Wednesday, May 22, 2024
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रायगढ़ : पेसा कानून को नज़रअंदाज़ करके बन रहा है रेल कॉरिडोर, गाँव वाले इसलिए कर रहे हैं विरोध

घरघोड़ा से पेलमा तक रेल लाइन बिछाने के लिए 21 गांवों में 600 किसानों की ज़मीनें जाएंगी और 3 हजार की आबादी विस्थापित होगी। इस इलाके में आदिवासियों का निवास है। जिनकी अपनी थोड़ी सी खेती-किसानी है और इनका पूरा जीवनयापन जंगलों पर निर्भर है।

रायगढ़। एनटीपीसी लारा से घरघोड़ा होते हुए पेलमा जाने वाली तमनार रेल लाइन के निर्माण के लिए प्रशासन द्वारा जबरदस्ती एक दबाव बनाया जा रहा है, जबकि पेलमा गाँव के लोग इसका लगातार विरोध कर रहे हैं। तमनार तहसील के अंतर्गत आने वाले गांवों के लोग सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना का भारी विरोध कर रहे हैं।

पिछले माह की 15 दिसंबर को पेलमावासियों ने घरघोड़ा के अनुविभागीय अधिकारी को रेललाइन नहीं बनने देने के लिए ज्ञापन सौंपा था। पेलमा की सरपंच राजकुमारी ने लिखित आवेदन देकर बताया था कि उनका गाँव पेसा कानून के अंतर्गत आता है। पेसा कानून के अंतर्गत आने वाले गांवों में किसी भी परियोजना के लिए ग्रामसभा की अनुमति जरूरी है। गाँव के 80 प्रतिशत लोगों ने  ग्रामसभा में रेल लाइन बनाने और खदान शुरू किए जाने का विरोध दर्ज किया है।

21 दिसंबर को और 10 जनवरी को प्रशासन ने पेलमा ग्रामवासियों के साथ एक बैठक रखी, जिसमें घरघोड़ा के एसडीएम रमेश मोर, तमनार की तहसीलदार ऋचा सिंह, तमनार के टीआई आशीर्वाद और रेल्वे विभाग के कर्मचारियों शामिल हुए। प्रशासन के इन अधिकारियों द्वारा ग्रामीणों के ऊपर रेल लाइन के निर्माण और कोयला उत्खन्नन हो इसके लिए दबाव बनाया जा रहा है। अधिकारियों ने स्पष्ट रूप से यह कहा कि विरोध करने पर बलपूर्वक करवाया जाएगा। अधिकारियों ने रेल लाइन के फायदे बताए और क्षेत्र का विकास कैसे होगा यह भी बताया।

घरघोड़ा और तमनार के प्रशासनिक अधिकारी, ग्राम पेलमा ग्रामीणों को सहमत करते हुए

रायगढ़ जिले के तमनार तहसील में ग्राम पेलमा के बीच बस्ती से एसईसीएल एनटीपीसी लारा से घरघोड़ा होते हुए रेल लाइन का निर्माण करना चाहती है। दूसरी लाइन खरसिया/ भूपदेवपुर से होते हुए घरघोड़ा तक पहुँच चुकी है। लेकिन घरघोड़ा होते हुए पेलमा जाने वाली रेल लाइन पेलमा निवासियों के विरोध के कारण रुका हुआ है। रेल लाइन का 80 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है केवल 20 प्रतिशत काम रूका हुआ है।

रेल लाइन की जरूरत क्यों 

धरमजयगढ़ और तमनार क्षेत्र कोला बाहुल्य क्षेत्र है। यहाँ रेल लाइन मुख्यत: कोयला परिवहन  के लिए बनाई जा रही है। जिसमें खरसिया/भूपदेवपुर से धरमजयगढ़ से घरघोड़ा की 74 किलोमीटर रेल लाइन बन चुकी है। घरघोड़ा से पेलमा तक की 21 किलोमीटर तक के रेल लाइन के लिए पेलमावासियों ने ग्रामसभा कर एकमत से मना कर दिया है लेकिन प्रशासन का लगातार दबाव बनाया जा रहा है। इसे जल्द से जल्द निर्मित करने का कारण एसईसीएल खदान से अडानी समूह द्वारा कोयला निकालना है। 21 किमी की रेल लाइन में 21 गांव की करीब 100 हेक्टेयर जमीन परियोजना के दायरे में आएगी। नीचे वीडियो में जंगल काटकर रेल के लिए तैयार की गई जमीन, जिसमें जानवर घास के लिए भटकते हुए। साथ ही ग्रामीण जंगल काटने के बाद हुए नुकसान दिखाते हुए-

साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल) ने रायगढ़ क्षेत्र में स्थित पेलमा कोयला की खुली खदान को  खदान माइन, डेवेलपर और ऑपरेटर (एमओडी) मोड के अंतर्गत चलाएँगे। जिसके तहत अडानी समूह की कंपनी ने पेलमा कोलोयरिज जे साथ समझौता किया है। छत्तीसगढ़ में पेलमा खदान एमओडी मोड में कोयला उत्पादन वाली एसईसीएल की पहली खुली खदान है। अर्थात कोयला खदान एसईसीएल की है और कोयला खनन का काम अडानी करेगा।

एमओडी मोड खदान से कोयला निकालने की एक नई अवधारणा है, इसके अंतर्गत सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर देश की ऊर्जा की जरूरत को पूरा करते हैं । अडानी के एमओडी मोड से कोल इंडिया को कोयला खनन को विस्तारित करने में मदद मिलेगी। इस तरह एसईसीएल अपनी पुरानी और बंद पड़ी खदानों को एमडीओ मोड पर शुरू करने में सफल रही है।

प्रभावित ग्रामवासी

घरघोड़ा से पेलमा तक रेल लाइन बिछाने के लिए 21 गांवों में 600 किसानों की ज़मीनें जाएंगी और 3 हजार की आबादी विस्थापित होगी। इस इलाके में आदिवासियों का निवास है। जिनकी अपनी थोड़ी सी खेती-किसानी है और इनका पूरा जीवनयापन जंगलों पर निर्भर है। ये प्रकृति प्रेमी है और प्रकृति की पूजा करते हैं।

इसकी पहले की सरकार ने जंगल के संरक्षण और संवर्धन के लिए वनाधिकार कानून के तहत आदिवासियों को भू-अधिकार पट्टा प्रदान किया है। ताकि जंगल की देख-रेख हो सके साथ ही पर्यावरण भी संरक्षित रहे। लेकिन अधिकारियों का कहना है कि रिजर्व फॉरेस्ट में किसी भी तरह के ग्रामसभा की जरूरत नहीं होती।

पेलमा निवासी बंशीधर नायक ने बताया कि यहां प्रशासनिक अधिकरियों ने बताया कि यहां जो रेल कॉरिडोर बनेगा वह सिर्फ कोयला परिवहन के लिए बनेगा और जब हम इस क्षेत्र में कोयला खदान चाहते ही नहीं तो रेल कॉरिडोर बनाने का कोई औचित्य नहीं है। हां अगर यह रेल कॉरिडोर लोगों के लिए रहता एक जगह तक एक जगह से दूसरी जगह तक लोगों के आवागमन के लिए होता तो हम बेशक इस पर सहमति प्रदान करते। हम कोयला खदान नहीं चाहते हैं।

पेलमा निवासी बंशीधर रठिया

पहले ही इस क्षेत्र में बहुत ज्यादा प्रदूषण है और प्रदूषण की वजह से तरह-तरह की समस्याएं देखने को मिल रही है, पेड़ पौधों को काट दिया गया है और इस रेल कॉरिडोर से सरकार और प्राइवेट कंपनी को फायदा होगा, हम तो तबाह हो जाएँगे।

इन्हें वनाधिकार पट्टा मिल चुका है लेकिन सरकार यदि बलपूर्वक इन्हें यहाँ से विस्थापित भी करती है तब भी इन्हें न तो कोई भी मुआवजा मिलेगा और न ही पुनर्वास। सैकड़ों वर्षों से इन जमीन में रहते हुए इनकी जड़ यहीं है।

