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#gramya sansthan
आप हमारी पीठ पर डंडा मारें और हम उंगली भी न उठायें
अपर्णा -
रादों की मजबूत प्यारी ने आँखों के सामने मरते बेटे को देखा। इस ह्रदयविदारक घटना ने उन्हें बुरी तरह तोड़ दिया। वे बिल्कुल हताश हो गईं। बहू अनीता और उसके तीन बच्चों की जिम्मेदारी प्यारी पर आ पड़ी। गाँव में रोजगार के नाम पर मजदूरी के सिवा कुछ भी नहीं थी। बस थोड़ी जमीन थी जिस पर खेती-किसानी करके साग-सब्जी लगाकर छ: लोगों के परिवार को संभाला।
क्या रिंकू को अपने परिवार का कहना मान लेना चाहिए?
अपर्णा -
‘ज़िंदगी में कभी-कभी कोई ऐसा मोड़ आता है जब यह समझ में नहीं आता कि किधर जाएँ। और अगर घर के लोग अपने मन-मुताबिक निर्णय लेने के लिए मज़बूर करने लगें तब तो और भी मुश्किल हो जाती है। सारी भावनाएं छिन्न-भिन्न हो जाती हैं। लोगों का अपना मक़सद होता है लेकिन हम जानते हैं कि हमारा जीवन उस निर्णय से फिर गलत दिशा में जा सकता है। अगर हम घरवालों का कहना मान लेते हैं तो वही होगा कि एक बार कुएं से निकले और दोबारा खाई में गिर गए।’ अपने बारे में बताते हुये रिंकू के चेहरे पर एक तकलीफ झलकने लगती है।

