बनारसी साड़ी के कारोबार का एक साहित्यिक आकलन

रामजी यादव

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 बनारसी साड़ी का कारोबार कहते हैं कि बर्बाद हो चुका है। इस बर्बादी के बहुत से किस्से हैं और अनेक तो बहुत भयानक हैं। हाथ से बुनाई का युग समाप्त हो चुका है और उसकी जगह सभी पुराने मोहल्लों में पावरलूम की खटखट करती कर्कश आवाज लगातार सुनाई पड़ती है। उत्पादन बढ़ गया है और मुझे लगता है अगर आँकड़े इकट्ठे किए जाएँ तो हथकरघा वाले दिनों से कम उत्पादन नहीं मिलेगा। बड़े-बड़े इम्पोरियम जगर-मगर और गद्दीदार मालामाल हैं। बल्कि उनकी संख्या भी बढ़ी है। वे भुगतान के नए से नए ऐप का उपयोग करते हैं। लाखों का लेन-देन है। उनके चेहरे पर किसी तरह की उदासी नहीं दिखती। वे हर साल कोई न कोई नयी संपत्ति खरीद लेते हैं। कार बदल लेते हैं। बदलते हुये राजनीतिक माहौल में सामाजिक सुरक्षा को लेकर उनकी चिंताएँ कई बार हमें उनके भी आम आदमी होने का भ्रम देती हैं लेकिन उनकी आर्थिक संपन्नता उन्हें आम नहीं होने दे सकतीं। फिर कैसे कहा जा सकता है कि बनारसी साड़ी का कारोबार बर्बाद हो चुका है?

शिवाला की इस तंग गली में हजारों की संख्या में बुनकर रहते हैं

बनारस में इस समय कम से सौ बड़े इम्पोरियम हैं जिनमें एक हज़ार से एक लाख रुपए मूल्य तक की बनारसी साड़ियाँ खड़ी जा सकती हैं। हजारों गद्दीदार और गिरस्ते हैं। बड़ी बाज़ार, लल्लापुरा,मदनपुरा, अलईपुर, सारनाथ, कैंटॉन्मेंट, गोदौलिया, शिवाला, चौक, गोलघर में अनेक इम्पोरियम हैं। बनारस में लंबे समय तक टूरिस्ट गाइड रहे शायर अलकबीर जिनको इस शहर के गली-कूचों के बारे में गहरी दिलचस्पी है, कहते हैं कि ‘बनारस के इम्पोरियमों में असली-नकली सारे खेल होते हैं। वे जो सिल्क की साड़ी दिखाते हैं उसकी सही पहचान विरले लोग ही कर पाते हैं। असली रेशम की साड़ियाँ दस हज़ार से नीचे की नहीं होतीं लेकिन बहुत से इम्पोरियम ग्राहक को भांपकर सस्ती रेशम की साड़ी भी ठिकाने लगा लेते हैं।’ अलकबीर बताते हैं कि ‘इम्पोरियम और गद्दीदारों ने बुनकरों की मजबूरियों का फायदा उठाकर बहुत सस्ते में उनका माल खरीदा और उन्हें निहंग बनाकर छोड़ दिया। अभी भी हरेक इम्पोरियम में एक बुनकर करघे पर बैठा बुनाई करता दिख जाता है। यह ऐसा धोखा है जैसे कहानियों के बूढ़े शेर के हाथ में सोने का कंगन था।’

शायर और पूर्व टूरिस्ट गाइड अलकबीर

लेकिन बनारसी साड़ी का कारोबार सचमुच बर्बाद हो चुका है। पावरलूम की कर्कश ध्वनियाँ चाहे कितनी तेज हों लेकिन वह बनारसी साड़ी नहीं बुन सकता। बनारसी साड़ी हथकरघे पर बुनी जाती थी जो अब बनारस से उखड़ चुके हैं। उनके उखड़ने के साथ ही एक बहुत बड़ी जमात बर्बादी के कगार पर जा पहुँची। उसने करघे को जीने की आखिरी उम्मीद की तरह देखा था लेकिन उखड़ते हुये करघों ने उन्हें भी बेसहारा छोड़ दिया। लिहाजा लाखों बुनकर रोटी कमाने के दूसरे विकल्पों की तलाश में बिखर गए।

