जो भी कन्ना-खुद्दी है उसे दे दो और नाक ऊंची रखो। लइकी हर न जोती ! (तीसरा हिस्सा)

चन्द्रदेव यादव

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मेरे अरियात-करियात की बहुत कम औरतें स्वतंत्र और आत्मचेतस रही हैं l मजबूरी में कोई-कोई विधवा स्त्री भले ही अपनी मर्ज़ी से अपना जीवन गुज़ारती रही हो, अन्यथा वे पुरुषों की मुखापेक्षी रही हैं l संपत्ति-विवाद में उलझी कुछ विधवायें कचहरी में साथ देने वाले गाँव के पुरुषों की हवस का शिकार भी होती रही हैं l कुछ विधवायें दूसरे रूप में भी पुरुषों से छली जाती रही हैं l निम्न और पिछड़े वर्गों की युवा विधवायें अपने देवर के साथ ही उनकी पत्नी बनकर रह जाती थीं, किन्तु उच्च वर्ग की विधवाओं में कुछ की स्थिति अच्छी नहीं थी l उनके यहाँ विधवा की दूसरी शादी का विधान नहीं रहा है l मैंने लोगों से सुना है कि ऐसी विधवाओं का भी यौन शोषण होता रहा है l कुछ घटनाओं की साक्षी तो गाँव-पुर की दाइयाँ रही हैं l गाँवों में प्रेम या प्रेम विवाह का नामो-निशान नहीं रहा है, यह अलग बात है कि कुँवारे और शादीशुदा स्त्री-पुरुषों में शारीरिक संबंध बनते रहे हैं l गाँवों में लोग इसी को ‘प्यार’ कहते थे l लेकिन इधर गाँव की लड़कियाँ भी शहर की लड़कियों की तरह प्रेम करने लगी हैं l उनमें से कइयों का प्रेम विवाह में भी परिणत हो रहा है l कुछ साल पहले बनारस में एक लड़की ने तो अपने प्रेमी के घर बारात ले जाने का अद्भुत कारनामा कर डाला था l कुछ शादियाँ औरतों को उढ़ार कर (भगा कर) भी होती थीं l लेकिन अपनी पसंद के पुरुष के साथ रहने वाली औरतों को जीवन-भर ‘उढ़रुई’ के ताने सुनने पड़ते रहे हैं l

पति की बेवफ़ाई से तंग आकर या कि उसके शराबी या दुर्व्यसनी होने की वजह से बहुत कम औरतें पति से संबंध-विच्छेद करती थीं l पति पत्नी को छोड़े या पत्नी पति को, इसका फैसला पंचायत में होता था l पति-पत्नी के इस अलगाव को ‘छुट्टी-छुट्टा’ कहा जाता था l पति के नामर्द होने की स्थिति में बहुत कम स्त्रियाँ विवाह-विच्छेद करती थीं l उनकी शारीरिक भूख दूसरे मर्दों से मिटती थी l बूढ़े लोगों की जवान पत्नियों के बारे में लोग एक कहावत कहते हैं—रात में तेल लगाने से तेल का मज़ा लेती है तकिया और बुढ़ौती में शादी करने से शादी का मज़ा लेता है पड़ोसिया l मेरी जानकारी में एक ऐसी ‘कुलवती’ स्त्री की ‘गौरव-गाथा’ मौजूद है जिसने अपने नपुंसक पति के साथ ‘अक्षतयोनि’ रहकर पूरी ज़िन्दगी गुज़ार दी l गाँव के एक बुज़ुर्ग से सुना था कि सुहाग रात के दिन उसके पति ने उस नई नवेली दुल्हन से अपनी नपुंसकता की बात बताई और हाथ जोड़कर उससे कहा कि ‘मेरी और मेरे खानदान की इज्ज़त तुम्हारे हाथ में है l तुम चाहो तो इसे बचा लो नहीं तो इसको सरेबाज़ार नीलाम कर दो l’ कहते हैं उस स्त्री ने अपने पति और उसके खानदान का ‘मान’ रखा और कभी अपने ‘कामसुखरहित’ जीवन की शिकायत किसी से नहीं की l उस स्त्री ने अपने सुख की बलि देकर पति के कुल की झूठी मान-मर्यादा की रक्षा की l वास्तव में समाज ने अधिकतर स्त्रियों को ही छला है l

