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kashmir singh

सामाजिक आक्रोश और प्रतिकार का बिगुल हैं कविताएं

आदमखोर   केवल जानवर हो सकता है इंसान नहीं, तू भी इंसान नहीं हमारी हड्डियों को चाभने वाला दोपाया जानवर है आदमखोर…
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