बालों के रंग से चाचाजी बनाम दादाजी

गुलाबचंद यादव

1 904

इधर कुछ वर्षों से मैंने हर साल दीपावली के बाद छुट्टी लेकर गाँव जाने का क्रम सा बना लिया क्योंकि इस समय गुलाबी ठंड का मौसम रहता है और खेतों में हरियाली रहती है जो हम जैसे कंक्रीट के जंगलों में रहने वाले अर्द्ध मशीनी इंसानों के लिए टॉनिक का काम करती है। हमारे गांवों में पहले अधिकांश शादी-विवाह, गृह प्रवेश, भोज-भंडारा जैसे मांगलिक कार्य अप्रैल से लेकर जून के अंत तक संपन्न होते थे। गर्मी के मौसम में शादी-विवाह की तिथियाँ तय करने के पीछे जो वजहें बताई जाती थीं उनमें स्कूल की छुट्टियों का होना, खेत-खलिहान के खाली हो जाने से बारातियों के जनवासे/टिकाव हेतु पर्याप्त जगह का उपलब्ध होना, गेहूँ-चावल जैसे खाद्यानों की घर में ही उपलब्धता, बारिश के विघ्न की आशंका से मुक्ति आदि प्रमुख होती थीं। माना जाता था की सर्दियों में शादियाँ बाज़ारों/कस्बों/शहरों के कारोबारी/व्यवसायी वर्ग के लोगों द्वारा ही धराई जाती हैं। किंतु इधर कुछ सालों से इस परंपरा में बदलाव आया है और ग्रामीण क्षेत्रों में भी सर्दियों के मौसम बड़ी संख्या में शादियाँ संपन्न हो रही हैं। मेरा अपना मानना है कि सर्दी के मौसम में विवाह संपन्न होना बच्चों की छुट्टियों की सुविधा को छोड़कर, हर लिहाज से बेहतर होता है।

मैं गाँव जाने पर आसपास के मित्रों/रिश्तेदारों से मिल लेने के बाद कुछ अन्य मित्रों से मिलने वाराणसी, इलाहाबाद, लखनऊ, कानपुर, पटना आदि में से किसी एक-दो शहर जाने का प्रयास करता हूँ। इस बार भी कानपुर, लखनऊ और चित्रकूट के कुछ मित्रों का अग्रिम आग्रह था कि मैं उनके शहर अवश्य आऊँ। मेरा भी मन जाने का था किंतु बीच में एक घनिष्ठ मित्र के भाई की शादी का निमंत्रण आ जाने और एक-दो अन्य जरूरी कामों की वजह से बाहर केवल एक-दो जगह ही जाना हो पाया जिसमें से एक दिन बनारस की यात्रा भी शामिल थी।

गाँव पहुँचने पर बनारस आने पर मैं सबसे पहले अपने करीबी मित्र राजकुमार सिंह के घर जाता हूँ और वहाँ कम से कम 3-4 घंटे बिताने के बाद ही अन्य मित्रों/परिचितों से मिलने जाता हूँ। राजकुमार जी से मेरी मित्रता तीन दशक से भी पुरानी है और ऊपरवाले की कृपा से आज भी वैसे ही कायम है। हमने एक साथ 1987-89 के बैच में मुंबई विश्वविद्यालय से एमए (हिंदी) किया था। उस दौर में हमारे अनेक साझा मित्र बने थे और उनमें से कई आज भी संपर्क में बने हुए हैं और एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी होते हैं। सबसे पहले राजकुमार जी से ही मिलने के पीछे इनकी आत्मीयता, स्टेशन के पास पटेल नगर में इनके आवास का होना और सबसे बढ़कर भाभीजी (श्रीमती सिंह) द्वारा आग्रहपूर्वक सुस्वादु भोजन कराना मुख्य वजहें हैं। मैं सन 1988 से राजकुमार जी के घर जाता रहा हूँ, चाहे वह इनका आशानंदपुर, जौनपुर वाला पैतृक घर हो या मौजूदा पटेल नगर, वाराणसी वाला घर।

