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ग्राउंड रिपोर्ट

फ़लिस्तीन की जमीनी हकीकत : यात्रा से लौटकर

एक ज़िंदा शहर के ज़िंदा लोग किस तरह से अमानवीय परिस्थितियों में रहने को मजबूर हैं कि उन्हें पानी, बिजली और काम के लिए जूझना पड़ रहा है। कॉमरेड विनीत अपनी फ़लिस्तीन यात्रा के दौरान बेतेलहम, जेरूसलम, नाबलूस, जेनिन, आरमीनिया, जेरिकों तथा जोर्डन वैली गए थे। उन्होंने फ़लिस्तीन यात्रा के दौरान हुई दुश्वारियों और अनुभवों को साझा किया। पढ़िए, वहाँ के कठिन जीवन के संघर्ष का विस्तार से वर्णन। 

किसी देश की यात्रा से हम उस देश के नागरिकों की सामाजिक-राजनैतिक स्थिति और संस्कृति से परिचित होते हैं। अकसर इस अनुभव में हम अपनी नागरिकता, संस्कृति और भूगोल से उसकी तुलना भी करते हैं कि किन मायनों में हम उनके साथ खड़े हैं, किन मायनों में हम उनसे आगे हैं और किन मायनों में हम उनसे कोसों पीछे हैं। दुनिया भर में यायावर मौजूद हैं उनके संस्मरण और अनुभवों से हमारे लिए एक नई खिड़की खुलती है जिसंके माध्यम से हम उस देश या जगह में यात्रा की ख्वाहिश पूरी करते हैं।

सामान्यतः जीवन के सुखद-सामान्य समय में हम कहीं की यात्रा के बारे में योजना बनाते हैं, जिसमें शामिल होता है हमारे मानस की खुशी, उमंग और उत्साह पर जब भीषण-विषम परिस्थितियों से कोई देश लंबे समय से गुज़र रहा हो जहाँ हर पल खतरे और निगरानी के लिए कैमरे लगे हों, जहाँ हर पल आपको शक की निगाह से देखा जा रहा हो, जब आपको यह पता न हो कि आप जहाँ जाने का सोचें हैं वहाँ तक पहुँच भी पाएंगे या नहीं और इससे भी बढ़कर यदि आपको यह भी न पता हो कि यात्रा से आपकी सही-सलामत वापसी हो पाएगी या नहीं तो ऐसी यात्रा की चाह और योजना के जोखिम उस देश में रह रहे लोगों के जोखिम से कम नहीं हो सकते। इन तमाम जोखिम भरी संभावनाओं के बीच हमारे साथी कॉमरेड विनीत तिवारी फ़लिस्तीन गए।

गत 20 मार्च, 2026 को, जमशेदपुर इप्टा ने फ़लिस्तीन आज़ादी का ज़रूरी भविष्य है इस विषय पर अपने अनुभव साझा करने कॉमरेड विनीत जमशेदपुर आए। कॉमरेड विनीत तिवारी के फ़लिस्तीन यात्रा के अनुभव सुने और उनकी आँखों-देखी वर्णन से वहाँ के यथार्थ को समझने की कोशिश की। कार्यक्रम की शुरुआत लिटिल इप्टा के साथियों वर्षा, दिव्या, सुरभि, नम्रता, गुंजन, अभिषेक, काव्या,श्रवण और सुजल ने सलिल चौधरी का युद्ध विरोधी, शांति की अपील का गीत दिशाएं लाख हों अनेक की प्रस्तुति की। कॉमरेड विनीत तिवारी ने फ़लिस्तीन यात्रा के अनुभव सुनाते हुए फ़लिस्तीन की यात्रा की दुश्वारियों के साथ अनुभवों को हमारे साथ साझा किया।

विनीत तिवारी अपने अनुभव साझा करते हुए

यह सच है कि समाचारों से मिल रही सूचनाओं के आधार पर हम उन स्थितियों का आकलन करते हैं पर जब कोई यात्रा से वापिस लौटकर आता है तो उनके सूक्ष्म अवलोकन और अनुभव से हमें सूचनाओं को समझने-देखने का नया दृष्टिकोण मिलता है। बिल्कुल ऐसा ही प्रभाव कॉमरेड विनीत से उनकी यात्रा के अनुभव सुनकर हुआ।

