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chandrdev yadav

जो भी कन्ना-खुद्दी है उसे दे दो और नाक ऊंची रखो। लइकी हर न जोती !

चौथा हिस्सा और अन्तिम हिस्सा  माता-पिता के ऊँच-नीच समझाने और घर की दयनीय स्थिति का हवाला देने पर भी जब सुनरी ने अपना निर्णय नहीं बदला तो…
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जो भी कन्ना-खुद्दी है उसे दे दो और नाक ऊंची रखो। लइकी हर न जोती ! (तीसरा हिस्सा)

मेरे अरियात-करियात की बहुत कम औरतें स्वतंत्र और आत्मचेतस रही हैं l मजबूरी में कोई-कोई विधवा स्त्री भले ही अपनी मर्ज़ी से अपना जीवन गुज़ारती…
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