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रैदास : मध्यकालीन सामंती दमन और धार्मिक पाखंड के विरुद्ध सबसे मजबूत आवाज

पूरे देश में आज धर्म की अंधी दौड़ में मानवीयता पीछे छूटती जा रही है, वही 15 वीं सदी में पैदा हुए रैदास ने ब्राह्मणवादी संस्कारों के सख्त खिलाफ रहते हुए मनुष्यों में समानता और जाति से बाहर आकर जीने की बात कही। लेकिन उनके लेखन और विचारों का इतना प्रचार नही हुआ, जिसके वे हकदार थे। रैदास इसी गौरवशाली परंपरा से संबंधित थे, जो मध्यकाल में भारत में फली-फूली। वे भक्ति परंपरा के उत्तर भारतीय संत थे, एक ऐसी परंपरा जिसका गरीब मुसलमान और हिंदू दोनों सम्मान करते थे। वे एक गरीब मोची परिवार से थे।

जाति भी पूछो साधु की !

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान, /मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान। महर्षि कबीर के इस दोहे को हम सबने बचपन...

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