एक ज़िंदा शहर के ज़िंदा लोग किस तरह से अमानवीय परिस्थितियों में रहने को मजबूर हैं कि उन्हें पानी, बिजली और काम के लिए जूझना पड़ रहा है। कॉमरेड विनीत अपनी फ़लिस्तीन यात्रा के दौरान बेतेलहम, जेरूसलम, नाबलूस, जेनिन, आरमीनिया, जेरिकों तथा जोर्डन वैली गए थे। उन्होंने बताया कि कोई भी व्यक्ति सिर्फ देख कर फ़लिस्तीनियों और इज़रायलियों के घर और गाड़ियां में अंतर बता सकता है। छतों में ढेर सी पानी की टंकियाँ फ़लिस्तीनी घर की पहचान हैं क्योंकि उन्हें पता नहीं होता कि अगली बार उनके नल में पानी कब आएगा। हर सौ मीटर पर एक चेकपोस्ट जिनमें हर फ़लिस्तीनी को रुकना होता है और अपनी पहचान दिखानी होती है। इन गेट नुमा चेकपोस्टों से आगे बढ़ने का उनका इंतज़ार मिनिटों से घंटों तक हो सकता है जिसके लिए कोई सुनवाई नहीं। चलने के रास्ते अलग, गाड़ियों के नंबर प्लेट में अलग पहचान कुछ ऐसे सच हैं जिनके साये में जीते फ़लिस्तीनी रोज़ अपने आदमी होने की पहचान से जूझ रहे हैं। उनकी धरती में कहीं जब बम-गोले गिरने की आवाज आती है तो फ़लिस्तिनी नागरिक काम रोक, दो मिनट का मौन रख अपने लोगों के ज़मींदोज़ होने का ग़म मनाकर खून के घूंट पी अपने काम में लग जाने को मजबूर हैं।

हर एक फ़लिस्तीनी की ज़िंदगी रोज़ जाने कितनी पीड़ा और अमानवीयता की हदों से गुज़र जाने वाले वाकयों से गुजरती है जिसकी आवाज़ हम तक नहीं पहुँच पाती। इसकी इंतिहा तब महसूस हुई जब पता चला कि किसी फ़लिस्तीनी के जुर्म की कोई सुनवाई नहीं है मगर हर इज़रायली के लिए सौ खून माफ़ की कहावत चरितार्थ होती है। इज़रायली किसी भी प्रकार के जुर्म को अपना अधिकार समझते हैं और किसी भी जगह से फ़लिस्तीनी नागरिक के किसी भी सामान को छीन लेने य लूट लेने से नहीं हिचकते हैं। बेदूइन, जो कि फ़लिस्तीन के खानाबदोश हैं, उन्हें जब-तब उजाड़ना और उनके सीमित संसाधनों(बकरी,भेद,पानी) को उठाकर ले जाना इज़रायलियों के लिए एक आम बात है। फ़लिस्तीनी नागरिक के लिए मनुष्य होने की बुनियादी जरूरतें भी दीवारों में क़ैद हैं। आप जहाँ नज़रें उठायेंगे वहाँ सेटलर्स की रिहायश दिख जाएगी और यह भी कि किस तरह फ़लिस्तीनियों के रहने की जगहें सिकुड़ती चली जा रही हैं। जेनिन में एक बच्ची सईदा से कॉम विनीत की मुलाकात का ज़िक्र मायूस कर गया – बच्ची ने उन्हें बताया कि पहले उनके रहने के तीन कमरे अब सिकुड़ कर एक कमरे तक महदूद रह गए हैं। उस आवाज़ में कहीं यह आवाज़ भी सुनाई दे रही थी कि न जाने कब इस छत से भी वे महरूम हो जाएं।

‘फायर वैली’ के बारे में कॉम विनीत ने बताया कि यहाँ इज़रायली क्षेत्र के सीवेज का गंदा पानी छोड़ा जाता है और इसी तरह ‘जवाबदेह’ गाँव को इज़रायलियों ने अपनी बेकार हो चुकी गाड़ियों, उनके खराब हो चुके कलपुर्जों और पहियों का कबाड़खाना बना दिया है। रास्तों पर आगे बढ़ते चेतावनी रूपी ‘सावधान आगे फ़लिस्तीनी गाँव है’ जैसी तख्तियाँ आम नजर आती हैं जो इज़रायलियों की नफ़रत के बैनर्स जैसी नज़र आती हैं। फ़लिस्तीन की जमीन पर बड़े-बड़े सोलर पैनल लगाकर, पानी के स्रोतों को तार से घेर कर उनके हिस्से की धूप, पानी और बिजली पर इज़रायली कब्ज़ा तो हो ही चुका है। किसी फ़लिस्तीन की ज़िन्दगी की तरह, उनके स्कूल, अस्पताल और घरों की छतों का जीवन भी उतना ही अनिश्चित है।

