ग्रामीण क्षेत्रों के आदिवासियों का रोजगार की तलाश में परिवार सहित पलायन, उनके बच्चों को शिक्षा से दूर कर देता है। आर्थिक समस्या के कारण परिवार भी शिक्षा के महत्व को समझ नहीं पाता है। सरकार द्वारा कई सरकारी योजनाओं के संचालित किये जाने के बाद भी आदिवासियों की आर्थिक समस्याओं का निदान नहीं हो पा रहा है।
आज भी वंचित समुदायों की किशोरियों का भविष्य वंचनाओं से ग्रस्त है। इन समुदायों के कुछ परिवार स्थायी रूप से कुछ ही स्थानों पर आबाद होते हैं और कुछ मौसम के अनुरूप पलायन करते रहते हैं। इसका सबसे अधिक नकारात्मक प्रभाव किशोरियों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर पड़ता है। इसके साथ ही उन्हें बोझ और पराया धन समझने की प्रवृत्ति भी किशोरियों के समग्र विकास में बाधा बनती है। इससे न केवल उनकी शिक्षा बल्कि शारीरिक और मानसिक विकास भी रुक जाता है। इस तरह उन्हें सबसे पहले शिक्षा से वंचित कर दिया जाता हैं।
देश में कोयला का बेतहाशा खनन और उपयोग बिजली बनाने के लिए किया जा रहा है। आज भी देश के कई ऐसे ग्रामीण क्षेत्र ऐसे हैं जहां लोगों को या तो आज भी बिजली की सुविधा उपलब्ध नहीं है या फिर नाममात्र की बिजली सप्लाई मिलती है। सरकार का दावा कि बिजली का सरप्लस उत्पादन हो रहा है, झूठा साबित होता दिखता है।
भारत जैसे विकासशील देश के ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। जिसके कारण परिवार के पुरुष रोजगार की तलाश में शहरी क्षेत्रों में पलायन को मजबूर हैं। वर्ष 2024-2025 के बजट में केंद्र सरकार ने मनरेगा समेत रोजगार के कई क्षेत्रों में बजट आवंटन को बढ़ाया है। लेकिन इसके बाद भी सरकार को चाहिए कि गाँव में ही रोजगार के ऐसे संसाधन उपलब्ध कराये ताकि उन्हें शहर जाने की जरूरत ही न पड़े।