TAG
collage
मेरा गांव सोन नद की बांहों में विचारों में उलझी मेरी महबूबा सा…
मेरा गांव
सोन नद की बांहों में
विचारों में उलझी
मेरी महबूबा सा.....
कभी गांव को लेकर मैंने एक लंबी कविता लिखी थी। यह कविता मेरे आलोचकीय विवेक पर...
बालों के रंग से चाचाजी बनाम दादाजी
इधर कुछ वर्षों से मैंने हर साल दीपावली के बाद छुट्टी लेकर गाँव जाने का क्रम सा बना लिया क्योंकि इस समय गुलाबी ठंड...

