Friday, June 21, 2024

डॉ. सुरेश खैरनार

लेखक चिंतक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

टेबल पत्रकारिता के दौर में गौर किशोर घोष की याद

जाने-माने पत्रकार गौर किशोर घोष की आज जयंती है। लेखक गौरदा के गहरे मित्र रहे हैं। उन्हें करीब से जानने और साथ रहने का मौका मिला। उन्होंने साथ रहते हुए उन्हें जाना। उन्हीं बातों को लेकर एक संस्मरणात्मक लेख।

दिल्ली के उप राज्यपाल वी के सक्सेना की संस्था एनसीसीएल ने गुजरात में मानवाधिकार के लिए क्या किया?

दिल्ली के वर्तमान राज्यपाल विनय कुमार सक्सेना का गुजरात में नेशनल काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज (एनसीसीएल) नाम से एक एनजीओ था। नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल में इस एनजीओ ने मानवाधिकार के खिलाफ जाकर सरकार के पक्ष में काम किया और शायद इसी का इनाम है कि उन्हें दिल्ली का उप राज्यपाल बना दिया गया। अरुंधति रॉय और मेधा पाटकर के खिलाफ पुराने मामले निकालकर केस करने को लेकर सामाजिक चिंतक डॉ सुरेश खैरनार ने कुछ सवाल उठाते हुए एक खुला पत्र लिखा

एक वर्ष बाद मणिपुर पर दिए बयान से संघ और संघ प्रमुख मोहन भागवत का पाखंड सामने आया

18वीं लोकसभा में 400 पार का दावा करने वाली भाजपा 240 सीट पर ही सिमट गई। मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने लेकिन 32 सीटें गठबंधन से उधार लेकर। ऐसे में भाजपा के मातृ दल राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत को एक वर्ष बाद मणिपुर हिंसा की याद आई और एक कार्यक्रम में बयान दिया 'मणिपुर में पिछले एक वर्ष से अधिक समय से  शांति की राह देख रहा है। इस पर प्राथमिकता से विचार करना चाहिए।' इस बयान से संघ, संघ प्रमुख और संघ से जुड़े सभी संगठनों की मानसिकता एक बार फिर सामने आई।

पंडित जवाहरलाल नेहरू : लोकतन्त्र को शासन व्यवस्था नहीं बल्कि एक संस्कार मानते थे

आज देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की 60वीं पुण्यतिथि है। नेहरू जी केवल प्रधानमंत्री ही नहीं थे बल्कि वे आधुनिक भारत के निर्माता थे। वे भारतीय राष्ट्र के समाजवाद और धर्मनिरपेक्ष के प्रणेता माने जाते हैं । उन्होंने 1947 के बाद देश को किस तरह आगे ले जाना है इसकी बेहतर नींव रखी। लोकतन्त्र को केवल शासन-व्यवस्था नहीं, एक संस्कार मानते थे। वे स्वयं को देश का प्रधान सेवक मानते थे लेकिन आज के प्रधानमंत्री की तरह नहीं।

नब्बे साल की यात्रा में कहाँ पहुंचा भारतीय समाजवाद

आजादी से पहले से लेकर आजतक अनेक समाजवादी दलों का गठन हुआ लेकिन उनमें शामिल लोग खुद को समाजवादी होने दावा करते हुए दलों को तोड़कर या उससे अलग होते हुए किसी न किसी तरह संघ का साथ दिए।

पीएम नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह चुनावी मंचों से मातृशक्ति और स्त्री सशक्तिकरण के खोखले दावे करते हैं

अपने चुनावी भाषणों में देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री देश की महिलाओं को मातृ शक्ति का दर्जा दे सम्मान की बात कर रहे हैं लेकिन उनके मुंह से भाजपा के कथित गुंडों और बलात्कारियों द्वारा की गई करतूतों पर एक बोल नहीं निकलता। आरएसएस की शाखाओं में शामिल होने वाले युवाओं को कभी नारी सम्मान की बात नहीं सिखाई जाती।

गैर कांग्रेसवाद के गर्भ से निकली सांप्रदायिक सरकार के मुखिया की हताशा क्या कहती है?

