Monday, March 16, 2026
Monday, March 16, 2026




Basic Horizontal Scrolling



पूर्वांचल का चेहरा - पूर्वांचल की आवाज़

सिनेमा

शिक्षण संस्थानों में होने वाले भेदभाव की वास्तविकता और सिनेमा

क्या शिक्षण संस्थानों में भेदभाव होता है? क्या जातीय आधार पर अध्यापक अपने विद्यार्थियों से भेदभाव करते हैं? क्या सिनेमा में इस भेदभाव को यथार्थ ढंग से चित्रित किया गया है? क्या सुधारात्मक कानून समाज के विभिन्न वर्गों के बीच दूरी बढ़ा देते हैं? यह बहुत जटिल, बड़ा और वर्तमान का सबसे ज्वलंत सवाल है, क्योंकि इस सवाल को देखने और समझने की दृष्टि प्रायः पूर्वाग्रहों से भरी हुई होती है। सामाजिक स्तरीकरण और सामाजिक विभेदीकरण दुनिया के सभी समाजों में पाया जाता है। जाति, धर्म, लिंग, रंग और वर्गीय आधार पर लोगों के साथ भेदभाव करना, पूर्वाग्रहों और थोपी हुई निर्योग्ताओं पर आधारित व्यवहार करते हुए एक निश्चित आबादी को उसके मूलभूत, मानवाधिकारों और अवसरों से वंचित करना सामाजिक भेदभाव कहलाता है। पढ़िए जाने-माने कवि और सिनेमा के अध्येता राकेश कबीर का विश्लेषण जिसमें उन्होंने शिक्षण परिसरों में घटनेवाली घटनाओं के बहाने सिनेमा में उसके चित्रण पर कई सवाल उठाये हैं। 

सिनेमा में ग्रीनलैंड : असाधारण जीवट की कहानियों पर ट्रम्प की लोलुपता की बढ़ती छाया

अमेरिका खुद को विश्व व्यवस्था में लोकतंत्र और शांति-व्यवस्था का संरक्षक मानता है जबकि वास्तविकता इसके उलट है। नब्बे के दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनिया से दो ध्रुवीय व्यवस्था समाप्त हो गई और अमेरिका सबसे बड़ी शक्ति के रूप में उभरा और वहीं से उसकी दादागिरी और बढ़ गयी। अमेरिका और यूरोप के विकसित देशों ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं को अपनाकर एक खुली हुई विश्व व्यवस्था की वकालत की ताकि पूंजी और श्रम का बेरोकटोक प्रवाह हो सके। इस कार्य में विश्व व्यापार संगठन, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। खुली विश्व व्यवस्था का लाभ उठाकर चीन, अमेरिका और कई यूरोपीय देशों ने नव साम्राज्यवाद को बढ़ावा दिया। विकासशील और गरीब देशों के संसाधनों की लूट बढ़ गयी। जिन देशों ने इस लूट में सहयोग नहीं दिया उनके ऊपर वामपंथ, तानाशाही, परमाणु हथियार बनाने का आरोप मढ़कर, प्रायोजित विद्रोह कराकर वहां की शासन व्यवस्था को अस्थिर कर दिया गया। कमजोर और अमेरिकापरस्त लोगों के हाथ में सत्ता देकर अप्रत्यक्ष रूप से अपनी दादागिरी थोप दी गयी। अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, लेबनान, फिलिस्तीन, बांग्लादेश सभी इसके शिकार हो चुके हैं। फिल्म ‘अगेंस्ट द आइस’ दो बहादुर खोजी यात्रियों द्वारा अपने निजी अनुभवों पर लिखी गयी किताब पर आधारित फिल्म थी जिसने ग्रीनलैंड को अमेरका की विस्तारवादी नीति से बचाया था लेकिन एक शताब्दी बाद अमेरिका जैसे साम्राज्यवादी देश यह समझने को तैयार नहीं कि देश जमीन पर बना नक्शा नहीं होता। उसमें लोग भी रहते हैं जो अपने देश और लोगों से प्यार करते हैं और किसी बाहरी देश का कब्ज़ा या हस्तक्षेप नहीं चाहते। सबसे रार ठानकर अमेरिका अकेले नहीं रह सकता। उसके राष्ट्रपति को नहीं पता लेकिन वहां की जनता को पता है, इसलिए यूनाइटेड स्टेट के नागरिक अपने राष्ट्रपति के फैसलों के खिलाफ मुखर विरोध भी कर रहे हैं। पढ़िये ग्रीनलैंड के सिनेमा के बहाने साम्राज्यवाद के गहराते संकट पर राकेश कबीर का लेख।

