बाज़ार की मुनाफाखोर प्रवृत्ति ने एक लोककला को अश्लीलता के शिखर पर पहुंचा दिया

गाँव के लोग डेस्क

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 इन्टरनेट पर बहुतायत मिलने वाला देहाती खोइया एक अश्लील नृत्य है जिसकी मुख्य विशेषता यह है कि नाचनेवाली स्त्री अपना चेहरा घूँघट में छिपाए रहती है जबकि नाचते हुये वह अपने यौनांगों का प्रदर्शन अनेक संकेतों के माध्यम से करती है। अमूमन ऐसे आयोजनों में प्रायः स्त्रियाँ ही शामिल रहती हैं। छोटे बच्चे भी रहते हैं । ढोलक की थाप पर एक अथवा कई स्त्रियाँ नाचती हैं।

गीतों में चित्रित कार्य-व्यवहार के अनुसार सामग्री के उपयोग से नृत्य को नाटकीय बनाया जाता है। मसलन घरेलू कामों के प्रदर्शन के लिये गोबर-गोइंठा, चौका-बेलन, सूप-चलनी, ओखली-मूसल आदि का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसा लगता है कि इन गीतों में पुरुषों की निर्योग्यताओं, निष्ठुरता और स्त्रियों के शोषण का वर्णन होता है और नर्तकी प्रायः पुरुष और पितृसत्ता के खिलाफ अपनी नाराजगी को जाहिर करती है।

स्त्री की यौनेच्छा की दमित अभिव्यक्ति कही जा सकती है लेकिन बात थोड़ी और भी जटिल है। यह यौनिकता के माध्यम से पुरुष दमन के उस रूप के खिलाफ सीधा विद्रोह है जिसमें स्त्री को शील-संकोच के पर्दे में धकेल दिया जाता है और वह अपने किसी अधिकार के प्रति कभी मुखर नहीं हो पाती, यहाँ तक कि वह शारीरिक सम्बन्धों में अपनी मुखरता, ऑर्गेज़्म और संतुष्टि के प्रति भी उदासीन रहती है।

इन्टरनेट पर प्राप्त वीडियो सामग्री को देखते हुये पता चलता है कि खोइया नृत्य करनेवाले अब प्रोफेशनल तरीके से इसे कर रहे हैं । इसमें एक कथानक होता है और मुख्य पात्र बनी स्त्री अन्य स्त्रियों से तरह-तरह के प्रश्न पूछती है। उदाहरण के लिए एक खोइया नृत्य में एक बर्तन बेचनेवाली सिर पर बर्तनों की टोकरी लिए आती है और उपस्थित औरतों से बर्तन लेने का इसरार करती है और गाती है। क्रमशः उसके इशारे यौनिक होते जाते हैं।

आजकल दर्जनों स्टूडियो इस नृत्य की अनेक तरह की वीडियोग्राफी कर रहे हैं जिनमें अश्लीलता और फूहड़ता में एक दूसरे से बाजी मार ले जाने की होड़ लगी हुई है। इंटरनेट पर ऐसे गीतों के विडियो की बाढ़ आई हुई है। दोअर्थी संवादों से भरे कई कथानक बहुत चर्चित हैं, मसलन राजा एक तरफ हटि जाउ फटि रही मेरी चुनरियानई बहू का देहाती जंगी जांगड़ा खोइया/ मेरे साया भीतर देवी कौ थान आदि बहुत लोकप्रिय खोइया नृत्य हैं।

इंटरनेट पर इसे देहाती खोइया एक अश्लील नृत्य जैसे शीर्षकों से अपलोड किया गया है। मजे की बात है कि एक–एक वीडियो को लाखों व्यूज मिले हैं। शिकोहाबाद के आशीष नामक स्टूडियो संचालक ने बताया कि ‘अब इस इलाके में पचास से अधिक खोइया नृत्य के ग्रुप हो गए हैं जो इसे बनाकर अपलोड करते हैं। उनके प्रोग्राम में एक से एक मसाला होता है और इन्टरनेट से वे लाखों कमाते हैं।’

