आप हमारी पीठ पर डंडा मारें और हम उंगली भी न उठायें

अपर्णा

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प्यारी के बारे में जब हमें ग्राम्या संस्थान की बिन्दू सिंह ने बताया था तभी से हमारी जिज्ञासा जाग उठी कि प्यारी से चलकर मिला जाए और उनके बारे में जाना जाए। नौगढ़ से निकल कर वाया बसौली-लालतापुर और ठठरा-हनुमानपुर के घुमावदार रास्तों से होते हुए हम नर्वदापुर पहुँचे। भैसौड़ा बांध के पश्चिमी छोर पर प्यारी का मकान सबसे आखिरी मकान है। मिट्टी और खपरैल का यह मकान खेतों के बीच में है। आसपास धान की फसल खड़ी है और यूकीलिप्टस, सागौन, बाँस, शरीफ़े, बबूल और पलाश के पेड़ों से घिरे खेतों की मेड़ों पर गाड़ीगई बाँस की टहनियों के कहीं-कहीं नेनुए-तरोई-करेले की लताएं फूल-फल रही थीं। स्वयं प्यारी के दरवाजे पर खेत में जोन्हरी की सूखी फसल खड़ी थी। हमारे पहुँचने पर सबसे पहले प्यारी की बहू घर से निकली। बिन्दु सिंह ने पूछा –‘का हो अनीता, हमारी हीरोइन कहाँ है?’ अनीता ने कमरे की ओर इशारा करते हुये जवाब दिया –‘घर में ही सज रही हैं।’ और ठठाकर हँस पड़ी।

तुरंत ही प्यारी के पति गणेश बाहर निकाल आए और सभी का अभिवादन किया। अनीता कुर्सियां उठा लाई। हमारे बैठने के बाद प्यारी आईं। साँवली सी हट्टी-कट्टी और लंबी धज और सहज लेकिन दबंग चाल-ढाल। प्यारी की आवाज में ओज है। आते ही वे बिन्दू सिंह से लिपट गईं –‘बहुत दिन बाद अइलू ह दीदी।’

इन दोनों औरतों का लंबा संग-साथ रहा है। बिन्दु सिंह के कई अभियानों की नायिका रही हैं प्यारी। लखनऊ, दिल्ली, जयपुर, पटना सहारनपुर, महोबा जैसे न जाने कितने शहरों में वे गई हैं। उन जगहों की ढेरों यादें उनके ज़ेहन में है। इसके बावजूद कि जब वे बोलती हैं तो जोश-ओ-खरोश में बोलती हैं लेकिन आज वे थोड़ी सकुचाती हुई प्रतीत हो रही थीं। उनकी दोनों पौत्रियाँ अंदर कमरे से निकल कर दरवाजे पर मुस्करा रही थीं और कई बार बुलाने पर भी पास नहीं आईं। थोड़ी देर में प्यारी के पति गणेश घर से बाहर निकले। उन्होंने हम सबका अभिवादन किया और पास में ही बैठ गए। अनीता ने तब तक जग में पानी और तश्तरी में गुड लाकर रख दिया।

अपनी सहेली बिन्दू सिंह से बहुत दिनों बाद मिलने पर चेहरे पर झलक रही प्यारी की ख़ुशी

सत्रह साल पहले बरसात के दिनों में प्यारी के दो बेटों में से छोटे बेटे की आकाशीय बिजली गिरने से असामयिक मृत्यु हो गई। प्यारी भी पास में थीं लेकिन वे बाल-बाल बच गईं। शरीर और इरादों की मजबूत प्यारी ने आँखों के सामने मरते बेटे को देखा। इस ह्रदयविदारक घटना ने उन्हें बुरी तरह तोड़ दिया। वे बिल्कुल हताश हो गईं। बहू अनीता और उसके तीन बच्चों की जिम्मेदारी प्यारी पर आ पड़ी। गाँव में रोजगार के नाम पर मजदूरी के सिवा कुछ भी नहीं थी। बस थोड़ी जमीन थी जिस पर खेती-किसानी करके साग-सब्जी लगाकर छ: लोगों के परिवार को संभाला। जहां आज प्यारी रहती है, उस जमीन को पाने और घर बनाने के लिए उन्होंने वन-विभाग से लड़ाई की और आज वन विभाग की  जमीन पर सारे गाँव के लोग घर बनाकर रहते और खेती करते हैं। गरीब इंसान के लिए कुछ भी हासिल करना आसान नहीं है। बहरहाल।