हमारे समाज में विधवा बुज़ुर्ग स्त्रियों की स्थिति भी अच्छी नहीं रही है l यह समस्या कमोबेश आज भी है l इस समस्या को लेकर प्रेमचंद ने ‘बेटों वाली विधवा’ नाम से एक बेहतरीन कहानी लिखी थी l मेरे इलाक़े के एक सम्पन्न घर की विधवा बारी-बारी से अपने दो बेटों के साथ शहर में रहने गई l बड़े बेटे ने माँ को फुसला कर उसके सारे गहने ले लिए और फिर छोटे भाई पर दबाव बना कर माँ को उसके यहाँ भेज दिया l कहा कि ‘माँ हम दोनों की ज़िम्मेदारी है l माँ को साल भर मैंने अपने साथ रखा, अब साल भर तू अपने साथ रख’ l छोटा भाई माँ को अपने साथ लिवा गया, लेकिन जैसे ही उसे हक़ीक़त का पता चला, उसने माँ को यह कहकर बड़े भाई के पास पहुँचा दिया कि ‘जब सारा माल-मत्ता बड़े को दे दिया है तो वहीँ जाकर रहो l

इसके विपरीत एक-डेढ़ दशक पहले एक नवविवाहिता ने ससुराल में पहली ही रात अपने पति की हत्या करवा दी और अपने प्रेमी के साथ फुर्र हो गई l उस व्यक्ति की हत्या के एक हफ़्ते बाद उसके घर उसके सरकारी अफ़सर होने की सूचना से संबंधित एक पत्र आया l लोगों ने उस युवती की कमअक्ली पर उसे खूब कोसा l इसी तरह बनारस में एक इंजीनियर की पत्नी को दूध बेचने वाले एक सरदार से प्रेम हो गयाl बनारस में यादवों को सरदार कहते हैं l इसका कारण यह है कि यादवों ने अनेक मौक़ों पर दुश्मनों से बनारस की रक्षा की है l इसीलिए उनके वीरतापूर्ण कृत्य के लिए उन्हें सरदार कहा जाने लगा l खैर उस दूध वाले सरदार से प्रेम की बात उजागर होने पर उस सवर्ण इंजीनियर ने अपनी पत्नी को मय सरो-सामान उसके यादव प्रेमी के साथ भेज दिया l नौवें दशक की इस घटना को बनारस के अखबारों ने प्रमुखता से छपा था l

हमारे समाज में विधवा बुज़ुर्ग स्त्रियों की स्थिति भी अच्छी नहीं रही है l यह समस्या कमोबेश आज भी है l इस समस्या को लेकर प्रेमचंद ने ‘बेटों वाली विधवा’ नाम से एक बेहतरीन कहानी लिखी थी l मेरे इलाक़े के एक सम्पन्न घर की विधवा बारी-बारी से अपने दो बेटों के साथ शहर में रहने गई l बड़े बेटे ने माँ को फुसला कर उसके सारे गहने ले लिए और फिर छोटे भाई पर दबाव बना कर माँ को उसके यहाँ भेज दिया l कहा कि ‘माँ हम दोनों की ज़िम्मेदारी है l माँ को साल भर मैंने अपने साथ रखा, अब साल भर तू अपने साथ रख’ l छोटा भाई माँ को अपने साथ लिवा गया, लेकिन जैसे ही उसे हक़ीक़त का पता चला, उसने माँ को यह कहकर बड़े भाई के पास पहुँचा दिया कि ‘जब सारा माल-मत्ता बड़े को दे दिया है तो वहीँ जाकर रहो l’ बड़े भाई ने बहाने से माँ को गाँव भेज दिया और इस तरह दोनों ने माँ के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह कर लिया l बेटों की बेरुखी और चिंता के कारण वह बुढ़िया बीमार रहने लगी l उसे असहाय देखकर उसके भाई ने उसे अपने घर बुलवा लिया और अपनी सामर्थ्य भर उसकी दवा-दारू की l इस स्थिति में भी उसका कोई बेटा उसे देखने नहीं आया l और एक दिन वह बुढ़िया मर गई l फिर भी उसके बेटे नहीं आए l आखिर बुढ़िया के भाई ने ही उसका अंतिम संस्कार और क्रिया-कर्म किया l