बाज़ार की लालची और मुनाफाखोर प्रवृत्ति ने एक लोककला की हत्या कर दी और अब उसके नाम पर लोगों को अश्लीलता परोस रही है। इन्टरनेट ने बेशक लोगों तक ज्यादा सूचनाएँ पहुंचाई है लेकिन इसने ग्रामीण सौंदर्यबोध और मान-मर्यादा को खंडित कर दिया। वह हर चीज को अधिक बिकाऊ बनाने के लिए अश्लीलता की सारी हदें पार कर दी। अनेक लोककलाओं की तरह खोइया नृत्य भी बाज़ार का शिकार हुई है।

एक वीडियो के साथ चलने वाली पट्टी दिखती है- ‘शिकोहाबाद में सभी दर्शकों का हार्दिक स्वागत है कृपया हमारी वीडियो देखें पसंद आए तो लाइक करें कमेंट करें और नए-नए विडियो देखने के लिए हमारे चैनल को सब्सक्राइब करें धन्यवाद। हर तरीके के देहाती प्रोग्राम देखने के लिए हमारे चैनल Radhika studio shikohabad को सब्सक्राइब करें हमारे चैनल पर आपको हर रोज नई-नई प्रोग्राम देखने को मिलेगे।’

एक सहज लोककला को बाज़ार ने अश्लील बना दिया

‘लेकिन खोइया नृत्य देहाती स्त्रियों की ऐसी लोकनाटिका है जो वे घर में लड़के की शादी के मौके पर बारात जाने पर रात में अकेली स्त्रियाँ खेलती हैं। इसमें अश्लीलता नहीं बल्कि सहज और मनोरंजक कथानक होते हैं। इसे पूर्वी उत्तर प्रदेश की स्त्रियाँ भी खेलती हैं जिसे नकटा कहा जाता है। इसकी विशेषता यह है कि इसमें केवल स्त्रियाँ ही शामिल होती हैं। पुरुषों के लिए यहाँ आना वर्जित है।’यह विचार अलीगढ़ जिले की गभाना तहसील के उपजिलाधिकारी प्रवीण यादव के हैं जो मूलतः फ़िरोजाबाद जिले के रहनेवाले हैं और ब्रज मंडल तथा पश्चिमी उत्तर की लोकसंस्कृति के मर्मज्ञ हैं। वे इस बात से कत्तई इत्तफाक नहीं रखते कि खोइया नृत्य अश्लील है। बल्कि वे मानते हैं कि इसमें स्त्रियों के दुख-सुख और राग-विराग की अभिव्यक्ति होती है।

प्रवीण यादव कहते हैं कि ‘बाज़ार की लालची और मुनाफाखोर प्रवृत्ति ने एक लोककला की हत्या कर दी और अब उसके नाम पर लोगों को अश्लीलता परोस रही है। इन्टरनेट ने बेशक लोगों तक ज्यादा सूचनाएँ पहुंचाई है लेकिन इसने ग्रामीण सौंदर्यबोध और मान-मर्यादा को खंडित कर दिया। इसने हर चीज को अधिक बिकाऊ बनाने के लिए अश्लीलता की सारी हदें पार कर दी। अनेक लोककलाओं की तरह खोइया नृत्य भी बाज़ार का शिकार हुआ है।’

लोककलाओं और सिनेमा के समाजशास्त्रीय अध्येता राकेश कबीर लोककलाओं के लिए इन्टरनेट को बहुत बड़ा खतरा मानते हैं। वे कहते हैं कि इसके विस्तार ने असली को गायब कर दिया और नकली को विश्वपटल पर परोस दिया। ज़ाहिर है नकली के बिक्रेता अपने खरीदार को लुभाने के लिए किसी हद तक जा सकते हैं।

विगत दशकों में परवान चढ़े कैसेट और सीडी के बाज़ार ने जमकर अश्लीलता फैलाई। भोजपुरी, हरियाणवी और ब्रजमंडल की लोककलाएँ तो पूरी तरह बदनाम हो गईं। उन्हें सड़कछाप बना दिया गया है।