प्यारी की कड़ियल आवाज में बहुत मिठास भी है और जब वे अपनी बात को लयबद्ध तरीके से कहती हैं तो कान अपने आप उनकी बातों की ओर आकर्षित हो जाते हैं। उन्होंने अपनी कहानी सुनाना शुरू किया, ठेठ भोजपुरी लहजे में। उनके कहने के अंदाज और आँखों की चमक का अपना वैभव है। मैंने पूछा – बिन्दू जी आपकी तारीफ बहुत करती हैं। आपकी पहचान उनसे कैसे हुई और आपकी सखी कैसे बन गईं? इतना पूछना था कि प्यारी ने बिना रुके बोलना शुरू कर दिया-‘अरी, दू हजार एकै से परिचय है। अइसे ही जइसे आज आ गइलन हैं। वइसे ही घुमत-फिरत। बातचीत होखे लगल।

‘हम महिलाओं ने बिन्दू सिंह के मार्गदर्शन में सन 2000 में एक संगठन बनाया। बिन्दू सिंह ही हैं जिन्होंने खुद आगे आकर काम नहीं किया बल्कि हमें आगे रहकर आवाज उठाने की हिम्मत दिलाई। इस प्रेरणा के बाद ही हमलोगों ने सरकारी अस्पताल में फैली अव्यवस्था और रोगियों की उपेक्षा को लेकर तहसील में और जिले में मोर्चाबंदी की। प्रसव के दौरान महिलाओं के साथ होनेवाली लापरवाही के कारण लगातार मौतों को लेकर लखनऊ में जाकर धरना-प्रदर्शन किया। पूरे प्रदेश से हजारों महिलाओं ने लखनऊ में इकट्ठा होकर विरोध प्रदर्शन किया। पुतला जलाकर नारे लगाए और स्वास्थ्यमंत्री से मुलाकात कर कहा कि सरकारी अस्पतालों की स्थिति ठीक की जाए। इन लोगों की मांग थी कि प्रसव के दौरान होने वाली मृत्यु को रोका जाए।  जहां तक लड़ने का मामला है तो आपको बता दें कि हम कई जगह आवाज उठाए।’

उन दिनों को याद करते हुए प्यारी ने कहा – ‘अभी आप लोग जब मेरे घर आए तो देखे होंगे कि सड़क से यहाँ तक पैदल चलकर आना पड़ा होगा। यही होता था कि यहाँ से रेंगकर जाने पर पक्की रोड तक जाएँ और वहाँ इंतजार करने के बाद प्राइवेट गाड़ी मिलती थी। उस गाड़ी से नौगढ़ तक जाते थे। यदि गाड़ी भरी हुई होती तो नहीं जा सकते थे और साथ में कोई मरीज हो या गर्भवती महिला हो तो परेशानी और बढ़ जाती थी। ठूँसकर जाना पड़ता था लेकिन नौगढ़ पहुंचते-पहुंचते डर बना रहता था कि मरीज जिंदा भी रहेगा या नहीं। मैंने बतौर स्वास्थ्य कार्यकर्ता जिला स्तर पर आवाज उठाया कि बेसिक सुविधा हमारे गाँव तक तो पहुंचनी ही चाहिए। यह बात 11 (महीना और सन उन्हें याद नहीं आया) तारीख की है और मैं 15 तारीख को दिल्ली के जंतर-मंतर में होने वाले आंदोलन के लिए चली गई। उसी दिन हमारे गाँव में चिकित्सा विभाग के कुछ कर्मचारी दारू-मुर्गा की पार्टी कर रहे थे। इन लोगों ने मुझे (प्यारी को) याद किया। लोगों ने बताया कि प्यारी तो दिल्ली गई हुई है। उसी रात एक हरवाहे के यहाँ उसकी पत्नी को लेबरपेन हुआ लेकिन हरवाहे के मालिक ने उसकी किसी भी तरह की कोई मदद नहीं की। न तो घर पर उपलब्ध गाड़ी दी, न ही  कोई आर्थिक बंदोबस्त ही किया। ऐसे समय में गाँव में पहली बार एम्बुलेंस आई। लोगों ने कहा एम्बुलेंस से लेकर तो जा रहे हो। उसे कुछ होना नहीं चाहिए। यदि कुछ हुआ तो आप लोगों की कोई खैर नहीं। लेकिन सब ठीकठाक रहा। माँ और बच्ची दोनों एकदम सही-सलामत गाँव वापस आ गए। तो यह आंदोलन की पहली सफलता थी। सरकारी अस्पताल पहले बच्चे पैदा करने पर 200-500 रुपया मांगते थे। कुछ लोग अपनी खुशी से दे दें यह अलग बात है। लेकिन इस आंदोलन से लोग जागरूक हुए कि सरकारी अस्पताल में किसी भी तरह के इलाज का कोई पैसा नहीं देना पड़ता है। मेरे दो बच्चे अस्पताल में ही हुए लेकिन मैंने तो पहले ही कह दिया था मेरे पास एको रुपिया नहीं है। और न मैं दूँगी। मुझसे तो किसी ने चवन्नी भी नहीं मांगा। संगठन बनाने और उसमें काम करने का यह फायदा हुआ कि हम लोग अधिकारों को लेकर सचेत हुए।’