यह सब एक दिन में या एक झटके में नहीं हुआ और न ही इसके लिए कोई एक चीज जिम्मेदार है बल्कि कई चीजों की सम्मिलित ताकत ने बनारसी साड़ी की सबसे बुनियादी लेकिन सबसे कमजोर कड़ी बुनकरों पर लगातार प्रहार किया। उन्हें चारों तरफ से घेरकर लाचार किया। एक समय ऐसा आया कि वे भहराकर गिर पड़े। जिस देश में लाखों किसानों की आत्महत्याएँ संवेदना से बाहर रह गईं, वहाँ बुनकरों की बदहाली, पलायन और आत्महत्याएं भी स्थानीय अखबारों के चौथे-पांचवें पेज से ऊपर नहीं उठ सकीं।

बुनकर की झुकी हुई कमर पर कर्ज़ का बोझ

बुनकरों के ऊपर कर्ज़ का कितना बोझ था इसे इस बात से समझा जा सकता है कि उसका कोई भी काम बिना कर्ज़ के शायद ही होता हो। शादी-ब्याह, बीमारी और मौत के मौके पर कर्ज़ लेना उनकी मज़बूरी होती है। इस कर्ज़ की शुरुआत वास्तव में एक बुनकर के जन्म से ही होती है अर्थात जब भी कोई व्यक्ति तानी या मजूरी पर साड़ी बिनने की शुरुआत करता है तो गिरस्ता से कर्ज़ लेता है जिसे स्थानीय ज़बान में ‘बाकी’ कहते हैं। यह बाकी हर बुनकर-मजूर पर चढ़ी रहती है। आमतौर पर यह होता है कि किसी बुनकर ने अन्य गिरस्ता से बाकी ले रखा होता है लेकिन उसके शोषण या किसी अन्य परेशानी से ऊबकर या गिरस्ता द्वारा बाकी चुकाने के दबाव पर वह दूसरे गिरस्ता की शरण में जाता है और उससे बाकी लेकर पहले का चुकाता है। इस प्रकार गिरस्ता बदल जाता है लेकिन कर्ज़ का बोझ हमेशा लदा रहता है।

बुनाई के काम में डोरा उठाने से शुरुआत होती है। यह एक अकुशल मजदूर का बिनकारी के पेशे में आने की पहली सीढ़ी है। बारह-पंद्रह साल के बच्चों को जब उसके माँ-बाप डोरा उठाने भेजते हैं तब गिरस्ता से उस पर जरूरत की रकम बाकी उठा लेते। इस तरह काम में आने के साथ ही कर्ज़ का बोझ लद जाता जो जीवन में शायद ही उतरता हो।

मंगलपुर के एक गिरस्ता बुनकरों से साड़ी लेते हुए

हर बस्ती में बुनकरों से सवाल पूछने पर यह बात घूम-फिर कर आ जाती कि पिछले बीस साल से उनकी मजदूरी में कोई इजाफ़ा नहीं हुआ जबकि महँगाई बेहिसाब बढ़ी है। ऐसे में कर्ज़ एकमात्र रास्ता बच जाता है। मंगलपुर के रहनेवाले अब्दुल हमीद  बताते हैं कि ‘लॉकडाउन में परिवार का पेट भरने के लिए पहले करघा बेचा लेकिन उससे भी कितने दिन पेट भरता। अंत में कर्ज़ लेना पड़ा जिसको लगातार चुका रहे हैं।’

कर्ज़ ने बुनकरों को बनारसी साड़ी की अर्थव्यवस्था के एक ऐसे बाड़े में बंद कर दिया जहां उनको केवल इतना मयस्सर होता है कि वे जी सकें और लगातार अपनी कला और मेहनत से गिरस्तों और महाजनों का खज़ाना भरते रहें। उनके बच्चों की शिक्षा और अच्छा स्वास्थ्य इतना ऊंचा सपना बन जाता कि वह उसे एक धुंधला धब्बा भर दिखता।

मंगलपुर के रहनेवाले अब्दुल हमीद और अब्दुल हई गिरस्ता के पास बुनी हुई साड़ी लेकर आये हैं