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महाभारत काल के बाद हमारे समाज ने ‘नियोग’ की प्रथा पर प्रतिबन्ध लगा दिया l लेकिन इस निषेध के बावजूद आज तक संतानहीन कुछ स्त्रियाँ गुपचुप तरीके से अपने रक्तसंबंधियों या किसी अन्य पुरुष के सहयोग से संतान-सुख प्राप्त करती रही हैं l अपने उद्देश्य में वे कभी-कभी असफल भी हो जाती थीं l कई बार तो घर के बड़े-बूढ़े भी इस मिशन में शामिल होते थे l पड़ोसी गाँव के एक खूबसूरत जोड़े को लाख कोशिशों के बावजूद जब संतानोत्पत्ति में निराशा हाथ लगी तो पति ने हार मानकर दवा-दारू और देवी-देवता पूजन छोड़ दिया l लेकिन पत्नी प्रयास करती रही l पति की नाजानकारी में उसने अपने खानदान के सभी देवरों से संबंध बनाए, फिर भी उसकी गोद सूनी की सूनी रही l उस सुन्दर जोड़े को संतानहीन देखकर लोगों के दिल में कचोट होती थी l मुझे भी उनके झुर्रियों भरे चेहरे पर विषाद की स्थाई छाप दिखाई देती थी l

जिस समाज में बेटी पैदा होने पर लोगों के चेहरे पे मसानी उदासी छा जाती थी, उसी समाज में नि:संतान दम्पति बेटी पैदा होने पर भी फूले नहीं समाते रहे हैं l उनके लिए इससे बड़ी ख़ुशी की बात और क्या हो सकती थी कि बेटी पैदा होने के बाद उन्हें कोई ‘निरबंसिया’ और ‘निपूती’ नहीं कहता था l यही नहीं, उन स्त्रियों को ‘बाँझ’ विशेषण से हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाती थी l किसी मांगलिक अवसर पर बाँझ स्त्रियों की छाया से भी लोग बचते रहे हैं l समाज के तानों से आहत ऐसे स्त्री-पुरुषों के लिए बेटियाँ किसी बेटे से कम नहीं होती थीं l

कुछ मामलों में तो यह भी देखने को मिला कि संतानोत्पत्ति में अक्षम बेटे के कारण ससुर ने ही पुत्रवधू को पुत्रवती बनाया l कई बार इस अभियान में नि:संतान स्त्रियों की सासें भी शरीक होती थीं l ससुर के पौरुष से पुत्रवधू के कुलदीपक पैदा करने पर सास-ससुर उसे अपने बेटे के पौरुष से जोड़ देते थे ताकि निर्वीर्य और बकलोल बेटे की आड़ में ससुर की अनैतिकता उजागर न होने पाए और उसकी वंशबेल बढ़ती रहे l ऐसे मामले में आस-पास के लोग कानाफूसी करके चुप्पी लगा जाते थे l कुछ एक मामलों में भेद खुल जाने पर पंच लोग दोषी व्यक्ति से ‘डांड़-भात’ लेते थे और उन्हें दोषमुक्त कर देते थे l

