प्रो. मनोरंजन मोहंती का व्याख्यान
यह मानना जल्दबाजी होगी कि ब्रिक्स का उदय और विस्तार अमेरिकी साम्राज्यवाद के विकल्प का कोई संकेत है। न तो ब्रिक्स देशों ने कभी स्वयं को ऐसा कहा है, और न ही इसे ऐसी अपेक्षाओं के साथ देखा जाना चाहिए। फिर भी, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि ब्रिक्स देशों के समूह में यह संभावित क्षमता अवश्य है कि वह अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती देने वाली शक्ति के रूप में विकसित हो सके। विश्व के भू-राजनीतिक परिदृश्य में पिछले कुछ वर्षों में घटी घटनाएँ उन देशों को एक-दूसरे के अधिक निकट ला रही हैं, जो लंबे समय से अमेरिका के निशाने पर रहे हैं। यूक्रेन और रूस के बीच छद्म युद्ध, जो वस्तुतः नाटो और रूस के बीच युद्ध है, फ़िलिस्तीन में जारी नरसंहार, तथा हाल ही में अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर थोपा गया युद्ध — ये प्रमुख घटनाएँ हैं जिन्होंने विश्व भर के देशों के पुनर्गठन की प्रक्रिया को तीव्र किया है। भारतीय सरकार अब भी इस दुविधा में है कि वह अमेरिकी खेमे के साथ बनी रहे या तेजी से उभर रहे ग्लोबल साउथ के साथ जुड़े।
प्रो. मनोरंजन मोहंती के व्याख्यान और उसके बाद हुई चर्चा ने हमारे आसपास रोज़ घटित हो रहे इन महत्त्वपूर्ण घटनाक्रमों पर ऐसी अनेक महत्त्वपूर्ण अंतर्दृष्टियाँ सामने आयीं। प्रो. मोहंती 16 जून 2026 को दिल्ली के अजय भवन में जोशी-अधिकारी इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज़ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में ‘बांडुंग से ब्रिक्स तक: नयी चुनौतियाँ’ विषय पर बोल रहे थे।
प्रो. मोहंती ने बताया कि सदियों के शोषण के बाद अनेक नवस्वतंत्र पूर्व उपनिवेशों ने 18–24 अप्रैल 1955 को इंडोनेशिया के बांडुंग में एक ऐतिहासिक बैठक आयोजित की थी। अफ्रीका और एशिया के उनतीस देशों के प्रतिनिधि शांति, बहुपक्षीय विकास और विश्व राजनीति में ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधित्व पर चर्चा करने के लिए एकत्र हुए थे। उन्होंने साम्राज्यवाद-विरोधी वैकल्पिक विश्व-व्यवस्था को आकार देने वाली पाँच प्रमुख घटनाओं का उल्लेख किया। ये घटनाएँ थीं: लीग अगेंस्ट इम्पीरियलिज़्म, ब्रुसेल्स (1927), एशियन रिलेशंस कॉन्फ्रेंस, दिल्ली (1947), बांडुंग, इंडोनेशिया (1955), गुटनिरपेक्ष आंदोलन, बेलग्रेड (1961), और न्यू इंटरनेशनल इकनॉमिक ऑर्डर (1974)। उन्होंने कहा कि ग्लोबल साउथ का इतिहास औपनिवेशिक शोषण का रहा है, और इन देशों ने साम्राज्यवादी शक्तियों के उत्थान को देखा, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने बांडुंग सम्मेलन और गुटनिरपेक्ष आंदोलन के रूप में अपनी दृढ़ता प्रदर्शित की। आज भी, इसमें कोई संदेह नहीं कि साम्राज्यवाद अत्यंत शक्तिशाली है, लेकिन साम्राज्यवाद के विरुद्ध प्रतिरोध भी उतना ही प्रबल है। साम्राज्यवाद इसलिए भी इतना आक्रामक दिखाई देता है क्योंकि वह अपने विरुद्ध उठने वाले प्रतिरोध से भयभीत है। और यही संघर्ष की गतिशीलता है। साम्राज्यवाद आज निर्विरोध नहीं है। इस साम्राज्यवादी प्रभुत्व को दी जा रही चुनौती स्पष्ट है और अत्यंत सशक्त भी। उन्होंने तीन पुस्तकों — ‘बांडुंग लीगेसी एण्ड ग्लोबल फ्यूचर’, ‘बांडुंग एट 70’ और ‘दि राइज़ ऑफ़ एशिया’ — का परिचय दिया, जो इस विषय के लिए अत्यंत प्रासंगिक हैं।

