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राष्ट्रीय
सवाल से भागता मुखिया, जवाब से कतराती सत्ता
ओस्लो की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उठे सवाल आज पूरे देश के लोकतंत्र का आईना बन गए हैं। एक अकेली विदेशी पत्रकार ने 1.45 अरब लोगों के प्रतिनिधि से पूछा — अभिव्यक्ति की आज़ादी कहाँ है? अल्पसंख्यक क्यों डरे हुए हैं? चुनाव आयोग कितना निष्पक्ष है? जवाब के बजाय खामोशी मिली। ये खामोशी 12 सालों से संसद, सड़क और मीडिया में गूँज रही है। जब 'विश्व लोकतंत्र की जननी' का दावा करने वाला देश सवाल से भागता है, तो 5,000 साल पुरानी सभ्यता भी सिर झुका लेती है। आपातकाल के 21 महीनों को कोसने वाले, बिना घोषणा के 12 साल से प्रेस का गला घोंट रहे हैं। सवाल सिर्फ एक पत्रकार का नहीं - हर उस आवाज़ का है जिसे दबाया जा रहा है। लोकतंत्र पूछ रहा है - डर किसे है?
बिहार के ग्रामीण समाज में लड़कियों के लिए उच्च शिक्षा की चुनौतियां
बिहार में महिला साक्षरता दर में वृद्धि जरूर हुई है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च शिक्षा में लड़कियों की भागीदारी अभी भी सीमित है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, 2015 के आसपास यह प्रतिशत लगभग 10–12 प्रतिशत था, जो धीरे-धीरे बढ़कर 2024-25 तक करीब 18–20 प्रतिशत तक पहुंचा है। हालांकि यह वृद्धि सकारात्मक संकेत देती है, लेकिन राष्ट्रीय औसत की तुलना में यह अभी भी काफी कम है।
सुनाली के ऊपर अत्याचार करनेवाले किस भ्रूण हत्या की बात कर रहे हैं और किन नारियों का वंदन ?
भाजपा ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम को हर रूप में चुनाव जीतने का औज़ार बना लिया। जो अधिनियम तीन साल पहले पारित हो गया था उसे एक बार फिर परिसीमन के लिए संसद में लाया गया। मौजूदा संख्या में भागीदारी न देने की बेईमानी को परिसीमन की आड़ में छुपाने की संघी-भाजपाई मंशा का पर्दाफाश हो गया तब बेहिसाब पैसा खर्च करके प्रधानमंत्री मोदी भ्रूण हत्या का रोना रो रहे हैं। लेकिन सवाल कई और भी हैं। पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले की निवासी तीन महीने की गर्भवती घरेलू सहायिका सुनाली को जबरन बांग्लादेश की सीमा पार कराया गया। बिना किसी अपराध को उसे बांग्लादेश की जेल में रहना पड़ा। वहीं जेल में उसने अपने बच्चे को जन्म दिया। एक जटिल कानूनी लड़ाई के बाद वह अपने देश वापस आ पाई है। मोदी ने महिलाओं की गरीबी, लाचारी और भावनाओं का दोहन किया और उन्हें एकमुश्त वोटर के रूप देखा। आज देश में महिलाओं की दुर्दशा का कोई अंत नहीं। सबसे बड़ी बात कि संसद की मौजूदा स्थिति में महिलाओं को आरक्षण भाजपा देने को ही तैयार नहीं। ऐसे में किस भ्रूण हत्या की बात करके रोना-पीटना चल रहा है इसे समझा जाना चाहिए। जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता और चिंतक डॉ सुरेश खैरनार की खुली चिट्ठी।
उन्नीसवीं सदी में फुले जितना साहसी, त्यागी और निडर नेता दूसरा कोई नहीं हुआ
पिछले कुछ वर्षों से भारत में हिंदुत्ववादी ताकतों के एजेंडे के अनुसार जातिवाद और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को आक्रामक रूप से बढ़ावा दिया गया है। महात्मा जोतीबा फुले का जन्म लगभग आज से 200 वर्ष पूर्व हुआ था और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का जन्म फुले की मृत्यु के एक वर्ष बाद हुआ था। कहने का मतलब कि इनकी जयंती और पुण्यतिथि मनाने के अलावा, वस्तुतः कोई सक्रिय जाति-विरोधी या सांप्रदायिक-विरोधी आंदोलन मौजूद नहीं है। अपने जीवन का तीन-चौथाई से अधिक हिस्सा इन आंदोलनों में सक्रिय रूप से बिताने के बावजूद, मैं 11 और 14 अप्रैल को उनकी जयंती के अवसर पर यह लेख इन दो महान विभूतियों को एक आत्म-निरीक्षणात्मक श्रद्धांजलि के रूप में लिख रहा हूँ।
हिन्दुत्व के खतरनाक दौर में कहाँ खो गया जाति के विनाश का एजेंडा
आज जब हम डॉ. अंबेडकर को याद करते हैं, तो हमें इस बात का भी भान होना चाहिए कि सामाजिक समानता की ओर बढ़ने की प्रक्रिया में आने वाला - चाहे वह प्रत्यक्ष हो या सूक्ष्म - अधिकांश विरोध, RSS जैसी गहरी पैठ रखने वाली संस्था की ओर से आता है। RSS विभिन्न माध्यमों से अपने प्रतिगामी (पिछड़ेपन वाले) एजेंडे का प्रसार कर रहा है। जहाँ एक ओर RSS का मुस्लिम-विरोधी एजेंडा बिल्कुल स्पष्ट और सबके सामने है, वहीं उसका दलित-विरोधी एजेंडा कहीं अधिक सूक्ष्म है; और 'जाति-विहीन समाज' के सपने को साकार करने के लिए इस सूक्ष्म एजेंडे का मुकाबला करना बेहद ज़रूरी है।

