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साम्राज्यवाद के नए दौर की शुरुआत है ईरान पर हमला
घटनाओं में भारत की भूमिका उसकी बदलती विदेश नीति के बारे में आँखें खोलने वाली है। शुरुआत में भारत गुटनिरपेक्ष था, और उसके ईरान के साथ बहुत सौहार्दपूर्ण संबंध थे। दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और आर्थिक आदान-प्रदान बेहतरीन था। अब हम देखते हैं कि भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने युद्ध से ठीक पहले इज़राइल का दौरा किया। इस दौरे का उद्देश्य देश को पता नहीं था। उन्हें इज़राइल का सर्वोच्च सम्मान मिला, और उन्होंने यह वचन दिया कि भारत हर सुख-दुख में इज़राइल के साथ खड़ा रहेगा। अगले ही दिन, I-A ने ईरान पर हमला कर दिया। श्री मोदी ने ईरान के सर्वोच्च नेता के निधन पर कोई ट्वीट नहीं किया, और एक ऐसा गोलमोल बयान जारी किया जिसमें हमलावर और पीड़ित देश, दोनों को एक ही तराज़ू में तौला गया।
ईरान युद्ध : तेल, साम्राज्य और शासन परिवर्तन की नई राजनीति
28 फरवरी, 2026 को, ईरानी समय के हिसाब से सुबह लगभग 7:00 बजे अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए, जिसके बाद नई जंग शुरू हो गई। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के भीतर किए गए संयुक्त हवाई हमलों (Operation Epic Fury) के बाद से दोनों देश सीधे सैन्य संघर्ष में हैं। इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मृत्यु और कई महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों के नष्ट होने की खबरें हैं। लड़ाई की वजह तेल के सोर्स पर कंट्रोल की है।
दिल्ली : फिलिस्तीनी अपने अधिकार के लिए आत्मसम्मान के साथ जीतने तक लड़ेंगे
इंडो-फिलिस्तीन सॉलिडैरिटी नेटवर्क (आईपीएसएन) ने 06 मार्च, 2026 को नयी दिल्ली के प्रेस क्लब में 'फिलिस्तीन, ज़ायोनी-साम्राज्यवादी प्रभुत्व, और बदलती भू-राजनीति' विषय पर एक परिचर्चा का आयोजन किया था जिसमें पश्चिम एशिया के मामलों के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार शामिल हुए।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस : महिलाओं के प्रति सामाजिक व्यवहार से उठता हुआ सवाल कि क्या वाकई महिलाएं आज़ाद हैं
हर साल आठ मार्च को महिला दिवस मनाया जाता है। यूं तो यह एक महत्वपूर्ण दिन है लेकिन इसका अर्थ अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग होता है। अखबार प्रायः विभिन्न क्षेत्रों में सफल महिलाओं की तस्वीरें और विवरण छापकर और कुछ विज्ञापन जुटाकर इसे मना लेते हैं। अमूमन पुरुष इसके प्रति मज़ाकिया वाक्य लिखते हैं और कुछ लोग अपने भीतर की हिपोक्रेसी का परिचय देते हुये बधाई और शुभकामनाओं से फेसबुक को पाट देते हैं। लेकिन वास्तव में यह दिन हमें उन हालात की ओर नज़र डालने को प्रेरित करता है जिनमें पूरी दुनिया की महिलाएं फिलहाल जी रही हैं। भारत जैसे देश में जहां अभी भी महिलाओं के ऊपर जाति-व्यवस्था और पितृसत्ता के कई-कई जुए नाधे गए हैं, के साथ ही अतिरिक्त बाकी दुनिया की महिलाओं की स्थितियाँ बहुत भयावह हैं। फिलिस्तीन, सीरिया और रोहिंग्या समुदाय की स्त्रियों की कतार में मणिपुर की महिलाओं की त्रासदी को भी देखा जाना चाहिए। स्त्री उत्पीड़न के आंकड़ों में कोई कमी नहीं आ रही है बल्कि उनके खिलाफ अपराध की नई-नई विधियाँ सामने आ रही हैं। आठ मार्च इन सब पर ठहर कर सोचने का दिन है क्योंकि सोच ही मनुष्य को मन के भीतर उतरने का रास्ता देती है। और तभी यह समझा जा सकता है कि आखिर आठ मार्च की प्रासंगिकता क्या है। जाने-माने बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ सुरेश खैरनार ने अपने अनुभवों के आधार पर इस दिन को इसी ज़िम्मेदारी के तहत याद किया है।