नवंबर 2017 के चौथे सप्ताह के एक दिन मैं वाराणसी जाने के लिए सुबह 8 बजे अपने टिकाव स्थान रामदेव पट्टी गाँव, भदोही से निकला। 2 किमी दूरी पर भदोही-वाराणसी रोड पड़ता है जहाँ के पाल चौराहा पड़ाव पर भदोही से वाराणसी जानेवाली बसें रुकती हैं। लगभग साढ़े आठ बजे मुझे वाराणसी जानेवाली बस मिली। बस में सवारियाँ भरी हुई थीं और कोई सीट खाली नहीं थी। यहाँ से मुझे लगभग 37 किमी की यात्रा करनी थी। किंतु अनुभव के आधार पर मुझे आशा थी कि आगे कपसेठी चौराहा आने पर कई सवारियाँ उतरेंगी और मुझे बैठने की जगह मिल जाएगी। वही हुआ और कपसेठी में आगेवाले दरवाजे के बाईं ओर की पहली सीट पर मुझे बैठने की जगह मिल गई। मेरी बाईं ओर खिड़की वाली सीट पर 44-45 साल के एक श्यामवर्णीय सज्जन बैठे थे जिन्होने अपने बालों और मूंछों को अच्छी तरह से ख़िज़ाब (हेयर डाई) लगाकर काला कर रखा था और मुँह में पान-सुपाड़ी को भी उदारता से स्थान दे रखा था। कंडक्टर शायद उनका परिचित रहा होगा क्योंकि वह रास्ते भर उनसे बतियाते हुए जा रहा था। उनकी बातों में नोटबंदी से लेकर आगामी चुनाव और ग्राम प्रधानों की कारस्तानियों से लेकर शादी-विवाह की अगुआई जैसे तमाम विषय शामिल थे।

मैंने देखा कि इस बस में कपसेठी से ही स्कूल/कॉलेज के निर्धारित यूनिफॉर्म पहने और अपने कंधों पर किताबों-कापियों से भरे बैग लटकाए लड़कियां सवार होती जा रही थीं। दरवाजे के पास कई युवक भी खड़े थे, जिनमें से कुछ हाव-भाव से विद्यार्थी लग रहे थे। कंडक्टर आश्चर्यजनक रूप से सभ्य और मुस्तैद था। जब भी किसी स्टॉप से कोई छात्रा या छात्राएं चढ़तीं वह दरवाजे के पास खड़े लड़कों/युवकों को समझाकर, विनती कर या धकियाकर आगे ठेल देता ताकि लड़कियों को खड़े होने की जगह बन सके। अधिकांश छात्राएं बनारस से कुछ किमी दूर पहले स्थित एक जाने-माने इंटर कॉलेज में पढ़ती थीं। जंसा बाजार से भी दो-तीन छात्राएं बस में चढ़ीं। उनके पास भी कंधे पर लटकाए जाने वाले बैग थे।

 

साल दर साल के अपने इन प्रवासों के दौरान मैंने कई सकारात्मक (और नकारात्मक भी) बदलाव देखें हैं किंतु जिस एक सुखद बदलाव ने मेरा ध्यान विशेष रूप से खींचा है वह है इस इलाके (या समूचे प्रदेश में ही) में लड़कियों की साक्षरता में अभूतपूर्व वृद्धि। लड़कियां चाहे वे गरीब घरों की हों या खाते-पीते घरों की, सभी कम से कम 10-12वीं तक अवश्य पढ़ाई कर रही हैं। उच्च शिक्षा ग्रहण करनेवाली लड़कियों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। लड़कियों की शिक्षा के प्रति राज्य और केंद्र सरकार की प्रोत्साहन योजनाओं और प्रचार अभियानों ने अनुकूल असर डाला है और आम लोगों में जागरूकता भी बढ़ रही है। इस इलाके में भी लड़कियों के लिए कई नामी-गिरामी स्कूल/कॉलेज खुले हैं जिनमें हजारों बालिकाएँ पढ़ाई कर रही हैं। बहुत सी बच्चियाँ तो पढ़ने के लिए 15-20 किमी दूर तक जाती हैं। सुबह 9 बजे के बाद गाँवों की सड़कों पर साइकिलों पर सवार होकर अथवा तेज किंतु सधे कदमों से रास्ता नापती इन बालिकाओं के झुंडों को देखकर बहुत अच्छा लगता है। हमारी बच्चियाँ पढ़ेंगी तब ही तो हमारी आधी आबादी आगे बढ़ेगी और आत्मनिर्भर बनकर देश को भी आगे बढ़ाएंगी। अतः मैं इसे एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक बदलाव मानता हूँ।

