अगर किसी ने अपने सहधर्मियों के साथ अतीत में ऐसा किया भी तो बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध तक आते-आते वे अपने पुरुखों के पापों का प्रायश्चित करने के लिए वंचित मानव समुदायों को अधिकार देने लगे। इसका बड़ा दृष्टान्त उस अमेरिका ने स्थापित किया, जहाँ का प्रभुवर्ग विगत 17वीं सदी के शुरुआत से पशुवत इस्तेमाल हो रहे कालों को बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध (1967) से मानवीय अधिकारों से लैस करना शुरू किया और सदी के शेष होते अमेरिकी आरक्षण (डाइवर्सिटी) के जरिये सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों सहित, सप्लाई, डीलरशिप, फिल्म-टीवी इत्यादि समस्त क्षेत्रों में उन्हें संख्यानुपात में हिस्सेदार बनाने लगा। ऐसा सिर्फ अमेरिका ही नहीं, इंग्लॅण्ड, फ़्रांस, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया इत्यादि ने भी किया।
भारतीय प्रभु वर्ग ने बीसवीं सदी में भी दूसरे देशों के प्रभु वर्ग से प्रेरणा नहीं लिया
अमेरिका, इंग्लॅण्ड, फ़्रांस, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया इत्यादि के विपरीत भारत के बिहार में जब 1978 में वहां के तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने मुंगेरी लाल आयोग की सिफारिशों के आधार पर सप्लाई, डीलरशिप नहीं, सिर्फ सरकारी नौकरियों में 26% आरक्षण (पिछड़े वर्गों के लिए) लागू करने की घोषणा किया, वहां का प्रभु वर्ग अर्थात सवर्ण जातियों (विशेषकर भूमिहार, राजपूत, कायस्थ) ने उनकी आरक्षण नीति के खिलाफ उग्र प्रदर्शन शुरू कर दिया। विरोध के दौरान ‘कर्पूरी कर पूरा, छोड़ गद्दी उठा उस्तरा, बना दाढ़ी’ जैसे नारे लगाए गए। इस विरोध में संघ का तत्कालीन राजनीतिक संगठन जनसंघ भी शामिल रहा। आखिरकार सवर्णों ने 1979 में अविश्वास प्रस्ताव के जरिए कर्पूरी ठाकुर की सरकार को गिरा दिया।
शुद्रातिशूद्रों के अधिकारों के विरुद्ध वह सवर्णों का आखिरी विरोध नहीं था
1990 के दशक में जब अमेरिका के नर-पशु (अश्वेत) अमेरिकी आरक्षण के जरिये उद्योग-व्यापार, फिल्म-टीवी- मीडिया इत्यादि हर क्षेत्र में विस्मय सृष्टि कर रहे थे, तब 7 अगस्त,1990 को मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित हुई, जिसमें पिछड़ों को 27% आरक्षण देने की सिफारिश की गई थी। मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होते ही बहुजनों के किसी भी प्रकार के मानवीय अधिकारों के खिलाफ सदैव उग्र रूप धारण करने वाले सवर्णों का आक्रोश फिर फट पड़ा। उनकी होनहार संतानों ने जहाँ आत्म-दाह से लेकर राष्ट्र की संपदाएँ जलाने का सिलसिला शुरू किया। वहीं सवर्णों की चैम्पियन पार्टी भाजपा ने राम जन्मभूमि मुक्ति के नाम पर, अटल बिहारी वाजपेयी के शब्दों में आजाद भारत का सबसे बड़ा आन्दोलन छेड़ दिया, जिसके फलस्वरूप अपार संपदा और असंख्य लोगों की जानें गईं। अंततः सवर्णों और भाजपा के आरक्षण विरोधी आंदोलनों के फलस्वरूप 22 जनवरी, 2024 को राममंदिर निर्माण का कार्य पूरा हुआ। तब तक साधु-संतों के वेश में छिपे करोड़ों ब्राह्मणों, असंख्य सवर्ण लेखक-पत्रकारों, छात्र और उनके अभिभावकों के सौजन्य से देश आरक्षण विरोधी आग में जलता रहा।
इक्कीसवीं सदी में भी पूर्ववत है सवर्णों की बहुजन विरोधी सोच