वे कहती हैं -‘संगठन तो बना लेकिन आर्थिक दिक्कतें तो थीं ही। बिन्दू दीदी ने कहा – तब एक समूह बना ल। सामूहिक बातचीत चलावल लगलीं दीदी। न कुछ देब, न कुछ लेब। दस रुपया क समूह बना ल जा, कोई से चोरी मत करिहा, न अपने पति से, न अपने घरे-द्वारे से। खाना बनऊबे जात तो रोज एक मुट्ठा चावल धरात जा, तीस दिना के तीस मुट्ठा चावल धरबू जा। महीने के अंत में उसे बेचकर दस रुपया मिल जाता। समूह बनने के बाद महिला स्वास्थ्य अधिकार मंच बना। गाँव की महिलाओं का संगठन बना। संगठन में अपने अधिकार के बारे सोचना समझना आया। इसके पहले हम लोगों को अपने अधिकार के बारे में न ब्लॉक में, न तहसील में और न ही जिला में कोई बताने और समझाने वाला था कि हमारा अधिकार क्या है? संगठन ने हमें अपने अधिकार के लिए लड़ना सिखाया।’

माइक के सामने जनगीत गाते हुए प्यारी और अन्य महिलाएं

‘क्या अब नौगढ़ के अस्पताल में इलाज अच्छे से होता है?’ पूछने पर प्यारी ने बताया कि ‘पहले तो कुछ भी नहीं था इस गाँव में, लेकिन अब ऐसा है कि महीने में एक बार आशा, एएनएम आती हैं। जो गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों, धारित्री के लिए उपलब्ध जानकारी और सुविधा देकर जाती हैं। जहां पहले कभी दर्शन नहीं होता था लेकिन अब महीने में एक बार आती हैं। ये संगठन और ग्रामीणों में अपने अधिकार को लेकर आई चेतना का एक नमूना है कि जहां कुछ भी नहीं हो पाता था, वहाँ अब महीने में एक बार स्वास्थ्य कर्मचारी आते हैं।’

प्यारी यह बात अच्छी तरह समझ चुकी हैं कि संगठन में कितना दम है। उन्होंने कहा ‘यदि संगठन ज्यादा मजबूत हो जाए तो काम और बेहतर हो सकेगा। इसी संगठन के साथ रहते हुए वे लखनऊ से लेकर,हरिद्वार,महोबा, भोपाल, सहारनपुर गईं। बीच-बीच में बिन्दू सिंह को श्रेय देना नहीं भूलीं। हँसते हुए उन्होंने कहा – ‘जहां जहां दीदी गईं, वहाँ-वहाँ हम भी गए।’ इसे सुनकर बिन्दु सिंह ने पूछा और दिल्ली? दिल्ली नाहीं गइलू? इतना सुनना था कि प्यारी ने तुरंत कहा ‘हाँ, दिल्ली भी गइल रहली।’ ‘क्या हुआ था दिल्ली में?’मैंने पूछा। उन्होंने बताया कि- ‘हम कहाँ आ गए हैं? तो मुझे बताया गया दिल्ली है ये। मैंने कहा – यही दिल्ली है? मैंने कहा दुनिया का विकास दिल्ली में ही हुआ। हमारे गाँव में तो सबका घर घास-फूस का है। कब आंधी या जाए कब सब उड़ जाए। दिल्ली आकर हम अपनी समस्या सुना रहे हैं। हमारा दुख यदि सरकार नहीं सुनती है तो ये जान ले कि इस बार तो कम संख्या में हम लोग आए हैं लेकिन अगली बार भारी संख्या में आकर सरकार की कुर्सी हिला देंगे।’ एक अनपढ़ महिला का इस तरह दिल्ली जैसे बड़े शहर में बेबाकी और साहस के साथ अपनी बात रखना बहुत बड़ी बात है।

