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विभाजन और वापस आने की बेचैनी : एक बार फिर तकलीफ़ उकेरती हुई फिल्म
आज़ादी के साथ ही तोहफे में मिला विभाजन भारत के करोड़ों लोगों की त्रासदी है जो जब भी खुलती है तो एक नया दर्द लेकर आती है। यह कल्पना की जा सकती है कि दोनों तरफ से अपना देश छोड़कर जाते लोगों ने कितने दुःस्वप्नों के बीच अपना जीवन गुजारा होगा और किस तरह अपनी बिखरी ज़िंदगियों को फिर से पटरी पर चलने लायक बनाया होगा। दुर्भाग्य से आज़ाद भारत में अभिव्यक्ति का सबसे ताकतवर माध्यम बन जाने वाले भारतीय सिनेमा ने उसे चलते-फिरते निपटा दिया है। पिछली सदी के अंतिम दशक तक आते-आते हिन्दी सिनेमा ने जहाँ भारत-पाकिस्तान के बीच के अंतर्विरोधों को बिकाऊ माल बना दिया वहीं विभाजन की विभीषिका के साथ वह न्याय नहीं कर सका। अब तो सिनेमा को दो देशों के बीच विद्वेष को राजनीतिक औज़ार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। कहना जरूरी है कि ऐसा सिनेमा नफरत को बढ़ाते हुए दिमाग में फफोले पैदा कर रहा है। इसी बीच आई इम्तियाज़ अली की फिल्म मैं वापस आऊँगा एक अलग अनुभव के साथ आई है। इस फिल्म ने एक अधूरे छूट गए प्रेम के बहाने त्रासदियों और तकलीफ़ों का जो जखीरा पेश किया है वह स्तब्ध कर देता है। इसे देखकर विचलित हुए बिना नहीं रहा जा सकता। इसके बहाने विभाजन और उसके अनेक आयामों के साथ इम्तियाज़ अली के सिनेमा का गंभीर विवेचन करता सिनेमा के अध्येता डॉ राकेश कबीर का यह लेख -