नई सदी में जब अश्वेत अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, जिसके समक्ष डीयू-जेएनयू की हैसियत प्राइमरी स्कूल जैसी है, में शिक्षा के समान अवसर का लाभ उठा रहे थे, तब 2006 में कांग्रेस सरकार ने उच्च शिक्षण संस्थानों के प्रवेश में पिछड़ों के लिए आरक्षण की घोषणा किया। उसके बाद दलित-पिछड़ों के किसी भी प्रकार के अधिकारों के खिलाफ सदा मुस्तैद रहने वाले सवर्ण सरफरोशी की तमन्ना लिए देश को फिर युद्ध क्षेत्र में तब्दील कर दिए। देश के एक अंचल को वे फिर एक बार युद्ध क्षेत्र में तब तब्दील कर दिए जब जुलाई, 2013 में उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने त्रि-स्तरीय आरक्षण की घोषणा की। तब उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग की नई आरक्षण नीति के खिलाफ सवर्णों ने जो सड़कों पर उतर कर जो कुछ किया, उसे देखकर लोग दातों तले अंगुली दबा लिए। इस बार अरक्षित वर्ग के खिलाफ उनकी नफरत का यह आलम रहा कि उन्होंने यादव जाति से सम्बद्ध मानकर गायों और भैंसों को निर्ममता से पीटा तथा दूध-दही के बर्तनों को उडेलना शुरू किया। यही नहीं, भगवान् श्रीकृष्ण को यादव जाति का मानकर उनकी मूर्तियों को तोड़ा और सरेआम उनकी तस्वीरों को फाड़कर पैरों तले रौंदा। त्रि-स्तरीय आरक्षण के पहले सवर्ण राजस्थान में एकाधिक बार गृह-युद्ध की स्थिति पैदा कर चुके थे और उसके बाद भी उन्होंने कई बार दलित-बहुजनों के खिलाफ जंगी मनोभाव लिए देश को अशांत कर दिया। शुद्रातिशूद्रों के अधिकारों के खिलाफ उन्होंने बड़े पैमाने पर फिर एक बार गृह-युद्ध के हालात पैदा करने की शुरुआत की, जब 13 जनवरी, 2026 को यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ) ने कॉलेज और विश्व विद्यालयों में जाति आधारित भेदभाव रोकने के लिए नए समानता नियमों को अधिसूचित किया।

यूजीसी के नए रेगुलेशन की पृष्ठभूमि में दो माएं
13 जनवरी, 2026 को अधिसूचित यूजीसी के नए रेगुलेशन के पीछे रोहित वेमुला की मां राधिका वेमुला और पायल तड़वी की मां आबेदा तड़वी की अहम भूमिका रही है। 2016 में रोहित वेमुला (हैदराबाद विश्वविद्यालय) और 2019 में पायल तड़वी (मुंबई) की संस्थागत आत्महत्याओं के बाद, उनकी मांओं ने सुप्रीम कोर्ट में 2019 में याचिका दायर की थी, जिसमें भेदभाव विरोधी व्यवस्था की मांग की गई थी। पिछले सात वर्षों से लगातार संघर्ष के माध्यम से, इन मांओं ने यूजीसी को नियम मजबूत करने के लिए विवश किया।
सोशल मीडिया से प्राप्त जानकारी के मुताबिक इसकी कहानी शुरू होती है 2019 में, कोलंबिया यूनिवर्सिटी से लॉ में मास्टर्स डिग्री से सम्मानित दिशा से वाडेकर से, जो पायल तड़वी की माता आबेदा तड़वी और रोहित वेमुला की माता राधिका वेमुला की याचिका लेकर कोर्ट जाती हैं। काफ़ी विचार-विमर्श, तमाम रिसर्च का डेटा प्रस्तुत होता है, तमाम यूनिवर्सिटीज में हो रहे भेदभाव का डीप एनालिसिस होता है। 2023 में भारत सरकार राज्यसभा में कहती है कि 2019 से लेकर 2021 के बीच एससी-एसटी और ओबीसी के 98 बच्चों ने आत्महत्या की। ये हालात आईआईटी, एनआईटी, आईआईएम जैसे संस्थानों के हैं। भेदभाव के मामलों में 118% की वृद्धि हुई। विभिन्न रिसर्च तमाम एक्सपर्ट की राय लेने के बाद कोर्ट यूजीसी को आदेश देता है नए रेगुलेशन को सख्ती से लागू करो। ऐसा नहीं है कि ये रेगुलेशन पहले नहीं थे। ये रेगुलेशन 2012 से अस्तित्व में हैं, लेकिन यह सिर्फ़ कागज़ पर थे। उसके पीछे कारण था कि, शिकायतकर्ता केवल कॉलेज एडमिन के पास जा सकता था। एक सदस्य कमेटी ही सारे निर्णय लेती थी। ऐसे में कॉलेज एडमिन अपने इंस्टीट्यूशन की साख बचाने के लिए शिकायतों को अनदेखा कर देता था और शिकायतकर्ता सुसाइड जैसे क़दम उठा लेता था।
