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1975 emergency
नेहरू को कोसते कोसते नेहरू ही बेंचमार्क बन गए
हमारे देश का लोकतांत्रिक सिस्टम अविश्वसनीय हो गया है। देश की सभी संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता खत्म कर दी गई है — संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग और सभी जांच एजेंसियों तक। आज सभी संवैधानिक संस्थाएं सिर्फ़ BJP और RSS के इशारे पर काम कर रही हैं। आज से दो हफ़्ते बाद, 25 जून को, जब 1975 में 19 महीने की इमरजेंसी और सेंसरशिप लागू होने के 51 साल पूरे हो जाएंगे, तो RSS और BJP के लोग अभिव्यक्ति की आज़ादी और 19 महीने की तानाशाही पर चर्चा करेंगे। 51 साल पहले हम भी उस इमरजेंसी के शिकार हुए थे। लेकिन 19 महीने की इमरजेंसी की तुलना में, हम पिछले 12 सालों से — यानी एक दशक से ज़्यादा समय से — अघोषित इमरजेंसी और सेंसरशिप का सामना कर रहे हैं।
वर्ष 2014 से देश में चल रहा है अघोषित आपातकाल
पिछले दस वर्षों से केंद्र सरकार जिस तरह से देश में उनके खिलाफ बोलने, लिखने या आंदोलनकारियों को पकड़-पकड़ कर जेल में डालते हुए उन्हें राष्ट्रद्रोही घोषित कर रही है, वह किसी आपातकाल से कम नहीं है। बल्कि यह उस आपातकाल से भी ज्यादा खतरनाक और हिंसक है।

