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लेखक समाज के आगे मशाल लेकर चलता है यह मुहावरा अब भ्रम पैदा करता है
अजीब बात है कि जब मैं किसी कथा समारोह या लेखकीय जमावड़े में जाती हूं तो अमूमन मेरा परिचय एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में दिया जाता है और जब मैं महिलाओं की कार्यशाला या किसी महिला अधिवेशन में जाती हूं तो मेरा परिचय हिन्दी की जानी मानी लेखिका कहकर करवाया जाता है।

