता प्रीतम के पिंजर पर बनी फिल्म का एक पात्र वतना वे  जैसा मार्मिक गीत गाकर अपने बिछड़े वतन को याद करता है।  रेत समाधि  की बूढी अम्मा अपने प्यार और बिछड़े शौहर अनवर की तलाश में भटक रही है। यशपाल का झूठा सच, भीष्म साहनी का तमस  सभी हिंसा और पलायन के बीच प्रेम, मानवता और अच्छी यादों को समेटकर रखना चाहते हैं।  इम्तियाज़ अली की फिल्म मैं वापस आऊंगा  यह सन्देश देती है कि हिंसा और नफरत के दौर में भी हम प्रेम और इंसानियत को याद रखें वही हमारे साथ आखिरी पल तक बचा रहता है। अनुज कुमार द हिन्दू  अखबार में फिल्म के रिव्यू में लिखते हैं–  यह फ़िल्म पुरानी पीढ़ी के उस फ़ैसले पर सवाल उठाती है जिसमें उन्होंने अपने ऐतिहासिक सदमे को दबाए रखा और बंटवारे का ज़हर चुपचाप पी लिया। यह असल में आने वाली पीढ़ी की सुरक्षा के लिए किया गया काम था, लेकिन फ़िल्म दिखाती है कि सदमे को सुरक्षित रूप से दबाया नहीं जा सकता। वह बस अपना रूप बदल लेता है। इतिहास पर बात न करने से, वह चुप्पी ही एक ज़हरीली विरासत बन जाती है, जिससे नई पीढ़ी आज के दौर के भेदभाव का सामना करने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं हो पाती।

जब मेरा बेटा 5 साल का था तब वह जब कहीं हमारे साथ घूमने जाता और वह जगह उसे अच्छी लगती तो कहा करता था, ‘हम यहाँ दुबारा आयेंगे’। हम बार-बार कहाँ लौटना चाहते हैं? यह सवाल हर उस इंसान से पूछा जाए जो किसी वजह से अपने गाँव-घर और परिवार से दूर रहता हो तो उसका जवाब क्या होगा? उसका जवाब होगा वह अपने घर, बचपन के गाँव लौटना चाहता है। वह उन जगहों को बार-बार देखना और महसूस करना चाहता है जहाँ वह अपने दादा-दादी, माता-पिता, भाई-बहनों और दोस्तों के साथ खेलते, सीखते-पढ़ते हुए बड़ा होता है। अपनी जन्मभूमि को एक बार कुछ पलों के लिए भी निहार कर, अपने गाँव-घर के लोगों के लोगों से मिलकर काम पर लौट जाने के लिए एक ऊर्जा संग्रहित सी हो जाती है जो कई महीनों-सालों तक हमारे भावनात्मक संसार को संचालित करती रहती है।

मैं वापस आऊंगा फिल्म का गाना तेरे पास मैं भी घोषित करता है कि प्यार में शारीरिक दूरियाँ झूठ होती हैं।  जिस तरह यश चोपड़ा निर्देशित फिल्म वीरज़ारा (2004) का गीत जानम देख लो मिट गयीं दूरियां, मैं यहाँ हूँ यहाँ हूँ यहाँ । इस फिल्म और गाने के माध्यम से इम्तियाज़ अली यश चोपड़ा जैसे महान फिल्मकार के समकक्ष नजर आते हैं। हैप्पी भाग जायेगी (2016) फिल्म की हरप्रीत उर्फ़ हैप्पी अपने बॉयफ्रेंड से शादी करने के लिए अमृतसर से भागकर गलती से लाहौर पहुँच जाती है। इस कॉमेडी फिल्म में हैप्पी को अमृतसर और लाहौर में कुछ फर्क नजर नहीं आता और यही सच भी है क्योंकि भाषा-बोली पहनावा और वातावरण सब कुछ एक जैसा ही तो है। बस बीच में एक अंग्रेज रेडक्लिफ की बनाई कृत्रिम विभाजन रेखा है जो दो देशों को बांटती है। दोनों तरफ फिल्मिस्तान (2012) है जहाँ पाकिस्तान के लोग भारतीय फिल्मों को बड़े मन से देखते हैं। चाहे पायरेसी करनी पड़े। फिल्म का पात्र सनी अरोरा गलती से किडनैप होकर पाकिस्तानी सीमा में चला जाता है लेकिन फिल्मों और डायलॉग्स से पाकिस्तानी लोगों को भी खुश कर देता है। गरम हवा, मम्मो, हिना, पिंजर, बजरंगी भाईजान, वीर जारा, पीके, हैप्पी भाग जायेगी, फिल्मिस्तान, मैं वापस आऊंगा जैसी फिल्में बताती हैं कि धर्म के आधार पर भारत-पाकिस्तान का बंटवारा एक मूर्खतापूर्ण निर्णय था।

