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भारतीय समाज में फैला जातिवाद यहाँ के सिनेमा के मौलिक चरित्रों में ठूँस-ठूँस कर दिखाया जाता है

पूरी दुनिया में भारत ही ऐसा देश है जहां जातिवाद का घोर बोलबाला है। इसका प्रभाव समाज की हर संस्कृति और कला में देखने को मिलता है। भारतीय सिनेमा चाहे जिस भाषा में बनी हो वहाँ के चरित्रों में जाति और धर्म को केंद्र में रखा जाता है। आज का सिनेमाई यथार्थ यही है कि नायक या नायिका जो भी कुछ बेहतर परिवर्तन लाने की कोशिश करते दिखेंगे, देशहित में विदेशों से अच्छा कैरियर छोडकर वापस आयंगे या समाज में कुछ भी सकारात्मक घटित हो रहा होगा तो फिल्मों में उन चरित्रों को निभाने वाले नायक-नायिका के टाइटल साफ़ तौर पर उनकी जातीय पृष्ठभूमि को बताते हैं।

 चुनावी बॉण्ड का जाति शास्त्र

भारत में भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए जाति की सही भागीदारी बहुत आवश्यक है। सवर्णों के हाथों में पाॅवर होने के कारण उनके अन्दर का भय खत्म हो गया है। ऐसे में शक्ति के स्रोतों में विविधता नीति लागू होने पर भ्रष्टाचार तो पूरी तरह खत्म नहीं होगा पर उसके प्रभाव क्षेत्र में 80-85 प्रतिशत की गिरावट आ जाएगी।

पेरियार : गांव और शहर की वर्णाश्रम व्यवस्था के खिलाफ

गांवों के बारे में अपने विचार को, ‘गांव’ शब्‍द को, गांव और शहर के बीच के फर्क और दोनों में फर्क बताने वाले तरीकों को दिमाग में रखकर आप सुधार के नाम पर जो कुछ भी करेंगे, उससे आने वाला बदलाव उतना ही होगा जैसा ‘पारायर’ और ‘चकिलियार’ जातियों के नाम बदलकर ‘हरिजन’ और ‘आदि द्रविड़ार’ करने से आया है। सच्‍चा बदलाव कभी नहीं आएगा जिससे ‘पारायर’ दूसरे मनुष्‍यों के बराबर हो जाते। हो सकता है कि ‘ग्राम्‍य सुधार कार्यों की मार्फत एक गांव अच्‍छा गांव’ बन जाए, लेकिन गांव के लोगों को कभी भी शहरी लोगों जैसे अहसास या अधिकार नहीं मिल पाएगा। पेरियार का प्रसिद्ध भाषण।

ओवैसी ने कहा प्रधानमंत्री मोदी ओबीसी के साथ नहीं चाहते न्याय

हैदराबाद, (भाषा)। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने बुधवार को कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जाति के आधार पर मतदान...

रसोई से विद्यालय तक फैला है जातिवाद का जहर

आज भी उच्च जाति के लोग छोटी जाति के लोगों के साथ बैठकर खाना नहीं खाते हैं। अभी भी गांव में शादी समारोह से जुड़े कामकाज में दो रसोई लगाई जाती है, जिसमें बड़ी जाति और छोटी जाति वालों के लिए अलग अलग खाने की व्यवस्था होती है। हालांकि नई पीढ़ी के लोग यह भेदभाव बहुत कम करते हैं, लेकिन फिर भी गांव की पुरानी सोच के लोग नई पीढ़ी के लोगों को यह भेदभाव करने के लिए मजबूर करते हैं।

लगातार उलझाया जा रहा है जाति जनगणना का सवाल

जाति जनगणना संविधान सम्मत है और सामाजिक न्याय के लिए अनिवार्य भी  भारतीय संविधान के अनुच्छेद-246 के अंतर्गत जनगणना विषयक उल्लेख है। भारत मे लॉर्ड...

 नफरत-बंटवारे और साम्प्रदायिक राजनीति के खिलाफ बेहद जरूरी है जाति जनगणना- अली अनवर अंसारी

बनारस में जाति जनगणना की मांग को लेकर वक्ताओं ने तर्क और तथ्य के जरिए भाजपा सरकार को जमकर घेरा। उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक...

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