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क्या सेठ अंबानी की दावत में शामिल होने से अखिलेश यादव छोटे और न शामिल होने से राहुल गांधी बड़े नेता बन गए हैं

अनंत अंबानी की शादी में राजनेताओं के शामिल होने को लेकर भारत में भीषण मॉरल पुलिसिंग जारी है। जनवादी सोच का कोई भी व्यक्ति इसे धनबल का नंगा और अश्लील प्रदर्शन ही कहेगा। लेकिन शादी में विपक्ष के अनेक नेताओं के शामिल होने और राहुल गांधी के न शामिल होने को लेकर जिस तरह की बहसें चल रही हैं उससे अंदाज़ा होता है कि देश की जनता अभी भी हर मुद्दा ज़मीन पर नहीं इमोशनल संसार में सुलझाने में अधिक रुचि लेती है। लोकतंत्र के सबसे कठिन दौर में जब सघन राजनीतिक बहसों, आंदोलनों और संघर्षों के जरिये नेताओं को परखने की जरूरत है तब एक शादी के बहाने खड़ी की गई बहसों के जलजले ने बता दिया कि अभी यह दौर कुछ और चलेगा। इन स्थितियों का विश्लेषण कर रहे हैं युवा लेखक मुलायम सिंह।

‘गैंगस्टर’ पूंजीपतियों के देश में भुखमरी का सवाल  

यह भी समझाना जरूरी है कि भारत में भूख और कुपोषण की समस्या को देखते हुये खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 एक सीमित हल पेश करता ही है, उपरोक्त चारों हकदारियां खाद्य असुरक्षा की व्यापकता को पूरी तरह से संबोधित करने के लिये नाकाफी हैं और ये भूख और कुपोषण के मूल कारणों का हल पेश नही करती हैं।

किसान आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में विगत दशकों में चल रहे आंदोलन का एक सिलसिला

यह समय का पहिया घूमने जैसी बात है। दस साल हो रहे हैं जब 2009 में आई ग्रामीण विकास मंत्रालय एक मसविदा रिपोर्ट के 160 वें पन्‍ने पर भारत के आदिवासी इलाकों में कब्जाई जा रही ज़मीनों को धरती के इतिहास में 'कोलंबस के बाद की सबसे बड़ी लूट' बताया गया था। कमिटी ऑनस्‍टेट अग्रेरियन रिलेशंस एंड अनफिनिश्‍ड टास्‍क ऑफ लैंडरिफॉर्म्‍स शीर्षक से यह रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक विमर्श का हिस्‍सा नहीं बन पाई है, जिसने छत्‍तीसगढ़ और झारखण्‍ड के कुछ इलाकों में सरकारों और निजी कंपनियों (नाम समेत) की मिली भगत से हो रही ज़मीन की लूट से पैदा हो रहे गृहयुद्ध जैसे हालात की ओर इशारा किया था।

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