अभिनेता धर्मेन्द्र के प्रयाण पर उनकी फिल्मों पर कुछ बातें

वरिष्ठ कथाकार ज्ञान चतुर्वेदी का उपन्यास बारामासी एक परिवार के बहाने समय के बदलने की भी एक कहानी कहता है। उपन्यास के अंतिम दृश्य में गुच्चन के बेटे के कमरे का दृश्य है जिसमें धर्मेंद्र का एक पोस्टर लगाए लगा हुआ है। वह उस पोस्टर को उखाड़कर फेंक देता है और उसकी जगह एंग्री यंगमैन अमिताभ बच्चन का पोस्टर लगाता है। यह समाज के बदलते ट्रेंड का रूपक है। अब नायकों के चरित्र में व्यवस्था और उसकी संरचना के खिलाफ एक गुस्सा जरूरी है ताकि नई पीढ़ी का मानस उसके साथ तादात्म्य बैठा सके और अपने कर्मों को जायज़ बना सके। धर्मेंद्र ने सत्तर के दशक के आदर्शवादी युवाओं के चरित्र को साकार किया जिसे हम नमक का दारोगा कह सकते हैं लेकिन बदलती अर्थव्यवस्था और सत्ता तंत्र ने अलोपीदीनों की दुनिया में नमक के दरोगाओं को पचा लिया और हर तरह के षडयंत्रों में महारत हासिल कर लिया है जिनसे लड़ने का माद्दा केवल एंग्री यंगमैन में है। ज़ाहिर है समाज और सिनेमा की अन्योन्यश्रित चेतना में धर्मेंद्र की प्रासंगिकता खत्म हो गई थी। पढ़िये अभिनेता धर्मेंद्र को श्रद्धांजलि देते हुये कवि और सिनेमा के अध्येता राकेश कबीर का यह लेख।

मनोज कुमार : किसानी, देशभक्ति और भारतीय संस्कृति के जटिल प्रश्नों पर पॉपुलर सिनेमा के कर्णधार

हिन्दी सिनेमा में साठ और सत्तर के दशक में खेती और किसानी के बढ़ते संकटों, बेरोजगारी की विकराल होती समस्या, जमाखोरी, भ्रष्टाचार, महिलाओं की असुरक्षा और भारतीय समाज में आ रहे अन्य अनेक बदलाओं को मनोज कुमार ने अपनी फिल्मों में बहुत बारीकी से चित्रित किया। इस तरह मुख्यधारा के हिन्दी सिनेमा में उन्होंने उन विषयों को अपने स्तर पर बरतने का प्रयास किया जो लगभग पीछे छोड़ दिये जा रहे थे। एक अभिनेता और निर्देशक के रूप में मनोज कुमार ने एक लंबी पारी खेली और अनेक सफल और उल्लेखनीय फिल्में दी। हिन्दी सिनेमा में उनकी एक अलग पहचान है। उन्होंने भारतीय सामाजिक संरचना में बेशक बहुत से सामाजिक और सांस्कृतिक रिश्तों को स्थूल रूप में देखा और चित्रित किया हो लेकिन भारतीय समाज को उन्होंने उसकी बुनियादी उत्पादकता के आधार पर देखा। खासतौर से कृषि समाजों के ऊपर बढ़ते दबावों के मद्देनज़र उनकी फिल्मों को नए सिरे से विश्लेषित किए जाने की जरूरत है। 4 अप्रैल को 87 वर्ष की अवस्था में उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा। इस मौके पर उन्हें याद कर रहे हैं जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक विद्याभूषण रावत।

