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रायगढ़ का आशा प्रशामक देखभाल गृह : संसाधनों की कमी है जज़्बे की नहीं

रायगढ़ शहर में रिहैब फाउंडेशन द्वारा संचालित आशा प्रशामक देखभाल गृह में इस समय साठ से अधिक बुजुर्ग स्त्री-पुरुष और मानसिक रोगी हैं। इनमें से कई पूरी तरह ठीक हो चुके हैं लेकिन उनके घरवाले उन्हें वापस ले जाने को तैयार नहीं है। ऐसे में बिना किसी सरकारी सहायता से केवल जनसहयोग के भरोसे चलनेवाले इस प्रशामक गृह पर आर्थिक दुश्वारियाँ लगातार बढ़ रही हैं। इसकी संचालिका जस्सी फिलिप स्वयं बचपन में पोलियो का शिकार हो गई थीं लेकिन अपने जीवट से उन्होंने न केवल अपनी शिक्षा पूरी की बल्कि यह सेवा केंद्र शुरू किया। उनका जीवन एक प्रेरणादायी यात्रा है। इस संस्था के बहाने छत्तीसगढ़ में वृद्धाश्रमों पर पढ़िये अपर्णा की यह रिपोर्ट।



आशा प्रशामक देखभाल गृह के बाहर बरामदे में मिली 45 वर्षीय भगवती साहू मानसिक बीमारी के चलते पिछले ढाई वर्ष से इस आश्रम में रह रही हैं। कद-काठी में ठीकठाक, लेकिन आँखों में निराशा और उदासी। बातचीत में उन्होंने बताया कि, ’पति ने शादी के तेरह वर्ष बाद छोड़ दिया। मायके में रह रही थी लेकिन मानसिक बीमारी के कारण भाई ने यहाँ छोड़ दिया। इन ढाई वर्षों में केवल एक बार ही बेटा मिलने आया। ‘घर वापस ले चलो’ कहने पर बोला कि ‘जल्दी ले जाऊंगा।‘ इंतजार कर रही हूँ कि वह जल्दी समय कब आएगा?‘

रायगढ़ के बांझिनपाली गाँव के इस आशा प्रशामक देखभाल गृह में वृद्ध महिला-पुरुषों के अलावा मानसिक रूप से बीमार लोग भी रहते हैं। इस आश्रम में लगभग 60 बुजुर्ग हैं, जिनमें स्त्री-पुरुष दोनों हैं। इस आश्रम के दो कमरों बीमारों की चिकित्सीय देखभाल के लिए 4 बेड का वार्ड भी बनाया गया है।

इतनी बड़ी संख्या में लोगों की देखभाल करने और संभालने का काम एक बड़ी टीम और खर्चे का है, लेकिन इसे चलाने के लिए सरकार से किसी भी तरह का फंड नहीं मिलता है। इस आश्रम की संचालिका जस्सी फिलिप बताती हैं कि जन सहयोग मिलता है फिर भी कठिनाई से चल रहा है।

थोड़ा अंदर पहुँचने पर खाने का इंतजार करती पिंकी मिलीं। मानसिक रूप से अस्वस्थ पिंकी अब पूरी तरह से ठीक हो चुकी हैं। ढाई वर्ष से इस आश्रम में रह रही पिंकी ने बताया कि ‘रायगढ़ के सिन्धी कॉलोनी में परिवार के सभी लोग रहते हैं। इन ढाई वर्षों में हर बार केवल माँ ही मिलने आईं। मैं घर जाना चाहती हूँ, लेकिन वे लोग मुझे नहीं ले जाते।‘

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कुछ वृद्ध और कुछ मानसिक रोग से स्वस्थ्य हुईं महिलायें घर जाने के इंतजार में

इसी तरह 72 वर्षीय विधवा मंजू दास जो इसके पहले सारंगढ़ वृद्धाश्रम में थीं। बिल्कुल स्वस्थ और व्यावहारिक लेकिन बहू ने साथ नहीं रखा तो बेटे ने वृद्धाश्रम में छोड़ दिया। पति के रहते हुए कभी उन्हें आर्थिक परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ा। अभी भी वे चाहती हैं कि कहीं हॉस्टल या घरों में खाना पकाने की नौकरी मिल जाए तो यहाँ से निकलकर सम्मानजनक तरीके से जीवन बसर कर सकूँ।