वर्ष 2000 के दशक की शुरुआत में, अमेरिका के वित्तीय और औद्योगिक अभिजात्य वर्ग की यह कॉर्पोरेट रणनीति थी कि भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को जी-7 की अपनी जमात में सम्मिलित कर लिया जाए; किंतु बांडुंग की विरासत और रंगभेद-विरोधी संघर्ष की विरासत ने ब्रिक्स देशों को साम्राज्यवाद-विरोधी मंच के रूप में एक-दूसरे के नज़दीक ला दिया। अब तक लगभग हर ब्रिक्स बैठक में दो सामान्य बिंदु रहे हैं: व्यापार की डॉलर-आधारित प्रणाली पर निर्भरता कम करनी चाहिए। और एक अधिक न्यायसंगत तथा समावेशी राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था लागू की जानी चाहिए। पश्चिमी शक्तियाँ पूरी तरह से एकाधिकारवादी लाभों पर आधारित हैं, जिनमें सैन्य प्रौद्योगिकी का एकाधिकार, सूचना का एकाधिकार, वित्तीय एकाधिकार और संचार का एकाधिकार शामिल है। ब्रिक्स ने इन सभी क्षेत्रों में निरंतर परस्पर सहयोग से कार्य करते हुए एकध्रुवीय, एकाधिकारवादी साम्राज्यवादी शक्तियों के विकल्प को विकसित करने की दिशा में प्रयास किया है। इसने न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी ) विकसित किया, बहुपक्षीय व्यापार के लिए मंच उपलब्ध कराए और खाद्य सुरक्षा पर कार्य किया।
रूस और चीन भी ब्रिक्स के महत्त्वपूर्ण संस्थापक सदस्य हैं, जिन्हें अमेरिका सीधे तौर पर अपने निशाने पर रखता है। रूस और चीन पर तो व्यापारिक प्रतिबंध लगे ही हैं, साथ ही इन देशों के साथ व्यापार करने वाले अन्य देशों पर भी प्रतिबंध लगाये जाते हैं। इसलिए इन सभी देशों ने आपस में मिलकर ब्रिक्स में व्यापार की ऐसी व्यवस्था करने की कोशिश की है जिसमें इन्हें डॉलर के ज़रिये व्यापार न करना पड़े। फिर भी डॉलर को पूरी तरह से दरकिनार करने में अनेक व्यावहारिक कठिनाइयाँ हैं। रूस और चीन सहित ऐसे कई देश हैं जिनके रिजर्व भंडार डॉलर में हैं। इसलिए यदि डॉलर में गिरावट आती है, तो इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर भी उसका प्रभाव पड़ेगा। स्थिति जटिल तो है, लेकिन ब्रिक्स देश अपने बीच व्यापार के लिए अधिक समतामूलक, न्यायपूर्ण और आर्थिक व्यवस्था विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं।
यह भी पढ़ें – नेहरू को कोसते कोसते नेहरू ही बेंचमार्क बन गए
1 जनवरी 2026 को ब्रिक्स की हर साल बदलने वाली अध्यक्षता भारत को प्राप्त हुई, किंतु ब्रिक्स के संस्थागत विकास में योगदानकर्ता बनने के बजाय भारत एक समझौतावादी सदस्य के रूप में कार्य कर रहा है। भारत डॉलर-केंद्रित वित्तीय और मौद्रिक व्यवस्था से पूर्णतः अलग होने के लिए तैयार नहीं है। साथ ही, भारत के दक्षिण के देशों तथा रूस के साथ ऐतिहासिक रूप से मैत्रीपूर्ण व्यापारिक संबंध रहे हैं। इसलिए वह दो परस्पर-विरोधी व्यापारिक और निवेश संबंधी ढाँचों के बीच संतुलन साधने का प्रयास कर रहा है। दक्षिण अफ्रीका और ब्राज़ील ब्रिक्स के सबसे सक्रिय सदस्य बन गए हैं। यह एक भ्रांति है कि ब्रिक्स संयुक्त राष्ट्र का विकल्प है; वस्तुतः ब्रिक्स का उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र को सशक्त बनाना है। अतः होना यह चाहिए कि बहुध्रुवीय विकल्प के माध्यम से ग्लोबल साउथ की राजनीतिक दृष्टि को पुनर्स्थापित किया जाए।
बैठक की अध्यक्षता कॉमरेड रामकृष्ण पांडा, राष्ट्रीय सचिव, सीपीआई ने की। उन्होंने प्रो. मनोरंजन मोहंती का परिचय देते हुए कॉमरेड लोकनाथ चौधुरी के ज़माने से सीपीआई के साथ प्रोफ़ेसर मोहंती के संबंधों का उल्लेख भी दिया। प्रो. मोहंती दिल्ली विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त होकर भी लगातार काम कर रहे हैं और देश-विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों को अपनी सेवा दे रहे हैं। वे चीनी अध्ययन विभाग के भी प्रमुख रहे और उनकी अनेक पुस्तकें इन विषयों पर प्रकाशित हुई हैं।