नए नियमों में सिर्फ़ यह बदलाव हुआ है कि कमेटी में कॉलेज एडमिन के साथ-साथ स्टैक होल्डर भी बैठेंगे। उसमें स्टूडेंट, प्रोफेसर, एक्सपर्टस, सभी वर्ग के प्रतिनिधि तथा अन्य कई लोग भी होंगे। अब कमेटी सिर्फ एक सदस्य वाली नहीं होगी। सभी का प्रतिनिधित्व होगा। प्रॉपर मॉनिटरिंग होगी। फैक्ट फाइंडिंग टीम होगी। यूजीसी के नए नियम कोई क्रिमिनल लॉ नहीं हैं। ये सिविल लॉ हैं, सभी समाज वर्गों पर लागू होते हैं। इन नियमों में ईडब्ल्यूएस (बाभन-बनिया-सवर्ण) कैटिगरी को भी शामिल किया गया है जो 2012 वाले रेगुलेशन में नहीं था।
मान लीजिए किसी के साथ भेदभाव होता है। वह शिकायत लेकर कमेटी के पास जाएगा। इस कमेटी में कई लोग होंगे, वे जांच करेंगे कि आरोप सही है या निराधार। आरोपी और शिकायतकर्ता को नोटिस जारी होगी। दोनों को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त मौका मिलेगा, अगर शुरुआती जांच में झूठा पाया जाता है तो कमेटी शिकायत रिजेक्ट कर देगी। अगर आरोप सही भी साबित होते हैं तो किसी को जेल नहीं भेजा जाएगा। उसको समझाइश दी जाएगी। उससे शपथ पत्र लिया जाएगा कि दोबारा ग़लती नहीं करेंगे। फ़िर भी अगर आरोपी नहीं मानता है तो उसे रेस्टिकेट का आदेश कमेटी दे सकती है। बस यहीं तक का प्रोसेस है।
सवर्णों ने दी इस्लाम कबूलने और देश से अलग होने तक की धमकी
यूजीसी द्वारा लाए गए नए नियम इक्विटी रेगुलेशन को वापस लेने के लिए सवर्ण समाज सडकों पर उतरा। नया रेगुलेशन वापस लेने के लिए दबाव बनाने में ढेरों सवर्ण नेता, साधु-संत, लेखक-पत्रकार सामने आए। एक साधु ने तो प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर मांग की कि या तो यूजीसी का नया नियम वापस लो या इच्छा मृत्यु की इजाजत दो। ढेरों सवर्णों ने नए रेगुलेशन के विरोध में देश से अलग होने की मंशा जाहिर कर डाली। हजारों सवर्णों ने नए रेगुलेशन को वापस नहीं किये जाने की स्थिति में इस्लाम कबूल कर लेने की धमकी तक दे दी। कई जगह खून से पत्र लिखकर प्रधानमंत्री से यूजीसी के नए नियम वापस लेने की मांग की गई। चार सवर्ण जातियों ने मिलकर ‘एस- 4’ नामक समन्वय समिति तक बना ली, ताकि इस विरोध को संगठित और आक्रामक रूप दिया जा सके। बहरहाल, इस बार उनके निशाने पर खासतौर से वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रहे रहे, जिन्होंने राजसत्ता का अधिकतम इस्तेमाल सवर्ण हित में करते हुए देश के सरकारी उपक्रमों के औने-पौने दामों में बेचने जैसा देश विरोधी काम करने के साथ ही संविधान की अनदेखी करते हुए ईडब्ल्यूएस आरक्षण का प्रावधान किया।
