Friday, February 13, 2026
Friday, February 13, 2026




Basic Horizontal Scrolling



पूर्वांचल का चेहरा - पूर्वांचल की आवाज़

होमसामाजिक न्याय

सामाजिक न्याय

यूजीसी एक्ट के खिलाफ क्यों अपनी कुंठा और विद्वेष लहरा रहे हैं भारतीय सवर्ण?

यदि यह जानने का प्रयास हो कि मानव जाति के हजारों साल के इतिहास में इस धरती पर ऐसा कौन सा समाज मौजूद रहा है ,जिसमें अपने ही धर्म के बहुसंख्य लोगों को आथिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक शक्ति के सभी स्रोतों में रत्ती भर भी हिस्सेदार बनाने की मानसिकता नहीं रही है बल्कि इसके उलट जब-जब राज्य द्वारा बहुसंख्य वंचितों को कुछ अधिकार देने का प्रयास हुआ, तब-तब उस समाज ने देश को एक रणभूमि में तब्दील कर दिया हो तब इसका एकमात्र जवाब है कि वह ब्राह्मण-क्षत्रिय- वैश्यों से युक्त भारत का सवर्ण समाज होगा! लाख प्रयास के बावजूद ऐसे किसी अन्य समाज का नाम नहीं ढूँढा जा सकता, जिसकी सवर्णों जैसी अपने ही सहधर्मियों को अधिकार- शून्य देखने की तीव्र चाह हो। जाने-माने एक्टिविस्ट लेखक और बहुजन डायवर्सिटी मिशन के अध्यक्ष एच एल दुसाध इस लेख में कहते हैं कि ‘यह समाज शुद्रातिशूद्रों के रूप में विद्यमान देश की 85 प्रतिशत आबादी के अधिकारों के इतना खिलाफ रहा कि उसे बहुसंख्य आबादी को अच्छा नाम रखने, शिक्षा पाने एवं मोक्ष के लिए आध्यात्मानुशीलन का अधिकार देना भी कभी गंवारा नहीं रहा। दुनिया के इतिहास में सबसे क्रूर माने जाने वाले एटिला द हूण, चंगेज खां जैसे शासकों ने पराधीन बनाये गए लोगों को अच्छा नाम रखने, शिक्षा ग्रहण करने एवं दुःख मोचन के लिए देवालयों में जाकर अपने भगवानों से प्रार्थना करने से कभी नहीं रोका। ऐसी बर्बरता का परिचय समग्र इतिहास में सिर्फ सवर्णों ने दिया।’

नांदेड़ : राजनीति और शासन जाति की सड़ांध से प्रेमियों को नहीं बचा सकते

इस कहानी का सबसे बुरा हिस्सा यह है कि सक्षम और आंचल के रिश्ते के बारे में परिवार में सभी जानते थे और उन्होंने उनके रिश्ते को स्वीकार करने का नाटक किया, लेकिन यह परिवार की एक चाल थी और आखिरी दिन उन्होंने सक्षम की हत्या कर दी। बात यहीं खत्म नहीं हुई, आंचल ने अपना विरोध दिखाया और सक्षम की लाश से शादी कर ली। 'सिंदूर' लगाया और मांग की कि उसके माता-पिता और भाइयों को फांसी दी जाए।

आरएसएस के संविधान विरोध पर गूगल का नज़रिया

यह सच है कि 26 नवम्बर, 1949 को संविधान राष्ट्र को सौंपे जाने के दिन से ही आरएसएस इसका विरोधी रहा है। हालांकि तमाम लोगों की भांति मुझे भी मालूम था कि डॉ. आंबेडकर द्वारा तैयार भारतीय संविधान मनुस्मृति पर आधारित न होने के कारण ही संघ इसका विरोधी रहा है, लेकिन यह लेख शुरू करने से पहले यह जानने का कौतूहल हुआ कि गूगल इस पर क्या राय देता है? मैंने गूगल से सवाल किया कि संघ भारतीय संविधान का क्यों विरोधी रहा है, तो जो जवाब मिला, वह वही था जो हम जानते हैं। आइये जानते हैं गूगल का जवाब-

