बादल सरोज
लेखक 'लोकजतन' के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।
राष्ट्रीय
कांवड़ के बहाने युवा उन्मादी भीड़ को हिंसक और बर्बर बना नफरत फैलाना है
जब खुद मुख्यमंत्री आदित्यनाथ कांवड़ियों के सत्कार में लगे हों, पुलिस के आला अफसरों की ड्यूटी उन पर फूल बरसाने की हो, थानों में पदस्थ अधिकारी और पुलिस के जवान महिला, पुरुष दोनों – कांवड़ियों के पाँव दबाने और पंजे सहलाने के काम में लगाये गए हों, ऐसा करते हुए उनके फोटो वीडियो सार्वजनिक किये जा रहे हों और इस तरह कोतवाल खुद मालिशिए हुए पड़े हों, तो फिर कांवरियों को किसका डर। डर तो दुकानदारों, होटल वालों और पैदल व गाड़ी पर चलने वाले लोगों को हो रहा है।
सामाजिक न्याय
मुकेश चंद्राकर : एक और युवा पत्रकार भ्रष्ट तंत्र की पोल खोलने पर मारा गया
गोदी मीडिया काल में ग्रामीण पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ मुकेश चंद्राकर की हत्या सचमुच कष्टप्रद और चिंताजनक है। वर्ष 2014 के बाद अभिव्यक्ति को लेकर जिस तरह से पत्रकारों पर हमले बढ़े हैं, वह सभी के सामने है। पत्रकारों पर हमले करवाना और उनकी हत्या करवा देना सत्ताधीशों के लिए बहुत सामान्य बात है। बस्तर जंक्शन के मुकेश चंद्राकर की हत्या निडर पत्रकारिता करने वालों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़ा करती है। इस देश में अब विधायिका, कार्यपालिका न्यायपालिका और चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया पूरी तरह से फासीवाद के चपेट में है और इनका अस्तित्व नाममात्र का रह गया है।
विचार
भारतीय राजनीति का बाबा काल
न बाबाओं में भारी भिन्नताएं हैं। मोटे तौर पर कम से कम तीन-चार ढीली-ढाली श्रेणियां तो आसानी से बन ही सकती हैं। इनमें एक श्रेणी तो राम रहीम, आसाराम बापू, रामपाल, प्रज्ञा ठाकुर आदि से लेकर, पिछले ही महीने अपने मठ में बच्चियों के यौन उत्पीड़न के लिए गिरफ्तार किए गए कर्नाटक के एक मठ के स्वामी तक, ऐसे साधु वेशधारियों की ही बनाई जा सकती है, जो आपराधिक मामलों के लिए सजा काट रहे हैं या मुकदमों का सामना कर रहे हैं।