उन्होंने मंडल के विरोध में राममंदिर बनवाने जैसा काम अंजाम दिया। ऐसे व्यक्ति को तेली कहकर गलियां दी गईं। उसकी मरी हुई माँ को गलियां दी गईं। उनके पुतले जलाये, पुतलों पर जूते-चप्पल बरसाए गए। मोदी तेरी कब्र खुदेगी के नारे लगाये गए। प्रधानमंत्री को सीधे-सीधे तलवार दिखाकर जान से मारने की वीडियो बनाकर धमकी दी गई। सरकार गिराने की धमकी दी गई। यूजीसी के रेगुलेशन से हल्का-सा अपने स्वार्थ पर आघात लगते देख सवर्ण नेता, बुद्धिजीवी, साधु-संत, छात्र-छात्राएं इतने आक्रोशित हो गए कि उनको ख्याल ही नहीं रहा कि इससे हिन्दू-एकता की धज्जियाँ उड़ रही हैं। बाद में जब 29 जनवरी को कोर्ट ने नए रेगुलेशन को रोकने और 2012 वाला नियम लागू रखने का अंतरिम आदेश दिया तब सवर्णों ने इसे अपनी जीत मानते हुए बेहयाई के साथ एक-दूसरे का मुंह मीठा किया। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के ब्राह्मण जजों ने सवर्णों की मन वाली करके भले ही आत्म-संतोष एन्जॉय किया, लेकिन कोर्ट की साख पर बट्टा लगा दिया। एक बच्चे तक को लग गया कि शीर्ष अदालत ने सवर्णपरस्ती का परिचय दिया है। साबित हो गया कि न्यायपालिका सवर्णपालिका में तब्दील होती जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट के स्टे और पिछड़े नेताओं की नपुंसकता के खिलाफ बहुजन छात्र-गुरुजन मैदान में
बहरहाल, जिस हिदायत के साथ सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए रेगुलेशन पर रोक लगाई, उससे बहुजन छात्र और गुरुजनों को भारी निराशा हुई। उनकी निराशा में तब और वृद्धि हो गई जब उन्होंने देखा कि कोर्ट द्वारा यूजीसी के नए रेगुलेशन पर रोक लगने के बाद नीतीश कुमार, चिराग पासवान, उपेन्द्र कुशवाहा, अनुप्रिया पटेल, ओम प्रकाश राजभर, संजय निषाद इत्यादि ने जहाँ पूरी तरह चुप्पी साध ली, वहीं बसपा सुप्रीमो मायावती ने कोर्ट के निर्णय को उचित ठहराया। अखिलेश यादव का रवैया भी ढुलमुल रहा और वह भी मायावती की तरह कोर्ट के निर्णय का समर्थन करते दिखे। अवश्य ही शिक्षा जगत से जुड़े कई लोगों ने स्टे के खिलाफ मुंह खोला। यूजीसी के पूर्व चेयरमैन सुखदेव थोराट ने कहा, ‘जो नए नियमों के ख़िलाफ़ शिकायत कर रहे हैं, मेरा मानना है कि वह ग़लत है। मुझे लगता है कि वे आम तर्क यह दे रहे हैं कि उनके साथ भेदभाव होता है। थोराट ने कहा, ‘उच्च जाति के लोग चाहते हैं कि उनके लिए भी प्रावधान हो क्योंकि ग़लत शिकायतें आएंगी। मुझे लगता है कि यह सब ग़लत है। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि उच्च जाति का कोई स्टूडेंट फ़िज़िकली डिसएबल हो और उसे प्रताड़ित किया जाता है तो ऐसा नहीं है कि नए नियमों में वह कवर नहीं होगा। वह भी कवर होगा।’
जाति और शिक्षा के मुद्दे पर व्यापक रूप से काम कर चुके समाजशास्त्री प्रोफ़ेसर सतीश देशपांडे ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से लगाई गई रोक ‘निराशाजनक’ है और यह ‘ग़लत संदेश’ देती है। 2026 के नियमों को लागू करने में समस्याएं तो आतीं। समाज की शक्ति संरचना के ख़िलाफ़ जाने वाले किसी भी क़दम के साथ ऐसा ही होता है, लेकिन उनके दुरुपयोग की संभावना, जो किसी भी क़ानून के साथ होती है, का मतलब यह नहीं हो सकता कि कोई क़ानून ही न हो। उच्च जातियों की यह चिंता थी कि उनके साथ भेदभाव हो सकता है। हां, यह हो सकता है और कभी-कभार होता भी है। लेकिन हमें देखना चाहिए कि समाज में ऐसी घटनाओं का पलड़ा किस ओर झुका है। समाज में शक्ति समीकरण क्या हैं, यही हमें देखना होगा।