सिनेमा : पर्दे से ज्यादा भयावह है वेश्यावृत्ति की वास्तविक दुनिया 

सन 2011 में प्रकाशित (Foundation Scalles) की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में सेक्स वर्कर्स की कुल संख्या 42 मिलियन है जो मुख्य रूप से सेंट्रल एशिया, मध्य पूर्व और अफ्रीका में पायी जाती है। इंटरनेशनल यूनियन ऑफ़ सेक्स वर्कर्स की वेबसाइट के अनुसार ‘विश्व में सेक्स वर्कर्स सर्वाधिक संख्या अमेरिका, चीन, आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, तुर्की, रूस, नाइजीरिया, जर्मनी और भारत में पायी जाती है। वर्तमान में पूरी दुनिया में 52 मिलियन सेक्स वर्कर्स हैं जिनमें 41.6 मिलियन महिलायें और 10.4 मिलियन पुरुष हैं। ‘दुनिया के कई देश हैं जहाँ वेश्यावृत्ति को क़ानूनी वैधता मिली हुई है और वे सेक्स टूरिज्म के बड़े केंद्र माने जाते हैं। उन देशों की अर्थव्यवस्था में वेश्यावृत्ति का बहुत बड़ा योगदान है। इनमें न्यूजीलैंड, आस्ट्रिया, बांग्लादेश, बेल्जियम, ब्राज़ील, कनाडा, कोलम्बिया, डेनमार्क, जर्मनी, ग्रीस, नीदरलैंड, स्विटज़रलैंड, मेक्सिको, वेनेजुएला, सियरा लिओन, बोलीविया, पेरू और अन्य कई देश प्रमुख हैं’ (भट्टाचार्या, रोहित 2024)। जिन स्थानों पर वेश्यावृत्ति का धंधा होता है उन्हें कोठा, चकला, वेश्यालय, रेड लाइट एरिया, ब्रॉथेल्स आदि नामों से जाना जाता है। आज के इनफार्मेशन और कम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी के युग में तमाम वेबसाइट/पोर्टल उपलब्ध हैं जो सेक्स वर्कर्स के बारे में सूचनाएं उपलब्ध कराते हैं। पोर्नोग्राफी वेबसाइट्स, कॉलगर्ल, पॉर्न स्टार्स, जिगोलो जैसे नाम और व्यवसाय आज की वैश्वीकृत दुनिया में जाने जाते हैं। अंतर-धार्मिक घृणा के तहत किए गए हमले और औरतों को बंधक बनाकर जबरदस्ती यौन हिंसा का शिकार बनाने की घटनाएँ दुनिया के कई क्षेत्रों में बढती जा रही हैं। सीरिया, लेबनान, जॉर्डन, अफगानिस्तान और इराक ऐसी हिंसा से सर्वाधिक प्रभावित हैं जहाँ महिलाओं को वेश्यावृत्ति करने को मजबूर किया जाता है। पढ़िये जाने-माने कवि-कथाकार राकेश कबीर का विचारोत्तेजक आलेख।  

सिनेमा किस तरह उठा रहा है युवाओं के मुद्दे

श्रीलंका(2022) और बांग्लादेश (2024) में जब बात हद से आगे बढ़ी और निजाम अपनी जनता से दूर होकर तानाशाही को अपनाने लगा तो युवाओं ने उन्हें सत्ता से उखाड़कर फेंक दिया। हर देश के हुक्मरानों को युवाओं के मुद्दों को विशेष संवेदनशीलता से निस्तारित करना चाहिए अन्यथा जिस ओर जवानी चलती है उस ओर जमाना चल पड़ता है और कोई भी सत्ता उन्हें रोक नहीं सकती। बॉलीवुड की अनेक फिल्मों में युवाओं को समाज और राजनीति के तंत्र के विरोध में लड़ते दिखाया गया है।

