Thursday, April 3, 2025
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उत्तराखंड : जंगलों में लगने वाली आग और पानी की कमी बनी ग्रामीणों के चिंता का कारण

एक तरफ जंगलों को काटकर खत्म किया जा अरहा है, वहीं दूसरी तरफ जंगलों में आग लगने से खाक हो रहे हैं। धरती के पारिस्थिकीय तंत्र के लिए यह बहुत ही चिंताजनक है।

गाँव और पहाड़ों का पर्यावरण बिगाड़ रहा आधुनिकीकरण

'बचपन में हरियाली के बीच बैठकर अक्सर मैं जिस हिमालय पर्वत को देखा करता था, आज कई वर्षों बाद जब मैं वापस उसे देखने...

पितृसत्ता की बेड़ियों में जकड़ी हुई हैं किशोरियां

मेगड़ी स्टेट (उत्तराखंड)। कभी कभी हमारे देश में देखकर लगता है कि देश तो आजाद हो गया है, जहां सभी के लिए अपनी पसंद...

‘विशेष राज्य’ बनने के 22 वर्ष बाद भी उत्तराखंड में सड़क विहीन हैं कई गाँव

कपकोट (उत्तराखंड)। हमारे देश की अर्थव्यवस्था मुख्यतः ग्रामीण क्षेत्रों पर निर्भर करती है। आज भी देश की 74 प्रतिशत आबादी यहीं से है। लेकिन...

थोथी बहस नहीं, स्त्रियों के प्रति मानवीय व्यवहार से ख़त्म होगी दहेज की मानसिकता

किसी समय में दहेज का अर्थ इतना वीभत्स और क्रूर नहीं था, जितना आज के समय में हो गया है। दरअसल दहेज, शादी के समय पिता की ओर से बेटी को दिया जाने वाला ऐसा उपहार है, जिस पर बेटी का अधिकार होता है। पिता अपनी बेटी को ऐसी संपत्ति अपनी स्वयं की इच्छा से देता था और अपनी हैसियत के मुताबिक देता है।

पर्वतीय इलाकों में ग्लोबल वार्मिंग के चलते हो रहा है पलायन

 उत्तराखण्ड राज्य के रूरल डेवलपमेंट और माइग्रेशन कमीशन के अनुसार राज्य के ग्रामीण इलाकों में तापमान बढ़ रहा। साथ ही शैक्षणिक संस्थान, स्वास्थ्य सुविधाओं...

मूलभूत सुविधाओं के अभाव में पहाड़ों से बढ़ रहा है पलायन

राज्य में पर्वतीय समुदाय की आजीविका की आस कृषि है। लेकिन वह भी बदलते जलवायु परिवर्तन के प्रहार से जूझ रही है। जिसकी वजह से किसानों की नई पीढ़ी इसे छोड़कर रोज़गार के लिए शहरों की ओर पलायन कर रही है। जल्द ही ऐसा समय आएगा जब गांव में मकान तो होंगे लेकिन उसमें रहने वाला कोई नहीं होगा। मकानों में ताले ही देखने को मिलेंगे। ऐसी स्थिति में विकास किस प्रकार संभव हो सकेगा?

‘खुशियों की सवारी’ के इंतजार में गर्भवती महिलाएं

कपकोट (उत्तराखंड)। 'खुशियों की सवारी' योजना की शुरुआत उत्तराखंड सरकार ने वर्ष 2011 में की थी। यह एक एम्बुलेंस सर्विस है जिसकी मदद से...

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