बातचीत के बीच में उनसे निजी बातें करते हुए पूछा कि आपका मायका कहाँ है? उन्होंने बताया कि मधुपुर के हरैयां में मायका है। 16 वर्ष की उम्र में गणेश के साथ इनकी शादी हुई। परिवार के बारे में पूछने पर बहुत उदास होकर कहती हैं परिवार के बारे में क्या बताएं? जो भी टूटा-फूटा परिवार है। अपनी धूल-मिट्टी में कमाते-खाते हैं। दो बच्चे थे उसमें से एक बचा। बड़े बेटे की बहू साथ है। हम लोगों के पास कोई काम-धाम नहीं है। थोड़ी-सी खेती है लेकिन पानी की सुविधा नही है तो धान नहीं लगा पाए। तीन पोते-पोती हैं। उसमें से दोनों पोतियाँ आठ तक पढ़कर बंद कर दी हैं क्योंकि कॉपी-किताब, ड्रेस के लिए पैसा नहीं हो पाता है। पोता है वह बीए कर रहा है। उसे भी जैसे-तैसे पेट काटकर पढ़ा रहे हैं। इस बात को सुनकर मुझे थोड़ा धक्का लगा। गाँव-शहर लड़कियों को लेकर लगभग एक सी सोच है कि लड़के का पढ़ना जरूरी है, लड़कियों का क्या कितना भी पढ़ लें उन्हें दूसरे घर जाकर चूल्हा ही फूंकना है। जबकि प्यारी के जीवन संघर्ष को देखकर यह तो कहा ही जा सकता कि यदि वे ठान लेतीं तो दोनों लड़कियों को भी पढ़ा सकती थीं।

प्यारी अपने पति गणेश, अनीता और दोनों पोतियों ख़ुशी और

प्यारी ने बताया कि जब वे पहली बार गाँव की दहलीज पार कर सहारनपुर गई थीं तो गाँव वालों ने मुझे बहुत कुछ कहा कि गाड़ी में जाएंगी तो वहाँ तो ढेर औरत-पुरुष भरे रहते हैं। गाड़ी में बैठने पर किस-किस से सटना पड़ेगा। और भी बहुत कुछ। संकुचित सोच वाले समाज में पुरुषों को सबसे ज्यादा डर महिलाओं के घर से निकलकर आत्मनिर्भर हो जाने से लगता है। उन्हें लगता है गाँव की एक महिला बाहर निकल गई है तो यहाँ की दूसरी महिलाओं के लिए रास्ता खुल सकता है। लेकिन गणेश ने कहा कि यदि तुमने सोच लिया है जाने का, तो तुम जाओ। कोई कुछ भी कहे उससे कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। बस फिर क्या था उसके बाद कई बार बाहर जाने का मौका मिल और मैं गई।

प्यारी पहले चकचुइयाँ में रहती थीं। उन्होंने बताया कि एक बार वन विभाग ने खेतों में सैकड़ों गड्ढे खोद दिए, जिस पर फसल लगी हुई थी। अचानक बिना किसी सूचना के वन विभाग के लोग पहुंचकर खड़ी फसल को चौपट करते हुए गड्ढे खोद दिए। गाँव वाले परेशान होकर बिन्दू सिंह को तुरंत फोन लगाये। बिन्दू सिंह (ग्राम्या संस्थान) के बुलाने पर उनके साथ-साथ अन्य सामाजिक संस्थाओं के लोग भी पहुँच गए। ऐसे समय में आसपास के गाँव के हजारों लोग ढोलक-मंजीरा लेकर इकट्ठा हो गए,खूब जमकर गाये-बजाये। बिना डरे साहस के साथ उन खोदे गए गड्ढों में एक-एक मुट्ठी मिट्टी डालते हुए आगे बढ़ते गए और गड्ढे भर गए। गाँव वालों की एकजुटता देखते हुए वन विभाग वालों का दुबारा कभी ऐसा करने का साहस नहीं हुआ और उसके बाद उन्होंने कभी इस तरफ मुड़कर नहीं देखा। आज वह जमीन सब लोगों को मिल गई, वे उस पर खेती कर रहे हैं।आपकी जमीन भी वहाँ थी? पूछने पर प्यारी ने कहा- ‘नहीं, उस जमीन को पाटने तो मैं गई थी लेकिन मेरी वहाँ कोई जमीन नहीं थी। निराश होकर कहती हैं कि अब उन लोगों को किसी तरह के आंदोलन की कोई जरूरत महसूस नहीं होती। काम निकल गया और दुख दूर हो गया।