इस आश्रम में सभी लोग अपनी-अपनी दिनचर्या में व्यस्त थे। असल में यह अति गंभीर बीमारियों से ग्रसित वरिष्ठजनों का देखभाल गृह है। इस आश्रम में केवल बीमार और घर से त्यागे गए वृद्ध ही नहीं हैं, बल्कि मानसिक रूप से बीमार वृद्ध, प्रौढ़ और युवा महिलायें भी रहती हैं।

ऐसे अनेक रोगी हैं जो मानसिक बीमारी के साथ यहाँ भर्ती हुये थे लेकिन ठीक होने के बाद भी घरवाले उन्हें ले जाने को तैयार नहीं हैं। वे यहीं रहकर आश्रम के कामों को करती हैं। फिर भी इन सबको संभालना बहुत कठिन और खर्चीला है।  इसका संचालन रिहैब फाउंडेशन की संचालिका जस्सी फिलिप करती हैं।

आसान नहीं है वृद्धाश्रम चलाना

जस्सी बताती हैं कि ‘आश्रम का भवन किराये पर लिया है, किरायेदार भवन से लगे हुए घर में रहते हैं। किराया हर महीने कुछ लोगों के सहयोग से दिया जाता है लेकिन बिजली और पानी का कनेक्शन जब-तब काट देते हैं। ऐसे में फिर से व्यवस्था करवाना कठिन होता है।’ आश्रम चलाना मतलब एक भरी-पूरी गृहस्थी चलाना। आश्रम के ऑफिस के पास रोज के मेनू और बुजुर्गों की बीमारों सहित संख्या का बोर्ड लगा हुआ है।

आश्रम के मेनू बोर्ड पर रोजाना का मेनू लिखा हुआ था। यहाँ त्योहार या किसी विशेष दिन लोग राशन, सब्जियाँ देने और खाना खिलाने आते हैं। साथ ही बहुत से लोग रोजमर्रा के उपयोग का सामान भी देते हैं। जस्सी बताती हैं कि इससे आश्रम चलाने में बहुत मदद हो जाती है। एक दिन की समस्या का हल तो निकल जाता है लेकिन ऐसा बहुत दिनों तक नहीं चल सकता। सबसे ज्यादा चिंता दोनों वक्त के खाने की होती है और उसके बाद दवा और रोजमर्रा की जरूरतों की। फिलहाल सरकारी सहयता के लिए प्रयासरत हैं।

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रोज के खाने का मेनू और वृद्धों की संख्या

बात करते हुए जस्सी कहती हैं, ‘लोग मानसिक रूप से बीमार लोगों को यहाँ छोड़ देते हैं कि ठीक होने पर ले जाएंगे, लेकिन उनके स्वस्थ होने के बाद भी परिवार के लोग कभी वापस नहीं ले जाते हैं। इस वजह से आश्रम में रहने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है, जो मुझे चिंतित करती है।‘

जस्सी बताती हैं कि ‘इस वृद्धाश्रम  को चलाने के लिए किसी भी तरह का अनुदान सरकार से नहीं मिलता, जिस वजह से अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।’

छत्तीसगह शासन द्वारा वृद्धाश्रमों के लिए कोई निश्चित ‘अनुदान’ राशि नहीं है जो सीधे संस्थाओं को मिले, बल्कि वृद्धों को (लाभार्थियों को) मासिक पेंशन और वृद्धाश्रमों में निःशुल्क सुविधाएँ दी जाती है। ताकि वे अपना भरण-पोषण स्वयं कर सकें। राज्य सरकार द्वारा संचालित आश्रम में वृद्धों को भोजन, वस्त्र, चिकित्सा और आवास जैसी सुविधाएँ निःशुल्क होती हैं। पारिवारिक आश्रय मिलने पर किसी वृद्ध को पेंशन की जरूरत उतनी महसूस नहीं होती लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर और अकेले रह रहे वृद्धों को पेंशन मिलना उन्हें एक आधार देता है।

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आशा प्रशामक देखभाल गृह के एक दृश्य

