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शिक्षण संस्थानों में होने वाले भेदभाव की वास्तविकता और सिनेमा

क्या शिक्षण संस्थानों में भेदभाव होता है? क्या जातीय आधार पर अध्यापक अपने विद्यार्थियों से भेदभाव करते हैं? क्या सिनेमा में इस भेदभाव को यथार्थ ढंग से चित्रित किया गया है? क्या सुधारात्मक कानून समाज के विभिन्न वर्गों के बीच दूरी बढ़ा देते हैं? यह बहुत जटिल, बड़ा और वर्तमान का सबसे ज्वलंत सवाल है, क्योंकि इस सवाल को देखने और समझने की दृष्टि प्रायः पूर्वाग्रहों से भरी हुई होती है। सामाजिक स्तरीकरण और सामाजिक विभेदीकरण दुनिया के सभी समाजों में पाया जाता है। जाति, धर्म, लिंग, रंग और वर्गीय आधार पर लोगों के साथ भेदभाव करना, पूर्वाग्रहों और थोपी हुई निर्योग्ताओं पर आधारित व्यवहार करते हुए एक निश्चित आबादी को उसके मूलभूत, मानवाधिकारों और अवसरों से वंचित करना सामाजिक भेदभाव कहलाता है। पढ़िए जाने-माने कवि और सिनेमा के अध्येता राकेश कबीर का विश्लेषण जिसमें उन्होंने शिक्षण परिसरों में घटनेवाली घटनाओं के बहाने सिनेमा में उसके चित्रण पर कई सवाल उठाये हैं। 

आइसा ने शहादत दिवस पर रोहित वेमुला को किया याद, कहा- संविधान की हत्या कर रही है BJP-RSS

दरभंगा। हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के दलित स्कॉलर रोहित वेमुला की शहादत दिवस पर आइसा के तत्वावधान में लोहिया चरण सिंह कॉलेज परिसर में विचार-गोष्ठी...

उच्च शिक्षण संस्थाओं के दलित छात्र आत्महत्या क्यों कर रहे हैं?

हमने दलितों, आदिवासियों को सरकारी नौकरियों, शिक्षण संस्थाओं, संसद, विधानसभाओं में भले ही आरक्षण दे दिया हो परंतु समाज में अभी भी उनके साथ...

बहुजन छात्रों के साथ नाइंसाफी का जिम्मेदार आखिर कौन है

23 जुलाई, 2022 के हिन्दू समाचार पत्र में एक महत्वपूर्ण ख़बर है कि मदुरई के कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद एस वेंकटेशन के एक सवाल...

क्या सभी कट्टरपंथी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे होते हैं?

क्या तालिबान की तुलना आरएसएस से हो सकती है? अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापिसी ने उनके पिछले शासनकाल की यादें ताजा कर दी...

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