पेलमा में ही रहने वाले चक्रधर राठिया का कहना है कि जहां हम रहते हैं, यह आदिवासी क्षेत्र है और यहां पेसा कानून लागू होता है और इस कानून के तहत जल जंगल और जमीन यह ग्राम सभा के अधीन रहती है लेकिन अधिकारियों का कहना है कि ग्राम सभा से प्रस्ताव की जरूरत नही है क्योंकि यह जमीन वनभूमि है। लेकिन उनको शायद यह नहीं मालूम है कि पिछली सरकार ने हमें वनाधिकार कानून के अंतर्गत इसका पट्टा प्रदान किया है। हम जंगलों पर ही आश्रित हैं।

पहले ही दिन-रात एक कर जंगलों से लगभग 10000 पेड़ों को काटा गया जो हमारे के हमारे क्षेत्र के साथ हमारे लिए भी बहुत बड़ा नुकसान है। चक्रधर राठिया दुखी होकर कहते हैं कि इन पेड़ों के कटने से वन उपज गोंद, महुआ जो जीवन का आधार है समाप्ति पर है। पेड़ों और जंगलों को बर्बाद करने से ग्लोबल वार्मिंग हो रही है प्रदूषण फैल रहा है।

चक्रधर राठिया

इन सभी को देखते हुए हम रेल कॉरिडोर के लिए सहमति नहीं देना चाहते और हम आदिवासी परिवार खासकर के वनों जंगलों पेड़ पौधों और नदी नालों की पूजा करती हैं और हमारा आस्था का यह केंद्र है और इस तरह से हमारे आस्था के केंद्र को तबाह करना सही नहीं है

आए दिन घरघोड़ा से पेलमा की रेल लाइन के लिए प्रभावित होने वाले किसानों की जानकारी एकत्र करने के लिए सर्वे करा यहाँ रहने वाले को परेशान किया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि कानून भी सरकार बनाती है और उसे तोड़ने का काम भी सरकार करती है।

पर्यावरण की दुर्गति

यहाँ चल  रही परियोनाओं और कोयला खनन से पूरे तमनार, घरघोड़ा और रायगढ़ जिले के साथ आसपास के गाँव और जंगल बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं। रेल लाइन बिछाने के चलते जंगलों को पूरी तरह काट दिया जाएगा। ऐसे में यहाँ रहने वाले जीव-जन्तु और जानवर के जीवन पर खतरा मंडरा रहा है।

जंगल पर आश्रित रहने वाले आदिवासियों जीवनयापन के साथ खाद्य शृंखला पूर्ण रूप से प्रभावित होगी। जंगल में मिलने वाली औषधीय पौधों के साथ अनेक पेड़-पौधे कुछ पूरी तरह विलुप्त हो चुके हैं

और कुछ होने की स्थिति में है। कोयला खनन से आसपास के वातावरण में प्रदूषण का प्रभाव साफ दिखाई दे रहा है। नदियों और तालाबों का पानी छूने लायक नहीं रह गया है। दूषित पानी और हवा के सेवन से पेट,  त्व्चा और सांस की बीमारियों से ग्रस्त हैं। घरों में भी कोयले का डस्ट के कारण नंगे पैर नहीं चल सकते, नंगे पैर चलने पर कालिख पैर में चिपक जाती है, जिससे कई तरह की दिक्कतें पैदा हो रही हैं।

आदिवासी हरे-भरे जंगलों में अपने जरूरत की चीज लेने जाते हुए

गाँव वालों का खना है कि किसी भी कीमत में हम यहाँ की ज़मीनें नहीं देंगे भले ही जान ही क्यों न देने पड़े।

घरघोड़ा एसडीएम रमेश मोर, तहसीलदार ऋचा सिंह और रेलवे के कई कर्मचारियों के साथ पेलमा गांव के लोगों के बीच हुई यह बैठक अन्ततः बिना किसी नतीजे के खत्म हो गयी। तकरीबन डेढ़ से 2 घंटे की चर्चा पर कोई रिजल्ट नहीं निकलने से प्रशासनिक अधिकारियों को गांव से वापस लौटना पड़ा इस मीटिंग में गांव के बड़ी संख्या में लोग शामिल थे।

 

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