स्त्रीवादी व्याख्या इसे आत्माभिव्यक्ति का रूपक मानती है

यह आसान शब्दों में स्त्री की यौनेच्छा की दमित अभिव्यक्ति कही जा सकती है लेकिन बात थोड़ी और भी जटिल है। यह यौनिकता के माध्यम से पुरुष दमन के उस रूप के खिलाफ सीधा विद्रोह है जिसमें स्त्री को शील-संकोच के पर्दे में धकेल दिया जाता है और वह अपने किसी अधिकार के प्रति कभी मुखर नहीं हो पाती, यहाँ तक कि वह शारीरिक सम्बन्धों में अपनी मुखरता, ऑर्गेज़्म और संतुष्टि के प्रति भी उदासीन रहती है।

ऐसा इसलिए कि किसी भी यौन-मुखर स्त्री को पितृसत्ता चरित्रहीन के रूप में सामाजिक बहिष्कार का शिकार बनाती है। पितृसत्ता में स्त्री की यौनिकता समेत हर तरह की इच्छाओं का दमन कर दिया जाता है। हमरा के बुढ़वा भतार या  सइयाँ मिलल लरिकइयाँ मैं का करूँ आदि गीत वास्तव में हास्य के भीतर उस दर्द को समेटे हुये हैं जो बेमेल विवाहों से पैदा होता है।

रंगकर्मी और कार्यकारी संपादक अपर्णा के अनुसार ‘यह नृत्य देहाती जीवन की अनेक विद्रूपताओं को हमारे सामने रखता है। बेशक यह हास्य और लास्य के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है लेकिन यह तमाम रूढ़ियों और वर्जनाओं के बीच पिसते हुये जीवन को बड़ी मार्मिकता से कह देता है। स्त्रियों के प्रति तमाम धारणाओं और रवैयों  के प्रच्छन्न रूपों को हम इनमें देख सकते हैं । स्त्रियों के ऊपर लदी हुई पितृसत्ता में किस तरह उनके मोलेस्टेशन और दमन को नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है यह इस नृत्य में आसानी से देखा जा सकता है।’

कुल मिलाकर यह आसानी से देखा जा सकता है कि इन्टरनेट के विस्तार और मोनेटाइजेशन ने ऐसी सामग्री को बढ़ावा दिया है जो बहुत ज्यादा देखी जा रही है लेकिन मानवीय संवेदनाओं पर उसने घातक प्रहार किया है।

 

2 Comments
  1. Keshav Sharan says

    इस लेख में विरोधाभासी बयान हैं। हम इन्हें पक्ष और विपक्ष का विवाद कह सकते हैं। लेकिन मैं कहना चाहूँगा कि लोककलाओं का बिंदासपन अश्लीलता नहीं है। जो ग्रामीण कला-संस्कृति से परिचित नहीं हैं, उन्हें ऐसा ही लगता है। इस समय ग्रामीण मनोरंजन के प्रमुख साधन नौटंकियाँ और भाँड मंडली के नाट्य समाप्त हो चुके हैं जिन्हें गाँवों में स्त्री-पुरुष, बच्चे सब एक साथ देखते थे। उनमें भी नृत्य के हाव-भाव और संवाद आज की नागरी नैतिकता के अनुसार अश्लील ही हुआ करते थे। लेकिन क्या यह निष्कर्ष स्थापित हो गया है कि इस तथाकथित अश्लीलता से ग्रामीण समाज का नैतिक पतन हो रहा था ? ऐसा तो नहीं कहा जा सकता है। लेकिन उन लोककलाओं को ख़त्म करने के लिए उन्हें अश्लील बताना ज़रूरी था। देखने में आता है कि पहले इतनी वर्जनाएँ नहीं थीं जितनी अब हो गई हैं और वह भी ग्रामीण संस्कृति के दायरे में। प्रेमचंद जी जब हंस निकालते थे तो उसमें पुरूषों की यौन शक्ति बढ़ाने के विज्ञापन भी होते थे। आज क्या गाँव के लोग में ऐसा विज्ञापन छप सकता है ? कुछ नहीं, उपरोक्त चर्चित लोककला को अश्लील बताकर उसे ख़त्म करने का प्रयास होगा और उसके बाद दूसरी अश्लीलताओं का बाज़ार बनाया जायेगा। फूहड़, अश्लील और नीरस टाइप के एक-दो मिनटों के विडियोज का बाज़ार इंटरनेट पर कैसे सरगर्म है ?

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