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तमनार : बेकाबू कॉर्पोरेट ताकतों ने आदिवासी समुदाय को जरूरी संसाधनों से किया बेदखल

भूमि अधिग्रहण अधिनियम कहता है कि बिना उचित सहमति और उचित मुआवज़े के सार्वजनिक या औद्योगिक उद्देश्यों के लिए भूमि नहीं ली जा सकती, लेकिन गारे के ग्रामीणों को अपनी भूमि और संपत्ति के अधिकार की रक्षा के लिए शक्तिशाली कंपनियों के खिलाफ लड़ाई में अकेला छोड़ दिया गया है। पढ़िए राजेश त्रिपाठी की तमनार से ग्राउंड रिपोर्ट

रायगढ़ : पेसा कानून को नज़रअंदाज़ करके बन रहा है रेल कॉरिडोर, गाँव वाले इसलिए कर रहे हैं विरोध

घरघोड़ा से पेलमा तक रेल लाइन बिछाने के लिए 21 गांवों में 600 किसानों की ज़मीनें जाएंगी और 3 हजार की आबादी विस्थापित होगी। इस इलाके में आदिवासियों का निवास है। जिनकी अपनी थोड़ी सी खेती-किसानी है और इनका पूरा जीवनयापन जंगलों पर निर्भर है।

उदारीकरण और केंद्रीकरण की दिशा में आदिवासियों पर एक और हमला है वन संरक्षण कानून में संशोधन विधेयक

भले ही सत्तारूढ़ पार्टी ने संसद में विपक्षी दलों के किसी भी हस्तक्षेप को रोका हो, लेकिन उसने बिना चर्चा के सरकारी कामकाज को...

क्या सोच रहे हैं विस्थापन की दहशत के बीच तमनार के लोग

रायगढ़ जिले के तमनार और घरघोड़ा ब्लॉक में कोयले की अनेक खदानें हैं। उन कोयला संसाधनों पर सैकड़ों गाँव बसे हुए हैं। लगातार खनन के लिए लोगों का विस्थापन कंपनी अपनी शर्तों पर कर रही है। गाँव के विस्थापन का मतलब गाँव का नक्शे से खत्म हो जाना और विस्थापित व्यक्ति के लिए यह एक तरीके से मौत है। जिसे अपनी जमीन से विस्थापित कर दिया जाता है, संबंध उस जगह से उसका भावनात्मक जुड़ाव और रिश्ता होता है।

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