ब्राह्मणशाही के ख़ात्मे का मुद्दा!

एच. एल. दुसाध

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यदि यह जानने का प्रयास किया जाय कि दलित आंदोलनों का केन्द्रीय तत्व क्या है, तो जो चीज उभर कर सामने आयेगी वह है ब्राह्मणवाद का खात्मा। 99.9 प्रतिशत दलित बहुजन लेखक- एक्टिविस्ट ही ब्राह्मणवाद को दलित- बहुजनों की दुर्दशा का मूल कारण समझ कर इसके खात्मे में अपनी अधिकतम उर्जा लगाते रहे हैं। यदि इनका ठीक से अध्ययन किया जाय तो नजर आएगा 1-5 तक ब्राह्मणवाद का खात्मा ही इनका मुख्य मुद्दा है, शेष मुद्दे वरीयता क्रम में 6 से शुरू होते हैं। बहरहाल ब्राह्मणवाद के खात्मे के इस जूनून में बाकी मुद्दे गौड़ हो गए और आज यह समाज उस स्टेज में पहुँच गया है, जिस स्टेज में पहुंचकर विभिन्न समाजों को शासकों से मुक्ति की लड़ाई में उतरना पड़ा।

दरअसल वे ब्राह्मणवाद के खात्मे के नाम पर प्रकारांतर में ब्राह्मणों के प्रभुत्व को ख़त्म करने का आन्दोलन चला रहे  है। क्योंकि वे ब्राह्मणवाद के लिए पूरी तरह ब्राह्मणों को हो दोषी मानते हैं। वे मानते हैं कि ये ब्राह्मण हैं, जिन्होंने लोगों में धर्मशास्त्रों और धार्मिक कर्म-कांडों के जरिये ईश्वर- विश्वास का प्रसार का तरह-तरह के असमानता को बढ़ावा देने के लिए ब्राह्मणवाद को जन्म दिया है और इसके जरिये समाज में अपना प्रभुत्व कायम किया है। यदि लोगों को ईश्वर–विश्वास से मुक्त कर दिया जाय तो उनका सारा खेल ख़त्म हो जायेगा, यह मानकर ही ब्राह्मणवाद के खात्मे की रणनीति के तहत वे अपनी अधिकतम उर्जा बहुजनों को ईश्वर विश्वास से मुक्त करने में लगाते हैं। किन्तु ब्राह्मणवाद के ख़ात्मे के जरिये ब्राह्मणों का प्रभुत्व ख़त्म करने में जुटे आंबेडकरवादी लोगों को ईश्वर- विश्वास मुक्त करने से अधिक नास्तिक बनाने में उर्जा लगाते हैं, वे इस बुनियादी बात की अनदेखी करते हैं कि ईश्वर विश्वास से मुक्तशायद ही दुनिया का कोई मानव समुदाय है। ईश्वर विश्वास से मुक्त न तो दुनिया पर राज करने वाले मुसलमान हैं और न ही मानव सभ्यता को बुलंदी पर पहुंचाने वाले ईसाई! अपने विशिष्ट चरित्र से दुनिया को विस्मित करने वाले सिख और यहूदी भी इससे मुक्त नहीं है। मुसलमान, ईसाई, सिख, यहूदी  इत्यादि बेहद ताकतवार कौम होकर भी अपने- अपने ईश्वर में इसलिए विश्वास करते हैं ताकि वह उन्हें जीवन में आने वाले तरह- तरह के संकटों से निजातदिला सके। कुल मिलाकर ईश्वर विश्वास लोगों को एक ऐसा मनोवैज्ञानिक सुरक्षा प्रदान करता है, जिसका कोई विकल्प ही नहीं है।

जहां तक ईश्वर की कृपा- लाभ के लिए प्रयास का सवाल है, हर धर्म के लोग इसके लिए पूजा-पाठ संपन्न कराने वाले पुरोहित वर्ग पर निर्भर रहने के लिए अभिशप्त रहे हैं। इस क्रम में पुरोहित वर्ग की भूमिका डिवाइन- ब्रोकर (दैविक दलाल) की हो गयी और मानव जाति की ईश्वर के प्रति दुर्बलता का लाभ उठाकर डिवाइन ब्रोकर अर्थात फादर, मौलवी, ब्राह्मण इत्यादि समाज के अधिपति बन गए।

 