जोशी-अधिकारी इंस्टिट्यूट के निदेशक प्रो. अजय पटनायक ने कार्यक्रम की शुरुआत विषय का संक्षिप्त परिचय देते हुए की और बांडुंग सम्मेलन, गुटनिरपेक्ष आंदोलन तथा ब्रिक्स के बीच संबंधों की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि गुटनिरपेक्ष आंदोलन (नाम) रणनीतिक स्वायत्तता का एक उत्कृष्ट आंदोलन था। यह केवल साम्राज्यवादी खेमे के साथ एकजुटता से इंकार भर नहीं था, बल्कि ग्लोबल साउथ के देशों के बीच पारस्परिक विकास का भी एक मैत्रीपूर्ण मंच था। भारत बांडुंग और ‘नाम’ — दोनों में अग्रणी सदस्य देशों में शामिल था। प्रो. अजय पटनायक ने ‘नाम’ देशों को ‘तटस्थ’ मानने की सामान्य भ्रांति पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने तर्क दिया कि ‘नाम’ देश न तो समाजवादी खेमे से जुड़े थे और न ही साम्राज्यवादी खेमे से, लेकिन वे कभी तटस्थ नहीं थे; उनमें से अधिकांश साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध थे। ‘नाम’ ने 120 से अधिक देशों की विशाल शक्ति होने के कारण संयुक्त राष्ट्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। इस रणनीतिक स्वायत्तता ने देशों की संप्रभुता को सुरक्षित रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। आज विकासशील देशों की संप्रभुता संकटग्रस्त हो रही है। प्रो. पटनायक ने आगे कहा कि ब्रिक्स ग्लोबल साउथ के लिए एक सहायक व्यवस्था के रूप में उभरा है।
व्याख्यान के बाद प्रश्नोत्तर का एक संक्षिप्त सत्र हुआ। अंत में, जोशी-अधिकारी इंस्टीट्यूट की अनुसंधान एवं शैक्षणिक प्रमुख डॉ. जया मेहता ने ब्रिक्स और बांडुंग सम्मेलन के महत्व तथा प्रासंगिकता पर संक्षेप में प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1944 के ब्रेटन वुड्स सम्मेलन के माध्यम से नयी आर्थिक व्यवस्था स्थापित की गई, जहाँ आईएमएफ और विश्व बैंक की स्थापना हुई तथा डॉलर को विश्व की रिजर्व मुद्रा घोषित किया गया। सन 1945 में संयुक्त राष्ट्र का गठन इस वादे के साथ किया गया था कि वह सदस्य देशों की संप्रभुता की रक्षा करते हुए शांति बनाये रखेगा। विडंबना यह है कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद भी कोरियाई युद्ध में अमेरिकी बर्बरता देखने को मिली, और चीन को संयुक्त राज्य अमेरिका ने सैन्य कार्रवाई की धमकी दी। इसलिए दक्षिण-दक्षिण सहयोग और ग्लोबल साउथ की एकजुटता ने साम्राज्यवाद के विरुद्ध एक सक्रिय उत्प्रेरक की भूमिका निभाई। भले ही यह एकता पूँजीवाद-विरोधी न हो, भले ही यह अपने-अपने देशों के पूँजीपतियों द्वारा समर्थित हो, फिर भी वैश्विक संदर्भ में साम्राज्यवादी शक्तियों का समर्थन करने से यह बेहतर है। ब्रिक्स के सहयोग के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं: राजनीतिक और सुरक्षा, आर्थिक और वित्तीय, तथा सांस्कृतिक और जन-जन के बीच आदान-प्रदान। आज अमेरिका को डॉलर-आधारित वर्चस्व का लाभ प्राप्त है। लगभग 67 देशों पर अमेरिकी शक्तियों द्वारा प्रतिबंध लगाए गए हैं। इस वर्चस्व को ध्वस्त करने के लिए ब्रिक्स ने द्विपक्षीय व्यापार, वैकल्पिक वित्तीय संदेश प्रणालियों, तथा चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) जैसे व्यापारिक विकल्पों पर ध्यान केंद्रित किया है। ये छोटे, किंतु प्रभावशाली कदम एक बहुध्रुवीय आर्थिक व्यवस्था के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
सभा में कॉमरेड एनी राजा, कॉमरेड डॉ. भालचंद्र कांगो, कॉमरेड डॉ. गिरीश, कॉमरेड डॉ. दिनेश वार्षणेय, कॉमरेड राजन क्षीरसागर, कॉमरेड वेंकैया, कॉमरेड निशा सिद्धू, वरिष्ठ पत्रकार शीबा असलम फ़हमी, लेखक प्रो. बजरंग बिहारी तिवारी, डॉ. अभय, राजीव कुमार शुक्ल, डॉ. तारा, नित्यानंद गायेन, एआईएसएफ़, एआईवायएफ के युवाओं और विद्यार्थियों सहित अनेक प्रतिष्ठित व्यक्ति उपस्थित थे। जोशी-अधिकारी इंस्टिट्यूट के संयोजक विनीत तिवारी ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया और घोषणा की कि इन घटनाक्रमों पर लोगों को जागरूक करने के लिए बैठकों की एक शृंखला आयोजित की जाएगी, क्योंकि इन मंचों पर लिए गए निर्णयों के इन देशों के आम लोगों पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ते हैं। (साथ में मोहित) (प्रेस रिपोर्ट)