अपने संघर्ष की एक और दास्तान को याद करते हुए वह बताती हैं कि ‘अपने अधिकारों के लिए लड़ना सीख तो लिया लेकिन आसपास के लोगों और प्रशासन की आँख का काँटा भी बन गई। मुझे कमजोर करने के लिए मेरे ऊपर नक्सली होने का आरोप लगाया गया। फागुन का महीना था। यहीं पर एक मड़ई थी और घर बनाने का काम चल रहा था। धूप तेज थी और सिर पर बोझा ढोकर ले आने के बाद थकान सी लगी और मैं यही पड़ी हुई खटिया पर आराम करने के लिए ढरक गई। उसी समय गणेश आए। वे भी बन रही दीवाल के लिए मिट्टी में मिलाने के भूसा लेकर आए थे। मैंने उनसे कहा बहुत तेज प्यास भी लग रही है। पास ही कुआं था। वे गए और बाल्टी में पानी ले आए। हम दोनों पानी पीकर बैठे ही थे कि अचानक गोली चलने की आवाज आने लगी। मैंने कहा कि होली का दिन पास आ रहा है तो स्कूल में बच्चे धड़-धड़ फटाका फोड़ रहे हैं।

‘ऐसी बातचीत हम दोनों कर ही रहे थे कि देखा कि बहुत सारे पुलिस के लोग खेत से इस तरफ ही आ रहे थे। हम मड़इया से निकले, तो पुलिस वालों ने गाली देना शुरू कर दिया- वहाँ से भागकर आकर मड़इया में घुस जाते हो। गाली सुनना था कि मैंने पुलिस वालों से तुरंत कहा साहब जबान संभालकर बोलिए। इतना सुनकर वे मेरा हाथ पकड़कर उल्टा-सीधा कहने लगे। गणेश ने भी कहा कि साहब गाली मत दीजिए। गणेश की बात सुनकर पुलिस वाले ने पूछा ये कौन है? मैंने कहा मेरा परिवार (गाँव में परिवार का मतलब पति से होता है)। इतना सुनना था कि पुलिस वाला डंडा से मेरे पति को मारने लगा। डंडा मारते देख मुझे बहुत तेज गुस्सा आया और मेरे ऊपर भूत सवार हो गया। मैंने तुरंत जमीन से दोनों मुट्ठी में मिट्टी भरकर पुलिस वाले के चेहरे पर सपोट (फेंक) दिया। अचानक हुए इस रिएक्शन के बाद के बाद वे शांत हो गए। लगभग 25 एसओ-दरोगा थे। वे हमें मारने की फिराक में थे। अचानक उन्होंने मुझे झटका मारा, झटका मारने से मैं नीचे गिर गई। मेरे गिरने के बाद कुछ पुलिस वालों ने दोनों पैर उठाकर मुझे बुरी तरह मारा। इतना मारते देख कुछ पुलिस वाले उन्हें रोक रहे थे। इतनी मार खाने के बाद मैं बेहोश हो गई। उसी समय मेरी पतोहू (बहू) वहाँ पहुँच गई। पुलिस वाले ने कहा कि इसे उठाओ। पता नहीं मेरी पतोहू अनीता को कहाँ से इतनी हिम्मत आ गई कि उसने कहा कि जब मारना है तो जान से मार डालो, मैं नहीं उठाऊँगी। पुलिस वाले शायद घबरा गए थे। उन्होंने फिर पतोहू से कहा – उठाओ! उठाओ! नहीं मारेंगे अब। उठाने के बाद घर नहीं जाने दिया। वहीं से स्कूल के पास ले आए, जहां दो गाड़ी खड़ी थी। एक गाड़ी में पतोहू और ससुर को बिठाया और एक गाड़ी में मुझे अकेले बिठाया और नौगढ़ ले आए।