गौरतलब है कि वृद्धा पेंशन योजना के अंतर्गत 60 से 79 वर्ष के वृद्धों को 500 रुपये प्रतिमाह (केन्द्र का अंशदान 200/-व राज्य का अंशदान 300/-) और 80 या उससे अधिक उम्र के वृद्धों को 650 रुपये (केन्द्र का अंशदान 500/-व राज्य का अंशदान 150/-) मिलती है। लेकिन जिन लोगों के वररिधा पेंशन कार्ड बने हुए हैं उन्हें ही मिलती है। साथ ही यह पेंशन नियमित उनके खातों में नहीं आती। इससे एक बात समझ सकते हैं कि इस पेंशन पर आश्रित लोगों को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता होगा।

छत्तीसगढ़ में वृद्धाश्रमों की स्थिति

छतीसगढ़ शासन की योजना के अंतर्गत छतीसगढ़ शासन के समाज कल्याण मंत्रालय द्वारा वृद्धों के लिए वर्ष 2016 में 6 जिलों – रायपुर, दुर्ग, कबीरधाम, रायगढ़, बालोद और बेमेतरा में प्रशामक देखभाल गृहों की स्थापना की गई, जिनमें वृद्धों के अलावा गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों की देखभाल का सुविधा थी। रायगढ़ में सरकार द्वारा स्थापित वृद्ध प्रशामक देखभाल गृह कागजों पर स्थापित है।

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ शहर में दो वृद्धाश्रम है। पहला गजमार पहाड़ी के नीचे वृद्धाश्रम के नाम से है, जहां घर से छोड़े गए, अकेले रह गए और कुष्ठ रोग से पीड़ित वृद्ध रहते हैं। यह आश्रम छग के समाज कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत संचालित होता है। दूसरा आश्रम जस्सी फिलिप का रिहैब फाउंडेशन के अंतर्गत संचालित है। यहाँ लगभग 60 बुजुर्ग और मानसिक रोगी रहते हैं।

बुजुर्गो की सेवा करती जससी फिलिप

फिलहाल के आँकड़ें हासिल नहीं है लेकिन वर्ष 2016 की एक रिपोर्ट के अनुसार आर्थिक रुप से आत्मनिर्भरता के मामले में छत्तीसगढ़ राज्य के ग्रामीण बुजुर्गों का स्थान देश में चौथे स्थान पर रहा है। प्रति हजार में 638 बुजुर्ग आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं। यह सम्पन्न राज्यों से कहीं ज्यादा है।

अन्तराष्ट्रीय वृद्ध दिवस 1 अक्टूबर, 2025 को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव से ने ‘सियान गुड़ी’ के निर्माण की घोषणा की है, जो वृद्धजनों के लिए एक अत्याधुनिक वृद्धाश्रम और एकीकृत सुविधा केंद्र होगा। यह परियोजना प्रदेश के चार बड़े शहरों – रायपुर, बिलासपुर, कोरबा और दुर्ग में पीपीपी (सार्वजनिक-निजी-भागीदारी) मॉडल पर बनाई जाएगी। इस घोषणा का उद्देश्य वृद्धजनों की देखभाल करना और उन्हें एक सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन प्रदान करना है। सवाल यह उठता है कि नए वृद्धाश्रमों का निर्माण तो किया जाएगा लेकिन पुराने चल वृद्धाश्रमों को कैसे संवारा जाए इस पर कोई घोषणा क्यों नहीं की गई।

देश भर में वर्ष 2016 में 500 वृद्धाश्रम थे और वर्ष 2022 में बढ़कर 771 वृद्धाश्रम हो गए। इन 8 वर्षों में 271 वृद्धाश्रम बढ़ना, बताता है कि वृद्धों की वृद्धाश्रम भेजने की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। इन 771 में से लगभग 500 वृद्धाश्रम पंजीकृत एवं सरकारी सहायता प्राप्त हैं। बाकी वृद्धाश्रम दान की मदद से चलाए जा रहे हैं।

एक रिपोर्ट के अनुसार पूरे देश में 1150 वृद्धाश्रमों में लगभग 97 हजार वृद्ध में रहते हैं।  राज्यवार देखें तो केरल में सबसे अधिक 124 वृद्धाश्रम हैं। इसके बाद आते हैं पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, कर्नाटक और  महाराष्ट्र। इन राज्यों में भी अच्छे-खासे वृद्धाश्रम हैं।

