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लोककला

बाज़ार की मुनाफाखोर प्रवृत्ति ने एक लोककला को अश्लीलता के शिखर पर पहुंचा दिया

यह नृत्य देहाती जीवन की अनेक विद्रूपताओं को हमारे सामने रखता है। बेशक यह हास्य और लास्य के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है लेकिन यह तमाम रूढ़ियों और वर्जनाओं के बीच पिसते हुये जीवन को बड़ी मार्मिकता से कह देता है। स्त्रियों के प्रति तमाम धारणाओं और रवैयों  के प्रच्छन्न रूपों को हम इनमें देख सकते हैं । स्त्रियों के ऊपर लदी हुई पितृसत्ता में किस तरह उनके मोलेस्टेशन और दमन को नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है यह इस नृत्य में आसानी से देखा जा सकता है।

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