जहां तक भारत के दलितों जैसे लाचार लोगों का सवाल है, उनके लिए तो ईश्वर-विश्वास से बढ़कर जीने का कोई सहारा ही नहीं है। सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था के जरिये अपने जीवन में सुखद परिवर्तन की उम्मीद छोड़ चुके ऐसे वंचित तबके किसी दैवीय- चमत्कार के सहारे ही जीवन में अच्छे दिन आने की उम्मीद लिए अपनी दुरावस्था को झेलते रहे हैं। वंचितों की इस मनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए ही मार्क्स जैसे सर्वकाल के सर्वश्रेष्ठ विचारक और नास्तिक ने ऐसे लोगों के प्रयास को घोर निर्ममता करार दिया है, जो वंचितों के जीवनमें बेहतर बदलाव का कोई उपाय किये बिना, उनको ईश्वर विश्वास से मुक्त करना चाहते हैं। जहां तक भारत के दलित – बहुजनों का सवाल है, वे दुनिया के सबसे असहाय मनुष्य- प्राणी हैं, वर्ण व्यवस्था द्वारा सदियों से शक्ति के स्रोतों से पूरी तरह बहिष्कृत किये जाने के कारण ईश्वरीय चमत्कार से अच्छे दिन आने की उम्मीद पालने के सिवाय इनके समक्ष कोई उपाय ही नहीं रहा। इसलिए वे ईश्वर की कृपा-लाभ जय करने का हर मुमकिन प्रयास करते रहे और इस क्रम में अपना मानवीय अधिकार तक गँवा दिए।

जहां तक ईश्वर की कृपा- लाभ के लिए प्रयास का सवाल है, हर धर्म के लोग इसके लिए पूजा-पाठ संपन्न कराने वाले पुरोहित वर्ग पर निर्भर रहने के लिए अभिशप्त रहे हैं। इस क्रम में पुरोहित वर्ग की भूमिका डिवाइन- ब्रोकर (दैविक दलाल) की हो गयी और मानव जाति की ईश्वर के प्रति दुर्बलता का लाभ उठाकर डिवाइन ब्रोकर अर्थात फादर, मौलवी, ब्राह्मण इत्यादि समाज के अधिपति बन गए। इतिहास गवाह है लोगों की इस दुर्बलता का लाभ उठाकर मध्य युग में यूरोप के पुरोहित वर्ग ने वह ताकत अर्जित कर ली थी जिसके समक्ष राजा भी खुद को दीन-हीन महसूस करते। वे जैसी विलासिता पूर्ण जीवन शैली के अभ्यस्त हुए, राजन्य वर्ग इर्ष्या करने के लिए विवश रहा। लोगों की ईश्वर के प्रति इसी दुर्बलता का लाभ उठाकर आज तालिबानी दुनिया पर हुकूमत करने का मंसूबा पालने लगे हैं। जहां तक भारत का सवाल है लोगोँ की ईश्वर के प्रति दुर्बलता का लाभ उठाकर यहाँ के डिवाइन ब्रोकर(ब्राह्मण) खुद को भूदेवता ही घोषित कर दिये।हालांकि डॉ अंबेडकर के अनुसार 1886 भागों में बंटे हर ब्राह्मण को पौरोहित्य अर्थात दैविक दलाली का अधिकार नहीं है। किंतु सच यही है कि सिर्फ ब्राह्मण ही पुरोहिती का कार्य संपन्न कर सकता है। पौरोहित्य के इस एकाधिकार ने सभी प्रकार के ब्राह्मणों को पुरोहित वर्ग में तब्दील कर दिया। इसलिए पूरा का पूरा ब्राह्मण समाज ही पुरोहित वर्ग में उत्तोलित हो गया और ईश्वर विश्वास की कमजोरी का लाभ उठाकर सदियों से डिवाइन ब्रोकेरी का लाभ उठाते आया है और आगे भी उठाते रहेगा, क्योंकि हिंदू समाज भी अन्य समाजों की भाँति ईश्वर के प्रति चिर- दुर्बलता से कभी मुक्त होगा, इसमें संदेह है।

डॉ अंबेडकर की यह सर्वोत्तम रचना बताती है कि धर्म भी शक्ति का स्रोत है, जिसका महत्व आर्थिक शक्ति से जरा भी कम नहीं है। आर्थिक शक्ति के समतुल्य धार्मिक सेक्टर पर देश की सकल आबादी के डेढ़ प्रतिशत के प्रतिनिधि ब्राह्मणों का संपूर्ण एकाधिकार है।

 