आज जब संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। एकल परिवारों का चलन बढ़ा है। परिवार के लोग बुजुर्ग माता-पिता की जिम्मेदारी उठाने से बच रहे हैं। ऐसे में वृद्धाश्रम एक विकल्प होता है। पिछले दस वर्षों में वृद्धों को आश्रमों में भेजने की संख्या में लगातार वृद्धि हुई है।

यूएनएफपीए अर्थात संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (United Nations Population Fund) से जुड़ी इंडिया एजिंग रिपोर्ट 2023 के अनुसार वर्ष 2021 में 60+ आयु के बुजुर्गों की जनसंख्या 10.5%(14.9करोड़) थी। अगले दो दशक अर्थात 2050 में 20.8% (34.7 करोड़) हो जाने का अनुमान है। प्रत्येक पाँच व्यक्तियों में एक वृद्ध है। इसका इसका प्रभाव स्वास्थ्य, समाज और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

आश्रम में काम के लिए सहयोगी होने के बाद भी जस्सी हर संभव काम खुद ही करना चाहती हैं

वृद्धों की जनसंख्या बढ़ने का कारण रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ने के साथ जीवन प्रत्याशा में भी वृद्धि हुई है, जो पुरुषों के लिए 71 वर्ष और महिलाओं के लिए 74 वर्ष हो चुकी है। बुजुर्गों की जनसंख्या में वृद्धि का कारण मृत्यु दर में कमी और साथ ही प्रजनन दर में गिरावट भी एक प्रमुख कारक है।

देश में वृद्ध पुरुषों की अपेक्षा वृद्ध महिलायें अधिक हैं। एक बात ध्यान देनी होगी कि कार्यबल में महिलाओं का प्रतिशत कम है। इस वजह से वृद्ध महिलाओं की आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा चुनौती बनी हुई है। पूरे देश में दक्षिण भारत में बुजुर्गों की संख्या अधिक है। बुजुर्गों का 2/5वाँ हिस्सा गरीबी में जीवन जी रहा है। पंजाब में 5% और छतीसगढ़ में 47% बुजुर्ग गरीब हैं। 18.7% बुजुर्गों के पास आय का कोई साधन नहीं है।

सरकार द्वारा वृद्ध व्यक्तियों के लिए वरिष्ठ जन का भरण-पोषण और कल्याण नागरिक अधिनियम 2007 लाया गया था, यह अधिनियम  माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण को सुनिश्चित करता है। यह बच्चों और रिश्तेदारों के लिए अपने माता-पिता की देखभाल को एक कानूनी दायित्व बनाता है।

जस्सी फिलिप की प्रेरणादायक कहानी 

रायगढ़ में पैदा हुईं जस्सी फिलिप ने परिवार से त्यागे गए और लावारिस बुजुर्गों के लिए वर्ष 2018 में वृद्धाश्रम की स्थापना की थी। वृद्धों की देखरेख करते हुए इनके पास कुछ परिवार ऐसे आए, जिनके सदस्य मानसिक रूप से बीमार थे। पहले इन्होंने मना कर दिया लेकिन परिवार वालों की मजबूरी और दबाव के चलते इन्होंने मानसिक रोगियों की देखभाल और इलाज करवाने का जिम्मा उठाया। यह काम वह पिछले 8 वर्षों से कर रही हैं।

जस्सी के माता-पिता दोनों सरकारी सेवा में थे। इनके तीन भाई हैं। ढाई वर्ष की अवस्था में पोलियो हो जाने के बाद उनके जीवन में काफी संघर्ष रहा। बहुत इलाज के बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ। माँ सरकारी अस्पताल में नर्स थीं। जस्सी ने बताया कि ‘माँ ही थीं जिन्होंने बिना किसी दिक्कत के मुझे गोद में लेकर स्कूल छोड़ने और छुट्टी के बाद ले आने का काम बिना नागा किया। लेकिन अस्पताल की ड्यूटी और घर की जिम्मेदारियों को निभाते हुए थकान की वजह से मुझ पर माँ गुस्सा जरूर हो जाती थीं कि मेरा पूरा काम करना पड़ता है।‘

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आश्रम की वृद्ध महिला से बातचीत करते हुए जस्सी

