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अब मैं साँस ले रहा हूँ

सामाजिक आक्रोश और प्रतिकार का बिगुल हैं कविताएं

आदमखोर   केवल जानवर हो सकता है इंसान नहीं, तू भी इंसान नहीं हमारी हड्डियों को चाभने वाला दोपाया जानवर है आदमखोर…
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