प्यारी अपने पति गणेश के साथ,जिन्होंने प्यारी को आगे बढ़ने का हौसला दिया

उसके बाद रात में ही पूछताछ शुरू हुई। पतोहू से ढेर पूछताछ की- कहाँ से आई हो? क्यों आई हो? उनसे बताया कि यहाँ मेरी शादी हुई है। मेरे सास-ससुर हैं ये लोग। मेरा घर यहीं है। गणेश और पतोहू दोनों बैठे थे और मैं पैर फैलाकर वहीं ढरक गई थी। रात बारह बजे दरोगा आया। जब-जब वहाँ से कोई पुलिस वाला निकलता, मेरे पैरों में ठोकर मारकर निकलता। मैंने थोड़ी देर देखा फिर गुस्से में कहा घर पर तो इतना मारे हो यहाँ भी मारोगे, मेरा पैर तोड़ दोगे क्या? जैसे-तैसे रात बीती, सुबह हुई। दस बजे के करीब हम लोगों को छोड़ा गया। थाने से बाहर आए। वहाँ खड़े दरोगा ने मुझे बुलाया और पूछा – आप ही प्यारी हो? मैंने कहा – हाँ। उन्होंने कहा – आप उंगली चमकाकर (उंगली दिखाकर) बात करती हो? मैंने कहा – हमारी पीठ पर डंडा मारेंगे तो हम उंगली चमकाकर बात नहीं करेंगे। वहीं हमारे गाँव के एक बुजुर्ग खड़े थे उन्होंने मुझसे कहा कि ये साहब हैं। मैंने उन बुजुर्ग का दोनों हाथ पकड़कर कहा साहब हैं तो क्या हमको पीसकर पी जाएँगे। हमारी पीठ पर डंडा मारेंगे तो हम उंगली चमकाकर बात क्यों नहीं करें। इसके बाद रात में जो फॉर्म भरे थे,  उसे काट-वाट कर कैन्सल कर दिए और घर जाने की अनुमति दे दिए।

गणेश भी हम लोगों के पास ही बैठे थे। उनसे भी प्यारी के बारे जानना चाहा तो बताया कि 1967 में प्यारी से शादी हुई। पहले भी ऐसी थीं? गणेश ने कहा कि नहीं, पहले ऐसी नहीं थीं। वो तो बिन्दू दीदी के संपर्क में आने के बाद समाज में उठने-बैठने से हिम्मती हुईं। मुझमें इतनी हिम्मत नहीं है जितनी प्यारी में है। यह बात गणेश सहज रूप से स्वीकार करते हैं।

प्यारी की बहू (पतोहू) अनीता

प्यारी ने अपनी बहू के बारे में बताया कि जब बेटे की मौत हुई तो अनीता की ज्यादा उम्र नहीं थी। मैंने उससे कहा कि यदि मायके जाकर रहना चाहती है तो वहाँ जा सकती है। और यदि दूसरी शादी करना चाहती है तो तीनों बच्चों को मैं पाल लूँगी। तुम शादी कर सकती हो लेकिन अनीता ने ऐसा कुछ भी करने का मन नहीं बनाया। आज प्यारी ने अनीता को बहुत साहसी बना दिया है।  वे भी गलत का विरोध करना सीख ली हैं।

अनीता को विधवा पेंशन मिलती है और मिड डे मील में वे रसोइया हैं। सहज और हंसमुख अनीता से मिलने जब मैं घर के अंदर पहुंची तो वहाँ दो कमरे थे। सामने वाले चौथाई हिस्से में रसोई बनाई गई थी। अनीता चूल्हे पर शाम के नाश्ते के लिए मकई के दाने फोड़ रही थी। मैंने उनसे हालचाल लिया। हँसते हुए उन्होंने बच्चों के बारे में बताया और बाहर चलकर बैठने को कहा। शायद घर की स्थिति को देखते हुए संकोच कर रही थीं। मैंने उनके संकोच को समझते  बाहर आकर बैठना ही उचित समझा। कुछ देर में हमारे लिए मकई के दाने लाकर रख दिया और खुद भी हम लोगों के पास आकर बैठ गईं।

अपर्णा रंगकर्मी और गाँव के लोग की कार्यकारी संपादक हैं।

1 Comment
  1. Gulabchand Yadav says

    बढ़िया और यथार्थपूर्ण रिपोर्टिंग। इन साहसी बहनों को सलाम जो अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हैं और हर तरह के अन्याय और अत्याचार का जमकर प्रतिकार करती हैं।

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