शायद यही एक कारण था कि मैंने पढ़ने और दूसरे काम सीखने में हमेशा मन लगाया और आगे रही। छठवीं-सातवीं में थोड़ी समझदारी आने के बाद घसीटते हुए ही घर के सारे काम करने लगी ताकि माँ ड्यूटी से लौटे तो घर पर उन्हें काम न करना पड़े और कोई मुझे बोझ न समझे। हालांकि माँ जब अन्य सामान्य लड़कियों को देखती थीं तब जरूर कभी-कभी कोई बात ऐसी कह देती थीं कि मुझे बहुत कष्ट होता था।

कक्षा ग्यारह के बाद माँ ने यह कहते हुए जस्सी की पढ़ाई छुड़वा दी कि पढ़कर क्या करोगी? जस्सी बताती हैं कि वह पढ़ने में बहुत अच्छी थीं। एक साल ही घर पर रहीं। घर पर जब सहेलियाँ मिलने आतीं, तो उन्हें आगे बढ़ते देख मन में न पढ़ पाने की कसक होती। कई बार माँ से कहा लेकिन माँ ने जैसे न पढ़ाने की ठान ली थी। तब जस्सी ने कॉलेज में दाखिले के लिए जिद करते हुए भूख हड़ताल कर दी। अंतत: माँ को झुकना पड़ा और शासकीय कन्या महाविद्यालय में बीए में दाखिला कराया गया। उसके बाद जस्सी ने अर्थशास्त्र में एमए और गुरु घासीदास विवि से एमफिल किया।

एमफिल करने के दौरान लघुशोध लिखते समय एकीकृत बाल विकास परियोजना का समीक्षात्मक अध्ययन विषय लिया, जिसके लिए इन्हें फील्ड पर जाना पड़ता था। तभी इन्होंने घरेलू हिंसा और बच्चों की स्थिति को लेकर काम करने का मन बना लिया था। पढ़ाई के बाद अनेक सरकारी नौकरी मिली, लेकिन समाज सेवा के जुनून के कारण कहीं नौकरी नहीं कीं। इसी दौरान ओपन यूनिवर्सिटी से एमएसडब्ल्यू की डिग्री हासिल की।

सन1996 में थॉमस फिलिप से शादी हुई। शुरुआत के कुछ साल दाल-रोटी के लिए अपना काम किया। पति थॉमस फिलिप की रुचि भी समाज सेवा के क्षेत्र में थी। अपने काम के बाद बचे समय में दोनों समाज के वंचित समूह के लिए काम करते थे। तब इनकी कोई संस्था नहीं थी।

जस्सी फिलिप (बैठी हुईं)

वर्ष 2012 में जस्सी ने रायगढ़ में तीन वर्ष के लिए बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) के अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली।

2018 में एक एनजीओ रिहैब फाउंडेशन का रजिस्ट्रेशन करवाया और छत्तीसगढ़ सरकार के समाज कल्याण विभाग द्वारा इनके आशा प्रशामक देखभाल गृह को मान्यता मिली। अभी इस केंद्र में 60 बुजुर्ग महिला-पुरुष रह रहे हैं, जिनमें कुछ मानसिक रोगी भी हैं, जिनका इलाज लगातार चल रहा है। इनमें से कुछ बिल्कुल स्वस्थ्य हो चुके हैं लेकिन घर वाले ले जाने को तैयार नहीं हैं।

वे लोग आश्रम के कामों में सहयोग कर सेवाएं दे रहे हैं। लेकिन इस तरह संख्या बढ़ने से जगह और बाकी व्यवस्थाओं को पूरा करने में परेशानी का सामना करना पड़ता है। जस्सी कहती हैं कि ‘इन्हीं सब स्थितियों के कारण कभी-कभी हताश होती हूँ लेकिन अपने ऊपर आश्रित लोगों के चेहरे देखने के बाद एक ताकत और ऊर्जा का एहसास होता है और रास्ते खुलते जाते हैं और मैं अपने काम में दुगुनी गति से आगे बढ़ती हूँ।’

शायद कुछ समय और भी जस्सी को सरकारी मदन के लिए इंतज़ार करना पड़े लेकिन उनके जज़्बे में ज़रा भी कमी नहीं दिखती।

अपर्णा
अपर्णा
अपर्णा गाँव के लोग की संस्थापक और कार्यकारी संपादक हैं।

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