कर्ज़ के जाल से आज भी बुनकरों को मुक्ति नहीं मिल सकी है। कोटवा के रहनेवाले बदरी प्रसाद प्रजापति अब अपने घर में परचून की छोटी सी दुकान चलाते हैं लेकिन उन्होंने करीब बीस साल तक बिनकारी की। वे बताते हैं कि ‘पहले भी बुनकर की ज़िंदगी कर्ज़ से शुरू होती थी और आज भी वही हालात हैं। आज पावरलूम की तेजी है लेकिन एक सामान्य बुनकर के लिए पावरलूम लगवा लेना क्या आसान है। हर पावरलूम वाला बड़े गिरस्ते के कर्ज़ में है और हर दिन वह कर्ज़ चुका रहा है। अगर उसने अपने घर में करघा लगाया है तो जगह का किराया और महंगी बिजली सब कुछ उसके मत्थे है लेकिन साड़ी वह खुले बाज़ार में नहीं बेच सकता। उसे उसी गिरस्ता को साड़ियाँ देनी होंगी जिसने उसे कर्ज़ पर करघा दिया है।’

कटौती ने बुनकरों की कमर तोड़ी

एक समय ऐसा आया कि बनारस के बुनकरों पर सबसे करारा प्रहार कटौती ने किया। अस्सी का दशक कटौती का सबसे भयानक दौर बन गया। गिरस्तों और गद्दीदारों ने इसके अनेक रास्ते निकाल लिए। बनारस , मुबारकपुर और टांडा के बुनकरों के हालात पर अध्ययन करनेवाले प्रोफेसर रियाजुद्दीन आज़मी कहते हैं कि ‘यही वह समय था जब बुनकरों के लिए मिलनेवाली सभी सुविधाओं को गिरस्तों और गद्दीदारों ने फर्जीवाड़ा करके हड़प लिया। जिन मजदूरों ने बेहतरी के सपने देखे उनको अंधेरे के सिवा कुछ नहीं मिला। वे अधिक से अधिक लाचार बनते गए। इस बात का फायदा उठाकर उन लोगों ने अनेकों कमियाँ निकाल कर बुनकरों की कमाई में लगातार कटौती की। उस समय इस कटौती के खिलाफ बनारस में कई दिनों की मुर्रीबंदी हुई थी।’

बनारस के पुराने समाजवादी मलिक शाकिर रज़ा बताते हैं कि ‘हर गद्दीदार और गिरस्ता के मुंह में बुनकरों का खून लगा है। उनकी हर साल बढ़ती संपत्ति बुनकरों के बल पर ही है। एक ही गद्दी पर बुनकर कई-कई बार लूटे जाते रहे हैं। वे बुनकर की साड़ी में सौ तरह की कमी निकालते हैं। छीर, मत्ती, दाग, रफ़ू, हुनर, नाका, तीरी और रंग के नाम पर उसकी मज़दूरी काटते हैं। फिर उनको एक महीने, दो महीने और कभी-कभी तीन महीने का चेक पकड़ाते हैं। अब जिसके घर में आज की कमाई से ही चूल्हा जलाना है वह तुम्हारा चेक क्या करेगा? वह गद्दी से नीचे आता है तो उसी गिरस्ता का भाई दस परसेंट काटकर बदले में उसे नकद दे देता है। इसके अलावा बुनकर के पास क्या उपाय है।’

 

बनारस के पुराने समाजवादी मलिक शाकिर रज़ा

मशहूर कथाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह का बुनकरों पर आधारित उपन्यास झीनी-झीनी बीनी चदरिया वास्तव में बनारस के बुनकरों की ज़िंदगी का हाहाकार है। यह उपन्यास पहली बार 1986 में छपा था और माना जाना चाहिए कि एक दो साल पहले लिखा गया होगा और इसकी घटनाएँ लेखक की रचना प्रक्रिया में और भी पहले से दर्ज़ हुई होंगी। आठवें दशक के पूर्वान्चल और देश की अनेक घटनाएँ और राजनीति इसमें शामिल की गई हैं।

इसका मूल कथानक बुनकरों का गरीबी में नारकीय ज़िंदगी जीते हुये अपने बेहतर भविष्य के निर्माण की असफल और और त्रासद कोशिश है। इसके दो छोर हैं। एक तरफ गरीब बुनकर और दूसरी ओर हाजी अमीरुल्ला, हाजी हबीबुल्ला, हाजी मिनिस्टर, सेठ गजाधर प्रसाद जैसे सैकड़ों लोग हैं। बुनकर सोसाइटी बनाने के लिए 102 रुपए जुटाने में खून थूक देते हैं और जब तक जुटता है तब तक हाजी अमीरुल्ला ने उन्हीं बुनकरों के फ़र्ज़ी दस्तखत से बुनकर सोसाइटी बना ली। बैंक मैनेजर बुनकरों को फ्रॉड कहता है।