मैंने देखा कि इस बस में कपसेठी से ही स्कूल/कॉलेज के निर्धारित यूनिफॉर्म पहने और अपने कंधों पर किताबों-कापियों से भरे बैग लटकाए लड़कियां सवार होती जा रही थीं। दरवाजे के पास कई युवक भी खड़े थे, जिनमें से कुछ हाव-भाव से विद्यार्थी लग रहे थे। कंडक्टर आश्चर्यजनक रूप से सभ्य और मुस्तैद था। जब भी किसी स्टॉप से कोई छात्रा या छात्राएं चढ़तीं वह दरवाजे के पास खड़े लड़कों/युवकों को समझाकर, विनती कर या धकियाकर आगे ठेल देता ताकि लड़कियों को खड़े होने की जगह बन सके। अधिकांश छात्राएं बनारस से कुछ किमी दूर पहले स्थित एक जाने-माने इंटर कॉलेज में पढ़ती थीं। जंसा बाजार से भी दो-तीन छात्राएं बस में चढ़ीं। उनके पास भी कंधे पर लटकाए जाने वाले बैग थे।

यहाँ से कुछ दूर जाने पर हमारे पास खड़ी लड़कियों (जिनकी उम्र 17-18 वर्ष रही होगी) में से एक ने अपने बैग को मेरे बगल बैठे सज्जन को ‘अंकल’ संबोधित करते हुए अनुरोध के साथ सौंप दिया ताकि उसके दोनों हाथ मुक्त हो सकें और वह ऊपरवाली रॉड को पकड़कर संतुलन बनाकर खड़ी हो सके और अपनी अन्य सहपाठिनियों के साथ गपशप/चुहल कर सके। थोड़ी देर बाद उसने खड़े होने के लिए संतुलन बनाने में जूझ रही अपनी सहेली के बैग को अपने हाथों में ले लिया और मेरी गोद में यह कहकर टिका दिया, ‘दादाजी, प्लीज जरा यह बैग अपने पास रख लीजिए’। मुझे भला क्यों गुरेज होता? मैं तो इस सोच में मगन था कि आज उत्साह और ऊर्जा से लबरेज इन बच्चियों में से भले ही सभी न सही किंतु कुछ तो जरूर आगे जाकर डॉ.क्टर, इंजीनियर, अध्यापिका/ प्राध्यापिका और अधिकारी बनेंगी या अन्य सेवाओं में जाएँगी और अपने माता-पिता, घर-गाँव का नाम रोशन करेंगी।