अब जहां तक ब्राह्मणवाद के खातमे में लगे बहुजन बुद्धिजीवियों का सवाल है, उन्होंने कभी यह समझने की कोशिश ही नहीं की कि दलित – बहुजन जैसे विश्व के सबसे असहाय तबकों का ईश्वर विश्वास से मुक्त होना प्रायः असंभव है। नहीं! वे इससे मुक्त करना संभव मानते हुए ही भूरि- भूरि नास्तिकता प्रसारक साहित्य रच एवं बहुजनों के बीच जाकर लॉजिक ( युक्ति) के सहारे लोगों को नास्तिक बनाने में जुटे रहे। अगर वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते कि सहज मानवीय दुर्बलता के कारण बहुजनों का ईश्वर- विश्वास से मुक्त होना कठिन है, तब लोगों की इस दुर्बलता का लाभ उठाकर भारत का भाग्य विधाता बने ब्राह्मणों की शक्ति क्षय करने के दूसरे मोर्चे पर ध्यान देते और उनका लक्ष्य बनता ब्राह्मणशाही का खात्मा, जिसका निर्भूल उपाय डॉ अंबेडकर ने ऐनिहिलेशन ऑफ कास्ट में बताया है।

डॉ अंबेडकर की यह सर्वोत्तम रचना बताती है कि धर्म भी शक्ति का स्रोत है, जिसका महत्व आर्थिक शक्ति से जरा भी कम नहीं है। आर्थिक शक्ति के समतुल्य धार्मिक सेक्टर पर देश की सकल आबादी के डेढ़ प्रतिशत के प्रतिनिधि ब्राह्मणों का संपूर्ण एकाधिकार है। ऐसा इसलिए कि यदि ब्राह्मणों की आबादी तीन प्रतिशत है तो महिलाओं के रूप में उनकी आधी आबादी पौरोहित्य के अधिकार से पूरी से शून्य है। बहरहाल लोगों की ईश्वर के प्रति सहज कमजोरी के कारण इस देश में सदियों पूर्व जो ब्राह्मणशाही कायम हुई, वह आज भी कायम है। यह ब्राह्मणशाही अबतक टूट चुकी होती यदि ब्राह्मणवाद के खात्मे में अपना सर्वस्व झोंकने वाले अंबेडकरवादियों ने अपने मसीहा की ऐनिहिलेशन ऑफ कास्ट में सुझाए गये उपाय का अनुसरण करते हुए पौरोहित्य के पेशे के प्रजातंत्रिकरण की लड़ाई लड़ा होता। इसके लिए वे अपनी सारी ऊर्जा मंदिरों के पुजारियों की नियुक्ति में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू करने में लगाते। ऐसा करने पर पौरोहित्य में ब्राह्मणों का एकाधिकार टूटता और क्षत्रिय, वैश्यों के साथ दलित, आदिवासी, पिछड़े समाजों केस्त्री- पुरुषों को भी इस पवित्र व सम्मानित पेशे में संख्यानुपात में अवसर मिलता। लोग पौरोहित्य में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू करवाने के लिए आगे बढ़ें, इस दिशा में बहुजन डाइवर्सिटी मिशन की ओर भूरि- भूरि साहित्य तैयार हुआ, सभा- सेमिनार आयोजित हुए, लेकिन बहुजन बुद्धिजीवी ब्राह्मणवाद के खातमे से इंच भर भी पीछे नहीं हटे। ब्राह्मणशाही के खात्मे का डॉ अंबेडकर द्वारा सुझाए गए मार्ग अनुसरण करते हुए गत जुलाई में तमिलनाडु की स्टालिन सरकार ने अपने राज्य के 36,000 मंदिरों के पुजारियों की नियुक्ति में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू करने का ऐतिहासिक कदम उठाया, पर ब्राह्मणवाद के खातमे के नशे में चूर अंबेडकरवादियों की सोच पर जरा भी असर नहीं पड़ा। वे इससे जरा भी प्रेरणा नहीं लिये।

बहरहाल सारा जोर ब्राह्मणवाद जैसे व्यर्थ के अमूर्त मुद्दे में खर्च करने के कारण ही दलित-बहुजन समाज आज गुलामों की स्थिति में पहुँच गया है। पर, इन ब्राह्मणवाद विरोधियों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ रहा है.उत्पादन के साधनों के पर कब्ज़ा जमाना पूरी दुनिया के वंचितों का 1-9 तक प्रधान एजेंडा रहा है। किन्तु ब्राह्मणवाद विरोधी दलितों के कारण दुनिया के सर्वाधिक वंचित दलित-बहुजनों में यह एजेंडा सिरे से गायब है। दलित-बहुजन समाज के लेखक/एक्टिविस्टों ने जितना जोर अपने लोगों को हिन्दू-धर्म–ईश्वर से विमुक्त करवाने में लगाया है, उसका 25% भी अगर शक्ति के स्रोतों में अपनी वाजिब हिस्सेदारी अर्जित करने तथा ब्राह्मणशाही के खात्मे में लगाया होता, बहुजन समाज की शक्ल कुछ और होती।

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

 

  

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