तरह-तरह की कमेटियों के माध्यम से हाजी अमीरुल्ला और सेठ गजाधर प्रसाद जैसों का माल सिंगापुर और अमेरिका तक जाता है और उनके वहाँ पैसे बरसते हैं। उनकी कोठियाँ तनती हैं लेकिन बुनकरों के ऊपर कर्ज़ दर कर्ज़ चढ़ता जाता है। उनकी कमर टूट चुकी है। उनके घर के चूल्हे तक खामोश पड़े रहते हैं। उनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं है।

राजनीति में भी हाजी अमीरुल्ला और सेठ गजाधर प्रसाद के घर के लड़के आते हैं। वे विधायक और सांसद बनते हैं। उनके प्रताप से हाजियों और सेठों को और भी ताकत मिलती है। वे बुनकरों पर अतिशय मनमानी करते हैं। उनकी हर साड़ी पर दस से पचीस रुपए तक कटौती करते हैं और महीने भर बाद का चेक पकड़ा देते हैं। इस मनमानी कटौती से बुनकर आक्रोश में आकर मुर्रीबंदी करते हैं लेकिन उनके आंदोलन की किसी सरकार या समाज को परवाह नहीं है।

बनारस के प्रसिद्ध शायर नज़ीर बनारसी (साभार- गूगल)

कटौती के खिलाफ बनारस के प्रसिद्ध शायर नज़ीर बनारसी ने अपनी लंबी कविता कटौती के माध्यम से प्रतिरोध किया –

कब तलक ज़ख्म हँस के खायेंगे हम

हर इक चोट दिल की छुपायेंगे हम

नातवानी को ताकत बनायेंगे हम

मौत से ज़िन्दगी छीन लायेंगे हम

इस कटौती की मैयत उठायेंगे हम

 

पूरे दिन क़ब्र में जिस्म आधा रहे

घर में इस पर भी इक वक़्त फ़ाक़ा रहे

भूक से गरम तन,सर्द चूल्हा रहे

इस तरह ख़ून कब तक जलायेंगे हम

इस कटौती की मैयत उठायेंगे हम

 

कौन किसकी हंसी छीन कर शाद है

कौन किसके उजड़ने पर आबाद है

किसके लाश पे कोठी की बुनियाद है

तुम बताओ तुम्हें भी बतायेंगे हम

इस कटौती की मैयत उठायेंगे हम

 

सोने-चाँदी के हीरों के लख़्ते जिगर

ऊँची-ऊँची हवेली के जाने पेदर

भारी-भारी तिजोरी के नूरे-नज़र

अब कुद अपने लिए भी कमायेंगे हम

इस कटौती की मैयत उठायेंगे हम

 

जिसमें चेहरों का छीना हुआ नूर है

जिसकी रफ़्तार में आह मजबूर है

जिसके पेट्रोल में ख़ूने-मज़दूर है

ऐसे मोटर की धज्जी उड़ायेंगे हम

इस कटौती की मैयत उठायेंगे हम

 

तुमसे आबाद होटल भी हैं बार भी

तमसे कोठे भी कोठे के बाज़ार भी

तुमको नफ़रत भी तुम ही ख़रीदार भी

पाप करने से तुम को बचायेंगे हम

इस कटौती की मैयत उठायेंगे हम

 

वारिसे हिन्दो हिन्दोस्ताँ ज़ाद हैं

हम भी इस देश माता की औलाद हैं

तुम हो आज़ाद तो हम भी आज़ाद हैं

अब गु़लामी की लानत हटायेंगे हम

इस कटौती की मैयत उठायेंगे हम

 

ऐसे जीने की हम को जरूरत नहीं

अब तो या हम नहीं या मुसीबत नहीं

गर हमारी हुकूमत को फ़ुर्सत नहीं

ख़ुद हुकूमत तलक लेके जायेंगे हम

इस कटौती की मैयत उठायेंगे हम!