एक वाकया ऐसा भी है जिसमें बरसों से पोते का मुँह देखने को तरस रही एक सास अपनी बहू को लेकर बरमचारी बाबा के थान पर गई और वहाँ कई दिनों तक नई उम्र के ‘बरमचारी’ साधु के कहे अनुसार थान के पिंडी की सेवा करती रही l साधु महराज के निर्देशानुसार की जा रही पूजा-अर्चना के दौरान ही बहू ‘उम्मीद’ से हो गई l बहू को पुष्पवती हुई जानकर सास बहुत खुश हुई l बरमचारी बाबा के थान से लौटकर उसने पूरे गाँव में प्रचारित कर दिया कि बाबा के धाम के लिए घर से निकलते ही बाबा की कृपा से बहू में गर्भ के लक्षण दिख गए थे l हमें तो बाबा के धाम पहुँचने से पहले ही भगवान का आशीर्वाद मिल गया था l बरमचारी बाबा की ‘कृपा’ से सास-बहू दोनों खुश थीं l सास को अपने ‘कुलदीपक’ और बहू को अपने ‘पति परमेश्वर’ की हकीकत मालूम थी l सास को किसी ऐसी ही स्त्री ने सलाह दी थी जिसकी गोद बरमचारी बाबा के प्रसाद से भरी थी l वास्तव में बहुत-सी नि:संतान स्त्रियों की कोख बाबाओं और लोफरों की कृपा से भरी है l गाँवों में कई चेहरे ऐसे मिल जाएँगे जिनके नैन-नक्स उनके अपने माँ-बाप से नहीं, बल्कि किसी दूसरे व्यक्ति से मिलते-जुलते हैं l कुछ एक विधवा-पुत्र तो अपने पिता की मृत्यु के बारह-चौदह महीने बाद इस दुनिया में आए l इसके लिए उन विधवाओं को बिरादरी ने काला पानी की सज़ा नहीं दी l कुछ विधवा औरतें तो अपनी बिरादरी के पंचों की भूख मिटाकर दोष-पाप से मुक्त हो गईंl

जिस समाज में बेटी पैदा होने पर लोगों के चेहरे पे मसानी उदासी छा जाती थी, उसी समाज में नि:संतान दम्पति बेटी पैदा होने पर भी फूले नहीं समाते रहे हैं l उनके लिए इससे बड़ी ख़ुशी की बात और क्या हो सकती थी कि बेटी पैदा होने के बाद उन्हें कोई ‘निरबंसिया’ और ‘निपूती’ नहीं कहता था l यही नहीं, उन स्त्रियों को ‘बाँझ’ विशेषण से हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाती थी l किसी मांगलिक अवसर पर बाँझ स्त्रियों की छाया से भी लोग बचते रहे हैं l समाज के तानों से आहत ऐसे स्त्री-पुरुषों के लिए बेटियाँ किसी बेटे से कम नहीं होती थीं l

पहले गांवों में किशोरियों या युवतियों को किसी पुरुष के सम्पर्क में आने के बाद रति-रहस्य की जानकारी प्राप्त होती थी अथवा ससुराल से सफल मनोरथ होकर मायके वापस आई किसी सहेली से उन्हें काम-कला का पता चलता था l कुछ अनुभवी युवतियाँ इस कला से अनभिज्ञ युवतियों को स्त्री-पुरुष-खेल का अभ्यास करा के पुरुष-संसर्ग के लिए तैयार करती थीं l वे चाहती थीं कि उनकी सखी अच्छी दुल्हन तो बने, किन्तु बहुत आसानी से पति के आगे समर्पण न करे l इससे उसकी पुरुष-संसर्ग की व्याकुलता न ज़ाहिर हो l समवयस्क सखियों के न रहने पर कुछ युवतियों को सीधे ससुराल में जाकर ही इस रहस्य का पता चलता था l वैसे भी कहा गया है कि जहाँ मुर्गा नहीं होता वहाँ भी बिहान होता है l उपयुक्त समय पर सभी किशोर-किशोरियों को इसकी जानकारी हो ही जाती है l बहुत पहले बिहारी लिख ही चुके हैं—

