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अर्थव्यवस्था

बनारसी साड़ी के कारोबार का एक साहित्यिक आकलन

पहले भी बुनकर की ज़िंदगी कर्ज़ से शुरू होती थी और आज भी वही हालात हैं। आज पावरलूम की तेजी है लेकिन एक सामान्य बुनकर के लिए पावरलूम लगवा लेना क्या आसान है। हर पावरलूम वाला बड़े गिरस्ते के कर्ज़ में है और हर दिन वह कर्ज़ चुका रहा है। अगर उसने अपने घर में करघा लगाया है तो जगह का किराया और महंगी बिजली सब कुछ उसके मत्थे है लेकिन साड़ी वह खुले बाज़ार में नहीं बेच सकता। उसे उसी गिरस्ता को साड़ियाँ देनी होंगी जिसने उसे कर्ज़ पर करघा दिया है।

नफ़रत की सियासत और विमर्श की चुनौतियाँ

हम सभी के पास कुछ धारणाएं हैं जिन्हें हमने मीडिया के सहयोग से विकसित किया है, इस लेख में ऐसे ही कुछ धारणाओं को...

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