इस तरह से देखा जाय तो यह गरीब और लाचार बुनकरों पर अमीर सेठों और गद्दीदारों की संगठित लूट और हमलों का परिणाम था। बिनकारी और बुनकरों के उत्थान के लिए में मिलने वाली सरकारी सहूलियात पर भी इन्होंने डाका डाला और सब कुछ डकार गए। अमीर सेठ और गद्दीदारों ने बुनकरों को कर्ज़ और ब्याज के चक्रव्यूह में ऐसा फंसाया कि वे कभी उबर नहीं पाये। उनकी नियति में भुखमरी, मौत और पलायन के सिवा कुछ नहीं रहा। इस तरह बनारसी साड़ी को मुनाफाखोरी ने तबाह कर दिया। बुनकरों ने तो इसे आखिरी दम तक बचाने का प्रयास किया।

उदारीकरण और मशीनरीकरण के दौर में बुनकरों के हालात

मनमोहन सिंह का वित्तमंत्रित्व काल उदारीकरण का प्रारम्भ था जब भारत सरकार ने न केवल निजी उद्यमों, निगमों और व्यवसायों के सरकारी नियंत्रण में अधिकतम ढील दी बल्कि उनकी अनेक शर्तों को उदारतापूर्वक मान भी लिया। उदारीकरण को कई विद्वान उधारीकरण भी कहते हैं। इसका एक तात्पर्य यह है कि पूँजीपतियों को सार्वजनिक बैंकों से बड़े पैमाने पर उधार दिया गया और दूसरे यह भारतीय अर्थव्यवस्था के अनुरूप फैसला नहीं था बल्कि इसकी अवधारणा विकसित देशों से उधार ली गई थी। इसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर इतना गहरा पड़ा कि एक तरफ राजनीतिक संरक्षण, जरूरत की पूंजी, कानूनी लचीलेपन और न्यूनतम जवाबदेही के चलते उत्पादन पर अधिकार रखनेवाले वर्ग ने बेहिसाब मुनाफा कमाया और उत्तरोत्तर अमीर होता गया तो दूसरी ओर राजनीतिक उपेक्षा, न्यूनतम मजदूरी में कटौती, कमजोर सांगठनिक क्षमताओं, मजदूर विरोधी क़ानूनों और बढ़ती महँगाई ने उत्पादक शक्तियों को लगातार कमजोर लाचार और दरिद्र बना दिया। वे लगातार बहिष्करण के शिकार होते गए और सार्वजनिक संस्थाओं की अनैतिकताओं तथा भ्रष्टाचार का  सर्वाधिक खामियाजा भुगता। अमीर लगातार अमीर और गरीब लगातार गरीब होता गया। वर्गभेद की बढ़ती हुई खाई के बीच कोई आग नहीं पैदा हो सकी लिहाजा उत्पादक शक्तियां लगातार भटकाव और पलायन का शिकार बनीं। बनारसी साड़ी के कारोबार में लगे सेठों और बुनकरों पर भी इन हालात का व्यापक असर पड़ा।

झीनी झीनी बीनी चदरिया के लेखक अब्दुल बिस्मिलाह (साभार- गूगल)

उदारीकरण से पहले और उदारीकरण के बाद की सरकारी नीतियों ने भी बुनकरों को ही कमजोर बनाया। अब्दुल बिस्मिल्लाह अपने उपन्यास में बुनकर सोसायटी बनाने की प्रक्रिया का वर्णन करते हैं। बैंक बुनकर सोसायटी को अनुदान दे सकते हैं लेकिन इसकी पात्रता की जांच के लिए उनकी कोई नीति नहीं है। परिणाम यह हुआ कि हाजी अमीरुल्ला जैसे लोगों ने बुनकरों का फ़र्ज़ी दस्तख़त बनाकर सोसायटी बना ली और बुनकर हाथ मलकर रह गए। बैंक में अनपढ़ बुनकर यहाँ से वहाँ भटकते रहे लेकिन उनकी बात पर गौर करनेवाला कोई नहीं था। आल इंडिया हैंडलूम बोर्ड जैसी संस्थाओं पर भी गद्दीदारों का ही कब्जा बना रहा। सबकुछ नौकरशाही पर निर्भर था। भ्रष्टाचार चरम पर था। कुछ तत्कालीन सांसदों ने बनारसी साड़ी के कारोबार के पतन पर चिंता जरूर जताई लेकिन बुनकरों को लेकर कोई स्पष्ट नीति थी ही नहीं। उनके नाम पर जो भी था वहाँ बुनकर नहीं थे। इसका एक उदाहरण बनारस में बना बुनकर फ़ैसिलिटेशन सेंटर है जहां बहुत कुछ है लेकिन बुनकर गायब हैं।