सन 1950 से 1977 अर्थात 27 सालों में जनसंघ को सिर्फ छह प्रतिशत मतदाताओं ने पसंद किया था लेकिन 1963 के बाद डॉ. राम मनोहर लोहिया के गैर कांग्रेसी राजनीतिक कदम के चलते शिवसेना से लेकर मुस्लिम लीग और जनसंघ जैसे घोर सांप्रदायिक दलों के साथ गठजोड़ की वजह से जनसंघ को बहुत लाभ हुआ। इस लेख में जाने-माने लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ सुरेश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक विरासत के बहाने उनकी हताशा पर बात कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी पद की गरिमा के प्रतिकूल बातें क्यों कर रहे हैं?

वर्ष 2014 के बाद देश की स्थिति से सभी वाकिफ हैं। बीजेपी ने सांप्रदायिक घृणा फैला कर ध्रुवीकरण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और इस काम का नेतृत्व किसके हाथ में है, सभी जानते हैं। इन्हीं बातों को उल्लेखित करते हुए डॉ सुरेश खैरनार ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम खुला पत्र लिखा।

पाखंड को बढ़ावा देने वाली पार्टी है भाजपा, अवैज्ञानिक सोच और धार्मिक कट्टरता का कर रही प्रसार

केंद्र की राजनीति में भाजपा भले ही सबसे बड़े दल के रूप में स्थापित हो लेकिन जनता के लिए उसने केवल धार्मिक नेरेटिव गढ़ने के अलावा कोई काम नहीं किया। जिसके परिणामस्वरूप देश के हर धर्म में कट्टरता सिर चढ़कर बोल रही है।

वर्तमान राजनीति को समझने के लिए जरूरी है कार्ल मार्क्स को याद करना

कार्ल मार्क्स अर्थशास्त्र का अध्ययन करने के लिए समय निकालने के लिए हमेशा आतुर रहते थे। उन्होंने अपने जीवन के कुल  पैंसठ साल के जीवन में से लगभग चालीस साल से भी ज्यादा समय समाजवाद के चिंतन और उसके अनुसार आदर्श समाज की स्थापना के लिए लगा दिया।

भारत की राष्ट्रमाता की भूमिका निभाई थी सावित्रीबाई फुले ने

एक सावित्री पुराणों में हैं, जहां उनके द्वारा अपने पति के प्राण तक वापस लाने की कहानी बचपन से ही सुनते आ रहे हैं। यह आधुनिक युग की सावित्री, जिसने स्त्री-शूद्र तथा पददलित लोगों के लिए शिक्षा की शुरुआत की, जिसने निष्ठा के साथ जो काम किया। इन्हीं सावित्री बाई फुले की आज 139वीं पुण्य तिथि है।

संदेशखाली और आमार शोनार बांगला की सच्चाइयाँ : मोदी जी की संवेदना कहाँ है

दो लाख आबादी वाले संदेशखाली की घटनाओं का राजनैतिककरण में भाजपा ने पूरा दम लगा दिया है। मोदी से लेकर केंद्रीय मंत्रियों और राज्यपाल तक ने इसका संज्ञान लिया। लेकिन आज से 22 वर्ष पहले हुए गोधरा के दंगों को भूल जाते हैं जबकि उन दिनों मोदी खुद वहाँ मुख्यमंत्री थे। दंगे में हजारों लोगों का कत्ल हुआ, घर जला दिये गए। महिलाओं के साथ गैंगरेप हुआ।

गुजरात दंगा : बाइस साल बाद भी गोधरा के सवाल खत्म नहीं हुये हैं

यात्रियों में 1700 कारसेवक थे, जो अयोध्या से वापस आ रहे थे। हर स्लीपर कोच की तरह एस-6  कोच की क्षमता भी 72 यात्रियों की थी लेकिन 27 फरवरी 2002 के दिन पूरा कोच खचाखच भरा हुआ था और गोधरा स्टेशन पर कोच के बाहर भी दो हजार लोग थे। गोधरा के मुसलमानों ने पूरी ट्रेन को घेरकर सिर्फ एस-6 कोच को आग लगा दी। क्यों? क्या यह प्रश्न मन में उठना जरूरी नहीं है?