खेलन सिखए अलि भले चतुर अहेरी मार l

चाहत पिय अद्वैतता नागर नरन सिकार l

ऐसी ही एक युवा हो रही सुन्दर-सी लड़की गौना में देरी होने के कारण कामसंतप्त रहने लगी l शील-संकोच और मर्यादा के चलते उसने अपने आसपास के किसी पुरुष से अपने मन की गाँठें नहीं खोलीं l गाँव में कोई उसका समवयस्क भी नहीं था l इसीलिए एक दिन उसने अपने सुनसान घर में नौ-दस साल के एक लड़के को बहला-फुसलाकर बुलाया और खूब लाड़-प्यार किया l फिर उसने उससे संसर्ग करने का प्रयास किया, मगर वह अपनी कोशिश में नाकाम रही l इसके बाद उसे कोई पुरुष मिला या नहीं और उसने अपना कामोद्वेग कैसे शांत किया, इसके बारे में नहीं मालूम l

कुछ समय बाद उसका गौना हुआ और वह अपनी ससुराल गई l एक-आध महीने बाद जब वह अपनी ससुराल से मायके वापस आई तो पता चला कि वह पहले की तरह ही सतृष्ण और उद्विग्न है l मायके आकर उसने अपनी माँ से साफ-साफ कह दिया कि वह पुन: अपनी ससुराल नहीं जाएगी l उसके इस तरह से मना करने पर उसके माँ-बाप को धक्का लगा l लड़की की शादी में क्या क्या पापड़ नहीं बेलने पड़ते हैं, मगर जब लड़की अपनी ससुराल में और खास तौर से अपने पति से असंतुष्ट हो तब माँ-बाप को बहुत बड़ा झटका लगता है l धीरे-धीरे एक कान से दूसरे कान होती हुई यह बात पूरे टोले में फ़ैल गई कि सुनरी का पति बउचट है l लेकिन उसका पति शारीरिक रूप से भी अक्षम होगा, यह किसी ने नहीं सोचा था l

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गाँव वालों को सुनरी के पति के बउचट होने का आभास उसके गौने वाले दिन ही हो गया था l उस दिन दूल्हे का मुँह सूजा हुआ था l मुँह सूजने का कारण पूछने पर दूल्हे के बाप ने बताया कि उसे मधुमक्खियों ने काट लिया है l लेकिन असल बात कुछ और थी l सुनरी के विदा होने से पहले ही उसे एक भेदिया ने पता कर ही लिया l

सुनरी का पति चरवाहा था l गौने से चार-पाँच दिन पहले दूल्हे के एक चरवाहे दोस्त ने उसके साथ मज़ाक़ किया और कहा कि तुम्हारी दाढ़ी-मूँछ को देखकर ससुराल के लोग कहेंगे कि दूल्हा खबीस है l इसलिए तुम इसे साफ कर लो l उसने अपने साथी चरवाहे से पूछा कि दाढ़ी-मूँछ को कैसे साफ करूँ? साथी ने कहा कि आम का लासा लेकर इन्हें उखाड़ डालो l फिर क्या उसने उसकी सलाह पर अमल किया और आम के एक पेड़ से लासा लेकर अपनी दाढ़ी-मूँछ के सारे बाल उखाड़ डाले l इसकी वजह से उसका मुँह खुनहर कर सूज गया l मारे लाज-शरम के वह दो दिन तक एक भँड़भूजे के पत्तियों के गाँज में छिपा रहा और घर ही नहीं गया l गौने वाले दिन उसको खोज-खाज कर लाया गया l फिर उसे डोली में बिठा कर लोग उसकी ससुराल गए l वहाँ पर दूल्हे के बाप और बारातियों से हर जगह एक ही सवाल पूछा जा रहा था कि दूल्हे का चेहरा सूजा हुआ क्यों है? इस सवाल के जवाब में सबका बस एक ही जवाब होता कि मधुमक्खियों  ने काट लिया है l बाद में जब सबको असली कारण का पता चला तो हँसते-हँसते लोगों के पेट में बल पड़ गए l

क्रमशः …

चन्द्रदेव यादव जामिया मिलिया इस्लामिया विवि में प्रोफेसर हैं l

 

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