मशीनीकरण ने धीरे-धीरे हथकरघे की पुरानी कला को अपदस्थ कर दिया। लेकिन पावरलूम ने गद्दीदारों और गिरस्तों के मुनाफे में कमी नहीं आने दी। अब उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं रही कि सदियों से चली आ रही एक कला विलुप्त होने की कगार पर जा रही है। उनको न कला से मतलब था न उन कलाकारों से जिनके बूते पर वे अपनी अट्टालिकाएँ खड़े कर रहे थे। इसलिए उनकी आँखों में कुछ समय तक रेशम की किल्लत और महँगाई का घड़ियाली आँसू बहता रहा फिर वह भी सूख गया। उन्होंने इस कला को बचाने की बजाय लगी हुई पूँजी को बटोरना अधिक जरूरी समझा। जो लोग बानी पर बीनते थे वे अब खाली बैठने लगे। जो मजदूरी करते थे उन्हें भी मना कर दिया गया। अब भुखमरी और पलायन के सिवा आगे कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। अलईपुर के एक बुनकर इस्माइल अंसारी अब रिक्शा चलाकर अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं। वह कहते हैं-‘पंद्रह साल हो गए मुझे बिनकारी छोड़े हुये। अचानक काम बंद हो गया। गिरस्ता ने मुंह मोड़ लिया। कर्ज़ लेने गया तो झिड़क दिया कि अभी मेरा ही निकलता है तुम्हारे यहाँ। कई-कई दिन बच्चे भूखे रहे। नहीं देखा गया तो गारा-मिट्टी ढोने लगा। दो साल वह सब किया। फिर रिक्शा चलाने लगा।’

इस्माइल बताते हैं कि ‘अगर चाहूँ तो पावरलूम चला सकता हूँ मगर साड़ी से मन उचट गया है। मजूरी कम बढ़ी महँगाई ज्यादा बढ़ी है। वह बताते हैं कि घर में अभी भी एक कोने में करघा पड़ा है। कई बार मन करता है बेच दूँ लेकिन फिर मन नहीं करता।’

बुनकरों की विडंबनाओं और बदहाली पर अलकबीर एक शे’र में कहते हैं – ढरकियाँ चुक गईं, कटोरे अब/ ताने-बाने की बात करते हैं।

शायर सलीम शिवालवी

करघा बुनकर की कला का ऐसा आधार था जिस पर उसने न जाने कितनी डिजाइनें बनाई हैं। उसकी कला का विस्तार देश-दुनिया में न जाने कहाँ-कहाँ हुआ है। एक साड़ी बुनने का मतलब अपने को बहुत कुछ उड़ेल देना है लेकिन सारी कारीगरी को मशीनों ने बाहर कर दिया। जैसा कि शिवाला में रहने रहनेवाले एक शायर सलीम शिवालवी अपनी एक कविता में कहते हैं – कहाँ चल रही आज ढरकी नरी है/तबाही के पहलू में कारीगरी है/न क्यूंकर करे ख़ुदकुशी आज बुनकर/मशीनों के आगोश में बुनकरी है।

लेकिन यहीं अंत नहीं है। जिन पावरलूमों ने लाखों बुनकरों को बेरोजगार करके दर-दर भटकने पर मजबूर किया अब उसी को अपदस्थ करने के लिए और भी बड़ी, उन्नत और महँगी मशीनें आ रही हैं। पावरलूम भी जल्दी ही अतीत बन सकते हैं। कहते हैं पूँजी के घर देर भले कम हो लेकिन अंधेर और बेरहमी का कोई अंत नहीं!

(सभी फोटो अपर्णा)

लेखक गाँव के लोग के संपादक हैं।

6 Comments
  1. Gulabchand Yadav says

    अत्यंत यथार्थपरक और मार्मिक रिपोर्टिंग। बनारस के बुनकरों की दुरवस्था और अंतहीन शोषण का आइना है यह आलेख/रिपोर्ट। रामजी भाई और अपर्णा जी को धन्यवाद।

  2. सन्तोष कुमार says

    शानदार लेख

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