क्या संदेशखाली भाजपा के लिए बंगाल में बड़ी जीत का रास्ता तय करेगा

चुनाव आते ही भाजपा सांप्रदायिक भाईचारे को बिगाड़ने की शुरुआत कर देती है। इस बार लोकसभा की ज्यादा सीट हासिल करने के लिए बंगाल के संदेशखाली में उपद्रव मचाने का काम शुरू कर दिया है। विस्तार से जानने के लिए पढ़िए यह लेख

सर्वोच्च न्यायालय का चुनावी बॉन्ड रद्द करने का फैसला बीजेपी के लिए मुश्किल पैदा कर सकता है

बीस राजनानैतिक दलों ने चुनावी बॉन्ड से चन्दा उगाही की है। केवल माकपा ने चंदा भी नहीं लिया और कोर्ट में इस गोरखधंधा को उजागर करने के लिए चुनौती दी है।सर्वोच्च न्यायालय ने चुनावी बॉन्ड रद्द करते हुए मतदाताओं के पक्ष में कहते हुए फैसला दिया कि कंपनियां भारी फंडिंग करती है, तो क्या निर्वाचित लोग मतदाताओं के प्रति उत्तरदायी होंगे?  

आडवाणी को भारतरत्न देने से इस सम्मान का मूल्य कम हुआ है

जिन्होंने बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद शुरू करते हुए 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद का विध्वंस कराया और संपूर्ण देश में सिर्फ सांप्रदायिक ध्रुवीकरण किया।...

कांग्रेस ने ही बोए थे भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने वाले सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बीज

कांग्रेस पार्टी की कुछ बुराइयां शुरुआत से है। उदाहरण के लिए जाति, धार्मिक और वैयक्तिक मिल्कियत जैसे विषयों पर शुरुआत से ही गफलत चली आ रही है। उसके पीछे शुद्ध रूप से सवर्ण समाज से आई हुई लीडरशिप है।

कठमुल्लावाद और सांप्रदायिकता के विरोधी थे मुस्लिम सत्यशोधक समाज के संस्थापक हमीद दलवाई

कोंकण क्षेत्र के छोटे से गाँव में हमीद ने उम्र के 14वें साल में सिर्फ 9 साल पहले शुरू किए गए राष्ट्र सेवा दल नाम के बच्चों के संगठन में शामिल हुए। 25 साल अपनी जान जोखिम में डालकर वे महात्मा जोतिबा फुले की तरह सामाजिक जागृति के काम में लगे रहे। 

सांप्रदायिक सोच के खिलाफ थे जहीरुद्दीन अली खान

जहीरुद्दीन अली खान का निधन मेरे लिए दुखद है। हाल के दो महीने में मैं आधा दर्जन मृत्यु-लेख लिख चुका हूँ। कल ही गदर की स्मृति में लिखी पोस्ट में मैंने उल्लेख किया था कि 'मेरी और गदर की भेंट जहीरुद्दीन अली खान के अखबार सियासत के हैदराबाद स्थित दफ्तर में पंद्रह साल पहले हुई थी।'

मुख्य न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय धनंजय चंद्रचूड़ के नाम खुला पत्र! 

कुछ माह पहले राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता रद्द कर दी गई। यह निर्णय किस संविधान के तहत लिया गया। सभी का नाम मोदी क्यों होता है? इस बात में क्या आपत्तिजनक है। कौन से कानून के अनुसार राहुल की लोकसभा की सदस्यता समाप्त हो जाती है? यह हमारी सभी संवैधानिक संस्थाओं का फेल्युअर है।

भारत के अतिविशाल भूतकाल और असीमित भविष्यकाल के बीच सेतु थे राजा राममोहन राय

सामाजिक परिवर्तन में राजा राममोहन राय एक बड़ा नाम थे, जिन्हें कट्टरपंथियों के विरोध के बावजूद आज स्त्री शिक्षा से लेकर, सती हो जाने की कुप्रथाओं को रोकने के लिए इन्हें याद किया जाता है।

त्र्यंबकेश्वर मंदिर में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति

हिंदुत्ववादी संगठन जो लगातार धार्मिक ध्रुवीकरण की कोशिश कर रहे हैं। देश में मंदिर की राजनीति ज़ोरों पर हैं।