बहुजनों के लिए बहुत बुरा साबित हुआ है यह अक्तूबर

आज 2025 का अक्तूबर का आखिरी दिन है। यह माह कई कारणों से बहुजनों के लिए दु:स्वप्न बना रहा। इसी माह की दो तारीख को 1925 में स्थापित आरएसएस ने सौ साल पूरे होने का जश्न मनाया। इसी माह में छः तारीख को देश के राजनीति की दिशा तय करने वाले बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा हुई। लेकिन संघ के सौ साल पूरे होने व बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा के अतिरिक्त जिस एक अन्य कारण से इस बार का अक्टूबर दु:स्वप्न बना, वह है संघ के सौ साल पूरा होने के बाद से उत्तर प्रदेश सहित भाजपा शासित मध्य प्रदेश, हरियाणा में  दलित–बहुजनों के खिलाफ शुरू हुआ अपमान, भेदभाव और उत्पीड़न से लेकर आत्महत्या की घटनाओं का सिलसिला, जो अब तक थमने का नाम नहीं ले रहा है। अक्तूबर 2025 के आकलन का यह मौलिक तरीका निस्संदेह एक महत्वपूर्ण पद्धति है।

जस्टिस गवई को ‘भीमटा’ की गाली सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक सरोकारों के सिमटते जाने का संकेत है

भारत की सड़ी हुई राजनीति और मनुवादी मानसिकता का असली चेहरा तब सामने आता है जब दलित समाज से आया व्यक्ति सत्ता, न्याय या प्रतिष्ठा की ऊँचाई पर पहुँच देश का मुख्य न्यायाधीश बनता हैऔर मनुवादी उसे सहज स्वीकार नहीं करते। इधर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई को सोशल मीडिया पर 'भीमटा' कहकर अपमानित किया गया। यह केवल एक गाली नहीं है। यह उस आंबेडकरवादी विचारधारा पर हमला है जिसने मनुवाद की नींव हिलाई थी। यह संविधान और लोकतंत्र को नीचा दिखाने की कोशिश है।

लैंगिक असमानता का शिकार होती पर्वतीय महिलाएं

'लड़की हो दायरे में रहो...' यह वाक्य अक्सर घरों में सुनने को मिलता है, जो लैंगिक असमानता का सबसे ज्वलंत उदाहरण है। विश्व आर्थिक...

बीएचयू हॉस्टल आवंटन और बीबीएयू पीएचडी में ओबीसी कोटा क्यों नहीं?

लखनऊ। कहने को देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान पिछड़ी जाति के हैं, फिर भी पिछड़ी जातियों के साथ उच्च...

सार्वजनिक शौचालय प्रणाली का निगमीकरण करनेवाले बिंदेश्वर पाठक ने हाथ से मैला ढोने वालों के लिए कुछ नहीं किया

सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डॉ. बिंदेश्वर पाठक का कुछ दिन पहले दिल्ली के एक अस्पताल में निधन हो गया। डॉ. पाठक 80 वर्ष के...

एक तरफ चाँद पर, दूसरी तरफ जातीय उत्पीड़न

वाराणसी। भारत को आजाद हुए 76 साल हो गए पर आज भी देश का एक बड़ा हिस्सा वंचना, अस्पृश्यता और गैर बराबरी की समस्या...

आज भी रंगभेद का शिकार हो रही हैं लड़कियां

21वीं सदी को साइंस और टेक्नोलॉजी का दौर कहा जाता है,  इसके बावजूद कुछ मुद्दे ऐसे हैं जो आज भी मानव सभ्यता के लिए...

राष्ट्रीय ओबीसी दिवस पर जाति जनगणना और मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने की मांग

आजमगढ़।  राष्ट्रीय ओबीसी दिवस पर ओबीसी समाज के मुद्दे और चुनौतियां विषय पर बरवा मोड़, गोसाई की बाजार, आजमगढ़ में सेमिनार का आयोजन किया...
Bollywood Lifestyle and Entertainment