फ़लिस्तीन वह क्षेत्र है जहाँ उनकी ज़ैतून संस्कृति, संघर्ष और खुशहाली का प्रतीक है। इसकी खासियत यह है कि ये दरख्त तीन से पाँच हजार वर्ष तक पुराने हो सकते हैं। एक समय इनकी संख्या 2 करोड़ थी जो अब घटकर 1 करोड़ रह गई है। सैटेलमैनट्स को बढ़ाते जाने के लिए ज़ैतून के दरख्तों को किस बेहिसी से काटा जा रहा है ये भी एक जीता-जागता सबूत है इज़रायल के अत्याचारी मिज़ाज का । इस दरख़्त की ख़ासियत है कि साल भर में उस पर पड़ी दस बूंदें भी उसे ज़िंदा रख सकती हैं और ज़ैतून की फ़ितरत के ही हैं फ़लिस्तीनी लोग जो लंबे समय से अपने संघर्ष को ज़िंदा रखे हैं।

फ़लिस्तीन के लिए सिर्फ़ फ़लिस्तीनी ही संघर्ष नहीं कर रहे बल्कि इज़रायली लोग भी प्रतिरोध दर्ज़ कर रहे हैं जिसमें आन्द्रे एक्स का ज़िक्र आया। जेरूसलम में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इज़रायल ‘हदश’ की आयदा टूमा सुलेमान वो चेहरा हैं जिन्होंने संसद में विपक्षी पार्टी में रहते हुए 10 कानून बनाए जिसमें सबसे महत्वपूर्ण नए कानून बनने से लड़कियों की शादी सत्रह से अट्ठारह हुई। एंजेला गोल्डस्टीन यहूदी बी डी एस मूवमेंट से जुड़ी यहूदी कार्यकर्ता हैं।

तमाम प्रताड़नाओं, अत्याचार और अमानावीयता के बावजूद फ़लिस्तीनियों के संघर्ष को सलाम करने की वजहें मौजूद हैं जिनमें फ़लिस्तीनियों द्वारा बनाई गई बड़ी-बड़ी वॉल पेंटिंग्स भी हैं जिनमें जीवन के प्रति प्रेम, सौन्दर्य और जीने की उत्कट जिजीविषा साफ़ दिखाई देती है। ये वे दीवारें हैं जो इज़रायल ने जगह जगह खड़ी की हैं और उन्हें बढ़ाते जा रहे हैं। इन चित्रों की रचनात्मकता जीवन के प्रति राग और फ़लिस्तीन के संघर्ष का जीता-जागता सबूत हैं।

कॉम विनीत की आँखों-देखी और 11 दिनों की यात्रा के अनुभव को सुनते हुए महसूस हुआ कि पूरी दुनिया में नस्लवाद की खाई कितने गहरे जड़ जमा चुकी है और इसका वीभत्स रूप हम देख रहे हैं इसकी चरम परिणति आज चल रहे युद्ध और दुनिया में साम्राज्यवाद की ताकत के रूप में हम देख रहे हैं।

अंत में जमशेदपुर इप्टा के अध्यक्ष अहमद बद्र ने कहा कि इस तरह से कॉम विनीत से फ़लिस्तीन के अनुभव सुनना विरल अनुभव रहा । लंबी बात के बाद भी बहुत कुछ जानने की जिज्ञासा शेष रही। उन्होंने आज के समय में दुनिया में युद्ध के साये में जीती दुनिया के संदर्भ में जोड़ा कि युद्ध की दर्दनाक खबरों से हम शांत नहीं रह पाते और ये हमारे समय का कड़वा यथार्थ है ।

दुनिया को बेहतर बनाने के लिए अपने हक़ के लिए खड़े होने और मनुष्य होने को क्लेम करने के लिए हम फ़लिस्तीनी लोगों के संघर्ष को, उनकी हिम्मत को और उन तमाम लोगों को जो दुनिया भर में इनके साथ संघर्ष में खड़े हैं, उन्हें सलाम !

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