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ish kumar ganganiya
अपना कोई गाँव नहीं था लेकिन पूरा बचपन गाँवों में ही बीता
दलित समाज से जुड़े़ लेखक अपनी आत्मकथाएं लिख रहे हैं। इन आत्मकथाओं में दलित जीवन व दलित समाज से जुड़े़ जातीय भेदभाव को मूल रूप से उजागर किया है। जहां तक लेखिकाओं की आत्मकथाओं का सवाल है तो वहां भी जाति के साथ-साथ लिंग भेद अपने मुखर रूप में मौजूद रहता है। कवि-आलोचक ईश कुमार गंगानिया ने हरियाणा के विभिन्न गाँवों में बीते अपने बचपन की सहज कहानी कही है।
भारत में जाति एक ऐसा कोढ़ है जिसे निरंतर खुजलाए जाने की जरूरत रहती है
यह कारतूसों के बैक-फायर का ही परिणाम है कि हम तथागत बुद्ध, कबीर, डा. अम्बेडकर, फुले, पेरियार आदि सभी को जाति की कीच में घसीटने से बाज नहीं आते। फर्जी आजीवक के पैरोकारों ने तो इस कीच को दलदल का अखाड़ा बना छोड़ा है। वे खुद तो इस दलदल में फंसे हैं और अन्य को भी इसी दलदल में फंसाकर अपनी चौहदराट स्थापित करने के पक्षधर हैं। लगता है हर साख पे उल्लू बैठा है, मगर यह तो समय ही बताएगा कि अंजाम ए गुलस्तिां क्या होगा।