‘दादाजी’ सम्बोधन सुनते ही मेरी वैचारिक तंद्रा टूटती है और मैं एक पल को आत्मविश्वास और बेबाकी से भरी उस किशोरी को देखता हूँ और अगले क्षण अपनी बाईं ओर बैठे उन अधेड़ वय सज्जन को। मैं सोच में पड़ जाता हूँ कि इस बिटिया ने क्या सोचकर या मानकर इन भाई को तो ‘अंकल’ संबोधित किया और मुझ बमुश्किल 54 साल के आदमी को ‘दादाजी’ की श्रेणी में डाल दिया। मुझे लगा मेरे अधपके बालों (जिनकी संख्या सेवानिवृत्त कर्मचारी की जमापूंजी की तरह दिनोंदिन कम होती जा रही है) और अधपकी खिचड़ी मूंछों को देखकर उसने मान लिया होगा कि मैं भी वरिष्ठ नागरिकों की जमात का ही व्यक्ति हूँ। एक पल के लिए मन में आया कि उसके इस संबोधन पर प्रतिवाद कर पूछूँ कि, ‘बताओ बिटिया, एक 54 साल का आदमी 17-18 साल की किसी कन्या के लिए दादा के समकक्ष कैसे हो सकता है?’ किंतु मन ने कहा, ‘क्यों भाई, तुम देवांश के दादाजी नहीं हो क्या?’ मैंने मन ही मन इस सवाल का जवाब यूं दिया, ‘हाँ हुजूर, किंतु देवांश तो अभी केवल 5 साल का ही है’। मन निरुत्तर होकर शांत हो गया। किंतु दिमाग में किंतु-परंतु की चरखी चलती रही।

मैंने सोचा क्या अब मुझे भी अपने बालों और गेटअप पर ध्यान देना चाहिए और बालों और मूंछों को काले रंग से रंगना (डाई) करना चाहिए। साथ ही, रोजाना दाढ़ी शेवकर कुछ सेंट-वेंट, क्रीम-व्रीम लगानी चाहिए और थोड़ा फैशनेबल किस्म के कपड़े पहनने चाहिए ताकि मैं भी ज्यादा न सही कुछ तो जवान लग सकूँ। मुंबई की विरार लोकल में यात्रा के दौरान भी कई बार ऐसा हुआ है कि पीछे से 40-45 साल के किसी भाई ने पूछा, ‘अंकल, आप भी मीरा रोड उतरेंगे ना !’ यह सवाल इन मौकों पर भी चौंकाता था कि महज 53-54 साल का आदमी इन ‘अधेड़ों’ के लिए ‘अंकल’ क्यों और कैसे हो जाता है? लेकिन हमारे जैसे गँवईं जड़ोंवाले लोग इन संबोधनों का कतई बुरा नहीं मानते बल्कि हमें तो इससे इस खीज और तनाव भरे समय में क्षण भर के लिए ही सही मुस्कुराने की एक वजह सी मिल जाती है। हाँ, उसी तर्ज पर हमने कभी यह उत्तर देने की जरूरत नहीं समझी या जुर्रत नहीं कि, ‘हाँ बेटा, हम भी मीरा रोड ही उतरेंगे।’ इसलिए इस बालिका के द्वारा भी अपने लिए ‘दादाजी’ सम्बोधन पाकर मैं बिलकुल भी विचलित नहीं हुआ बल्कि उसके बेबाकीपने के लिए मन में प्रशंसा के भाव ही उपजे।

'कलट्टरी फारम.... कलट्टरी फारम।' कंडक्टर ने हांक लगाई तो मैं कल्पनालोक और चिंतन की दुनिया से बाहर आया। बनारसवाली बसें अब कलट्टरी फारम (यानी शुद्ध रूप पॉल्ट्री फॉर्म) से आगे नहीं जाती हैं और यहीं से भदोही के लिए लौट जाती हैं। 'अंकल, उठिए.. बनारस आ गया।' बगल बैठे सज्जन से मुझसे कहा। मन में बात आई, 'लो जी, इन्होने भी मुझे नहीं बख्शा।' मैंने मुस्कुराकर उन्हें देखा और बस से उतरकर कैंट जाने के लिए ऑटो पकड़ने के लिए पुराने जीटी रोड की ओर आगे बढ़ गया।

 