सिनेमा का सांप मनोरंजन और मुनाफे के लिए फुफकारता है

बॉलीवुड ही नहीं हॉलीवुड फिल्मों में भी सांपों का प्रस्तुतिकरण पसंदीदा विषय रहा है। गाँव से लेकर शहर तक सांप हर जगह मौजूद भी हैं और उनसे जुड़ी तमाम कहानियां और मान्यताएं लोक में व्याप्त हैं। सिनेमा में इन साँपों को इतना चमत्कारिक दिखाया जाता है कि आम जनता इसे सच मानटी है। नागमणि, इच्छाधारी नाग ये ऐसे विषय है जिन पर हमारे देश में सैकड़ों फिल्मे और टीवी सीरियल बने। कहा जा सकता है कि साँपों से सामना करती जिंदगी डर रोमांच, मनोरंजन, किस्से कहानियों को रोज ही कहती-सुनती और बुनती रहती है।

कैंपस आधारित बॉलीवुड सिनेमा : छात्रों की समस्याओं और मुद्दों से कोई मतलब नहीं

भारतीय सिनेमा में समाज से उठाए गए विषयों पर अनेक बेहतरीन फिल्में बनी हैं, जो आज भी यादगार हैं। लेकिन रुपहले परदे पर शिक्षा संस्थानों को लेकर कुछ फिल्में निराशा पैदा करती हैं। फिल्म बनाने वाले समाज की वास्तविकता को दरकिनार कर फिल्म हिट करवाने के उद्देश्य से ही सिनेमा बनाते हैं, जिसमें फूहड़ हंसी-मजाक, प्रेम और उथली राजनीति दिखाते है। आज भले ही शिक्षा के स्तर में बदलाव हो चुका है लेकिन इसके बाद भी समाज में साहित्य और सिनेमा की प्रस्तुति ऐसे हो, जिसका सकारात्मक प्रभाव पड़े। सिनेमा में दिखाए गए शिक्षण संस्थानों के बहाने आज की शिक्षा व्यवस्था पर उठाए गए सवाल पर पढ़िए डॉ राकेश कबीर का यह लेख ।

सिनेमा : ‘प्यासा’ से ‘राॅक स्टार’ तक स्वतंत्र लेखकों और कलाकारों का वजूद

गुरूदत्त साहब ने अपनी फिल्म प्यासा से उठाया था वे आज भी अनुत्तरित हैं। रचनाकारों, मसिजीवियों को छले जाने के काम सरे बाजार हो रहा है।

सिनेमा ने युद्ध को मनोरंजन का माध्यम बनाया तो महिलाओं की दुर्दशा और जीवटता को भी दिखाया

सिनेमा बनाने वाले सिनेमा के विषय समाज से उठाते हैं भले ही उसका ट्रीटमेंट वे कैसे भी करें। बॉलीवुड हो या हॉलीवुड इधर युद्ध आधारित सिनेमा का चलन बढ़ा है। यह जरूर है कि विदेशी फिल्मों में भारत जैसे देशभक्ति का बखान नहीं दिखाया जाता। इधर महिला सैनिकों के जुनून पर भी अनेक फिल्में बनी। पढ़िये डॉ राकेश कबीर का यह आलेख

सिनेमा में लड़ती हुई औरत केवल देह नहीं रही है

दुनिया के हर हिस्से में पुरुषों द्वारा स्त्रियॉं का शोषण किया जाता है, उनका उत्पीड़न किया जाता है। वे केवल स्त्री को उपभोग की एक देह के अलावा कुछ नहीं समझते। पितृसत्ता समाज में अधिकतर पुरुष दंभ का शिकार होते हुए संवेदनहीन होते हैं। समाज की यही सच्चाई दुनिया भर के सिनेमा में सामने आई है, जिसमें स्त्रियॉं उनसे मुक़ाबला करते हुए जीत हासिल की हैं।
Bollywood Lifestyle and Entertainment