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भारतीय राजनीति में नफ़रत के बोल और गालीबाजों का बढ़ता बोलबाला

आरएसएस की शाखाओं में महान हिंदू राजाओं और दुष्ट मुस्लिम राजाओं की कहानियों के अलावा, स्कूलों और उसके द्वारा संचालित मीडिया के ज़रिए फैलाई जाने वाली नफ़रत, 1977 के बाद और भी बढ़ गई, जब सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रूप में लालकृष्ण आडवाणी ने यह सुनिश्चित किया कि समाचार एजेंसियों में सांप्रदायिक मानसिकता वाले लोग घुसपैठ करें। मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही, मोदी के करीबी कॉर्पोरेट जगत ने प्रमुख समाचार पोर्टलों को खरीदना शुरू कर दिया और भारतीय मीडिया को गोदी मीडिया में बदल दिया। सोशल मीडिया और भाजपा आईटी सेल ने इसमें और इज़ाफ़ा किया।

लोकप्रियता के नाम पर साम्प्रदायिक हिंसा फैलाने में दक्षिणपंथी कवियों और गायकों की भूमिका

अभी तक यही बात मानी जाती थी कि कि कविता, गाने और संगीत लोगों के मनोरंजन के लिए होता है लेकिन यह देखा जा रहा है कि कविता और गीतों का उपयोग देश में साम्प्रदायिक ज़हर फ़ैलाने के लिए भी किया जा रहा है। हिन्दू त्योहारों और जुलूसों के दौरान अल्पसंख्यक समुदाय को डराने और हिंसा करने के लिए लगातार भड़काऊ गाने बजाये जा रहे हैं। यह बात निर्भीक पत्रकार कुणाल पुरोहित ने अपनी विचारोत्तेजक पुस्तक ‘एच-पॉप’ में लिखी है। जिसमें स्पष्ट लिखा है कि हिन्दुत्वादी कवि, लेखक और पॉप गायकों की रचनाएं देश में विशेषकर हिन्दुभाषी प्रदेशों में गाई,बजाई और पढ़ी जा रही हैं, जिसका असर साम्प्रदायिक उन्माद और दंगों के रूप में सामने आ रहे हैं।

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