इस फिल्म की खूबसूरती यह है कि यहाँ प्रगतिशील लेखक संघ भी है, प्रेमचन्द की कहानियां भी हैं, कबीर की कविता (हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या) भी है। मैं वापस आऊंगा में निर्वेर सिंह ग्रेवाल ने रेडक्लिफ द्वारा भारत-पकिस्तान के बंटवारे की खिंची गयी लाइन का मजाक उड़ाया है। इस विभाजन में बहुत से लोग उजड़े, बिछड़े, मारे गए और जीवनभर अपने सीने में एक टीस लिए जीते रहे। लखनऊ के सिनेमाहाल में इस फिल्म को देखते हुए हमने महसूस किया कि दर्शकों की एक बड़ी संख्या सिख समुदाय के लोगों की थी। वे इस फिल्म के कथानक से खुद को और अपने पुरखों की यादों को जोड़ पा रहे होंगे। जब भारत-पाकिस्तान बंटवारे को दो समुदायों और देशों के बीच लड़ाई बढाने, नफरत फैलाने के सबसे बड़े औजार-हथियार के रूप में देखा जाता है तब मैं वापस आऊंगा एक संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण को आगे बढाने का काम करती है। दीपा मेहता की फिल्म अर्थ और चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म पिंजर भी इसी तरह ऐतिहासिक परिस्थितियों को ही दोषी मानती हैं। किसी समुदाय विशेष को खलनायक बनाकर नहीं प्रस्तुत करतीं।

कीनू 95 साल का वृद्ध व्यक्ति है जो सन 1947 के देश बंटवारे में विवश होकर अपना पैतृक शहर सरगोधा छोडकर दिल्ली आ जाता है। धर्मेन्द्र की अंतिम फिल्म इक्कीस (2026) भी इसी तरह की फिल्म है जिसमें वे हुस्ना की याद में अपने बचपन के शहर लौटते हैं। निर्वैर (जिसका कोई दुश्मन न हो) ग्रेवाल कीनू का पोता है जो अपने दादा की बीमारी की खबर सुनकर लन्दन से अपने घर दिल्ली वापस लौटता है ताकि बीमार दादाजी से मिल सके। दादा की टूटी-फूटी बातें और यादें जोडकर वह कहानी पूरी करने और उस जगह (सरगोधा) पहुँचने की जद्दोजहद करता है जहाँ से उसके दादा ईश्वर सिंह ग्रेवाल बंटवारे के बाद दिल्ली आये थे। एक उसकी प्रेमिका और प्रेम कहानी है जो लड़खड़ा रही है दूसरी तरफ मृत्युशैया पर लेटे उसके 95 वर्षीय दादाजी की प्रेमकहानी है। दोनों कहानियां एक दूसरे से टकराती हैं, सीखती हैं और आगे बढती हैं और समय और स्थान की दूरियों को बेमतलब साबित करती हैं।

संदर्भ

Kumar, Anuj (2026) ‘Main VaapasAaunga’ movie review: Imtiaz Ali’s love story for the ages, June 11, 2026,https://www.thehindu.com.

Chowdhury, Neelam Ray (2026) Imtiaz Ali’s cinema: Love, loss and the long road to the self, Jun 14, 2026

Imtiaz Ali’s films use love, travel and music to push restless people toward difficult truths about themselves. From Jab We Met to Tamasha and now Main VaapasAaunga, his cinema keeps returning to one stubborn question: how does one become oneself?

Jha, Manoj Kumar (2026) Remembrance of things past, and the memory of hope, in frontline published on 07 July 2026.

Jodhka, Surinder S. (2026) Vaapasi on the Wings of Love: Main VaapasAaunga offers us new avenues for engaging with our past, on 4 July 2026 in https://www.tribuneindia.com.

डॉ. राकेश कबीर
डॉ. राकेश कबीर
राकेश कबीर जाने-माने कवि-कथाकार और सिनेमा के गंभीर अध्येता हैं।

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