बहुजन
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रोहिणी कमीशन की सिफारिशों का उद्देश है ओबीसी को बांटना: सुनीलम
राष्ट्रीय ओबीसी दिवस पर जाति जनगणना कराने की मांग करते हुए मंडल कमीशन की सभी सिफारिशों को लागू करने की मांग
गोसाई की बाजार (आजमगढ़)। अगस्त राष्ट्रीय ओबीसी दिवस पर...
मसुरियादीन पासी की पुण्यतिथि के बहाने पासी जाति को साधने की कोशिश
लखनऊ के अल्पसंख्यक कांग्रेस ने प्रदेश भर में पासी समाज के महानायक संविधान सभा के सदस्य और कांग्रेस...
सामाजिक न्याय की वास्तविक लड़ाई के बिना भाजपा को हटाने का सपना थोथा होगा
दिनांक 13 मार्च को यह लेखक प्रो. रतन लाल के चैनल आंबेडकरनामा पर था। चर्चा का विषय था-...
मान्यवर कांशीराम ने कैसे मेरे जीवन की धारा मोड़ दी
मान्यवर कांशीराम के विचारों और प्रयासों से लाखों-करोड़ों शूद्रों को मानसिक गुलामी से आजादी मिली। आज उनकी जयंती...
शरद यादव की महत्ता और प्रासंगिकता के कई आयाम हैं
समाजवादी आन्दोलन की उपज शरद यादव का व्यक्तित्व-कृतित्व बिल्कुल खुला था। उनकी कथनी-करनी में कोई अंतर नहीं दिखाई दिया।वे शुरू से ही चौका और...
केसी सुलेख जिन्होंने संविधान सभा में बाबा साहब का ऐतिहासिक भाषण सुना था
25 नवंबर, 1949 को बाबा साहब अंबेडकर संविधान सभा में अपने दिल से निकली बात रख रहे थे कि आज हमने राजनैतिक जीवन में...
क्या आपने गुलामगीरी पढ़ा है?
गुलामगीरी में फुले ने ब्रह्मा के चार मुख, आठ भुजाओं और विभिन्न मिथकों को सीधे-सादे तर्क से खारिज करते हुए उसे एक हास्यास्पद परिघटना में बदल दिया है। इसी प्रकार आगे चलकर शेषशायी विष्णु की नाभि से कमलनाल का उद्भव और उसमें ब्रह्मा का चारमुखी आकार और भी विचित्र और मनगढ़न्त कपोल कल्पना है। फुले ने ब्राह्मणवाद द्वारा फैलाए गए गहरे अंधकार को काटते हुए उस मूल धारा की नष्ट हो चुकी अस्मिता को प्रकाश में लाने के लिए ब्राह्मणवादी स्थापनाओं पर जमकर प्रहार किया है और अपनी तर्क-दृष्टि से उन्हीं मिथकों को उल्टा टाँग दिया है जिनके बल पर ब्राह्मण अपने वर्चस्व की स्थापना करता है।
सामाजिक विवेक से शून्य हिंदुओं का प्रभु वर्ग!
हाल ही में मैंने फेसबुक पर सवर्ण समुदाय की अमानवीयता पर एक पोस्ट डालकर बताया कि यह समाज वर्ण व्यवस्था के वंचितों अर्थात बहुजनों...
राजेंद्र यादव की शख्सियत
राजेंद्र यादव के बिना बीसवीं शताब्दी के हिन्दी साहित्य की कल्पना नहीं की जा सकती। उन्होने एक उपन्यासकार , कथाकार , आलोचक , चिंतक और संपादक के रूप में जो मानक रखे उसे छू पाना किसी के लिए भी एक असाध्य यात्रा होगी । सही अर्थों में राजेंद्र यादव हिन्दी साहित्य में समकालीनता के पर्याय हैं। उनका पूरा जीवन मनुष्य की चुनौतियों, संकटों, संघर्षों और सीमाओं के आंकलन-मूल्यांकन और उनका मार्मिक चित्रण करने के लिए समर्पित था। समाज को प्रभावित करने वाले बदलावों पर न केवल उनकी तीखी नज़र रहती थी बल्कि वे उनपर बिना लिखे रह भी नहीं पाते थे।
देश में आरक्षण की स्थिति
देश में आरक्षण (रिजर्वेशन) का मुद्दा वर्षों से चला आ रहा है। आजादी से पहले ही नौकरियों और शिक्षा में पिछड़ी जातियों के लिए...

