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रायगढ़ का आशा प्रशामक देखभाल गृह : संसाधनों की कमी है जज़्बे की नहीं

रायगढ़ शहर में रिहैब फाउंडेशन द्वारा संचालित आशा प्रशामक देखभाल गृह में इस समय साठ से अधिक बुजुर्ग स्त्री-पुरुष और मानसिक रोगी हैं। इनमें से कई पूरी तरह ठीक हो चुके हैं लेकिन उनके घरवाले उन्हें वापस ले जाने को तैयार नहीं है। ऐसे में बिना किसी सरकारी सहायता से केवल जनसहयोग के भरोसे चलनेवाले इस प्रशामक गृह पर आर्थिक दुश्वारियाँ लगातार बढ़ रही हैं। इसकी संचालिका जस्सी फिलिप स्वयं बचपन में पोलियो का शिकार हो गई थीं लेकिन अपने जीवट से उन्होंने न केवल अपनी शिक्षा पूरी की बल्कि यह सेवा केंद्र शुरू किया। उनका जीवन एक प्रेरणादायी यात्रा है। इस संस्था के बहाने छत्तीसगढ़ में वृद्धाश्रमों पर पढ़िये अपर्णा की यह रिपोर्ट।

सामाजिक संवाद की कड़ियाँ टूटने से अकेले पड़ते जा रहे हैं बुजुर्ग

औसत उम्र में वृद्धि होने के बाद देश में बुजुर्गों की संख्या में वृद्धि हुई है। लेकिन सामाजिकता में लगातार कमी आई है, जिसकी वजह से बुजुर्गों में अकेलेपन की समस्या बढ़ गई है। इस बढ़ती हुई समस्या के लिए  विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सामाजिक संपर्क के लिए एक आयोग की स्थापना तीन वर्षों के लिए की है। स्वास्थ्य संगठन की चिंता वाजिब है लेकिन सवाल यह उठता है कि इस तरह की सामाजिकता  से क्या हल निकल पायेगा या यह केवल खानापूर्ति ही साबित होगा।

वृद्धाश्रमों का बढ़ता चलन चिंताजनक है

भारत भूमि के संस्कारों ने हमेशा बड़े बुजुर्गों को सम्मान दिलाया है। हमारी संस्कृति यह सिखाती है कि बड़ों की इज्जत करो और उनका...

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