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#Activist
लेखक समाज के आगे मशाल लेकर चलता है यह मुहावरा अब भ्रम पैदा करता है
अजीब बात है कि जब मैं किसी कथा समारोह या लेखकीय जमावड़े में जाती हूं तो अमूमन मेरा परिचय एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में दिया जाता है और जब मैं महिलाओं की कार्यशाला या किसी महिला अधिवेशन में जाती हूं तो मेरा परिचय हिन्दी की जानी मानी लेखिका कहकर करवाया जाता है।
ब्राह्मणशाही के ख़ात्मे का मुद्दा!
यदि यह जानने का प्रयास किया जाय कि दलित आंदोलनों का केन्द्रीय तत्व क्या है, तो जो चीज उभर कर सामने आयेगी वह है...