हमारे क्षेत्र में यह मान्यता या परंपरा है कि जिस पुरुष के पिता जीवित हों उसे अपनी मूंछे सफाचट नहीं करनी चाहिए। मूँछे घनी हो पतली, काली हों या सफ़ेद, रखनी ही चाहिए नहीं तो पिता का निरादर माना जाता है। हिंदी भाषा में ‘मूँछें मुड़वा देना या कटवा देना’ जैसा मुहावरा शायद गर्व अथवा अभिमान/सम्मान के ऐसे ही प्रतीकात्मक भाव से उपजा होगा। मेरे पिताजी अक्तूबर 2009 में स्वर्गवासी हो चुके हैं। मैंने भी आईने के सामने खड़े होने पर कई बार सोचा है कि अब से मैं भी मूँछे न रखते हुए बिलकुल सफाचट रहूँगा। प्रसंगवश, बताता चलूँ कि मेरे छोटे भाई अजय और मेरे सुपुत्र सुनील, दोनों ही दाढ़ी-मूँछों के बिना सफाचट रहते हैं। ये नई पीढ़ी के युवक हैं जो पुरानी मान्यताओं को अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक मानते हुए और कुछ नए फैशन के चलते अपने तौर-तरीकों से जीते-रहते हैं। हमें बदलते समय के साथ तालमेल बिठाना ही पड़ता है वरना जमाना तो आगे ही बढ़ता जाएगा किंतु हम पीछे छूट जाएँगे।

मेरे संस्थान के एक वरिष्ठ सहयोगी जो उम्र के लगभग 56 वर्ष तक तो अधपके बालों के साथ सफर काट लिए किंतु 3 साल पहले ट्रांसफर पर कोलकाता जाने के बाद से अपने बालों को बाकायदा रंगने लगे हैं। मैं भी सोचता हूँ कि काश! मैं भी कुछ समय कोलकाता में रहा होता तो शायद…..। खैर, मैंने जब भी मूँछों से पीछा छुड़ाने की बात सोची, लगा मेरे पिताजी अदृश्य रूप में मेरे पास आकर खड़े हो गए हैं और कह रहे हैं, ‘का हो, ई का करत हयअ?’ (कहिए जी, यह क्या कर रहे हैं?) और मैं उनकी बात सुनकर नजरें नीची कर चुपचाप उसी तरह से खड़ा रह जाता हूँ जैसे सन 1977 में 12 साल की अवस्था में एक रात बीड़ी का सुट्टा मारते हुए उनके द्वारा पकड़े जाने पर और यही प्रश्न पूछे जाने पर निरुत्तर खड़ा रह गया था। जो लोग भी अपने को चुस्त, जवान, फिट और सुंदर बनाए रखने (या उसका भ्रम बनाए रखने) की जद्दोजहज में लगे रहते हैं और अरबों-खरबों रुपयों के सौंदर्य प्रसाधनों/उपकरणों के बाजार के लिए अमूल्य योगदान दे रहे हैं, उनके लिए मेरी शुभकामनाएँ। जहाँ तक अपनी बात है तो मैं इन आधुनिक साधनों/उपायों से कोई विशेष लगाव नहीं रखता और न ही ‘अंकल’ या ‘दादाजी’ संबोधित किए जाने पर बुरा मानता हूँ। जो है, जैसा है उसी में मस्त रहना मुझे बेहतर जान पड़ता है। रही बात आप सबकी… तो भइया, वह तो आप ही जानें।

‘कलट्टरी फारम…. कलट्टरी फारम।’ कंडक्टर ने हांक लगाई तो मैं कल्पनालोक और चिंतन की दुनिया से बाहर आया। बनारसवाली बसें अब कलट्टरी फारम (यानी शुद्ध रूप पॉल्ट्री फॉर्म) से आगे नहीं जाती हैं और यहीं से भदोही के लिए लौट जाती हैं। ‘अंकल, उठिए.. बनारस आ गया।’ बगल बैठे सज्जन से मुझसे कहा। मन में बात आई, ‘लो जी, इन्होने भी मुझे नहीं बख्शा।’ मैंने मुस्कुराकर उन्हें देखा और बस से उतरकर कैंट जाने के लिए ऑटो पकड़ने के लिए पुराने जीटी रोड की ओर आगे बढ़ गया।

 

गुलाबचंद यादव बैंक में सेवारत हैं और फिलहाल मुंबई में रहते हैं ।

1 Comment
  1. Dr K L Sonkar 'Saumitra' says

    सुन्दर अभिव्यक्ति, बधाई।

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