कोर्ट के निर्णय और बहुजन नेताओं की चुप्पी से हताश होकर बहुजन छात्रों और शिक्षकों ने यूजीसी के नए रेगुलेशन के समर्थन में सड़कों पर उतरने का मन बनाया और उतर भी गए। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक सवर्णों के मुकाबले बहुत ज्यादा संख्या में बहुजन छात्र और शिक्षक सडकों पर उतर चुके हैं। विभिन्न शहरों से छात्र और शिक्षकों के आंदोलित होने की खबरे आ रही हैं। 3 फ़रवरी को दिल्ली विश्वविद्यालय के कैम्पस से यूजीसी की नई नियमावली वापस लेने के लिए हल्ला बोलने की घोषणा हो चुकी है तो बीएचयू में मशाल जुलूस की तैयारी चल रही। ऐसी ही तैयारी पटना, जयपुर, लखनऊ इत्यादि विश्वविद्यालयों में भी चल रही है। कुल मिलाकर लाखों छात्रों के आंदोलित होकर सडकों पर उतरने की खबरें आ रही हैं, जिस पर लोगों की नजरें टिक गई हैं।

सबसे बड़ी चुनौती शक्ति के स्रोतों पर सवर्ण वर्चस्व
बहरहाल यूजीसी की 2026 की नई समानता गाइडलाइंस के समर्थन में दलित, पिछड़े और वंचित वर्गों के लाखों की तादाद में जो छात्र- गुरुजन बड़े आन्दोलन की तैयारी में जुटे हैं, वे अपनी मांगों को विस्तार देने पर एक बार विचार कर लें। उनकी मुख्य मांगें हैं कैंपस में जातिवादी उत्पीड़न को रोकना और समावेशी माहौल बनाना। रोहित एक्ट लागू करवाना, ताकि संस्थागत भेदभाव पर रोक लगे एवं शिक्षकों की कमी को दूर करने के विशेष भर्ती अभियान चला कर आरक्षित पदों को भरना। निश्चय ही ये बड़ी मांगें हैं जिनके लिए लड़ना जरुरी है। लेकिन संघ प्रशिक्षित मोदी की नीतियों में दलित, आदिवासी ,पिछड़े, अल्पसंख्यक और महिलाएं जिस स्टेज में पहुंचा दिए गए हैं, उससे बाहर निकलने के लिए अवाम को दुनिया के विभिन्न अंचलों के शासकों के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़नी पड़ेगी।
खुद इन्हीं हालात में भारत के लोगों ने गांधी के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ और मंडेला के नेतृत्व में दक्षिण अफ्रीका में कालों ने गोरों के खिलाफ अपनी मुक्ति की लड़ाई लड़ी। याद रहे, सारी दुनिया में शासकों के खिलाफ गुलामों ने जो मुक्ति की लड़ाई लड़ी, वह मुख्यतः शक्ति के स्रोतों–आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक–के अत्यंत असमान बंटवारे के कारण लड़नी पड़ी। शासक वह होता है, जिसका शक्ति के स्रोतों पर एकाधिकार होता है, जबकि गुलाम वे कहलाते हैं, जो शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत व वंचित होते हैं। भारत में अंग्रेजों और दक्षिण अफ्रीका में शक्ति के स्रोतों पर क्रमशः अंग्रेजों और गोरों का एकाधिकार था, जबकि गांधी और मंडेला के लोग उससे अत्यधिक वंचित थे। दुनिया में जहाँ-जहाँ आजादी की लड़ाई लड़ी गई, वहां के गुलामों की स्थिति भारत और दक्षिण अफ्रीका के मूलनिवासियों जैसी ही रही। जिस स्थिति में गांधी को अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़नी पड़ी, प्रायः उसी स्थिति में आज का भारत पहुँच गया है।
स्मरण रहे कि जिस भाजपा का पितृ संगठन आरएसएस है, अपने जन्मकाल से उसका चरम लक्ष्य हिन्दू राष्ट्र की स्थापना रहा है, ताकि उसमे कर्म आधारित वर्ण-व्यवस्था लागू कर शक्ति के समस्त स्रोत ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के मध्य वितरित किया जा सके। पिछले ग्यारह सालों में संघ अपने राजनीतिक संगठन भाजपा के जरिये शक्ति के प्रायः 80-90 प्रतिशत स्रोत अपने चहेते वर्ग अर्थात सवर्णों के हाथों देने में सफल हो गया है। इसका साक्ष्य है मई, 2024 में आई ‘वर्ल्ड इनइक्वालिटी लैब- 2024’ की रिपोर्ट। उस रिपोर्ट में यह तथ्य उभर कर सामने आया था कि देश की संपत्ति में 89% हिस्सेदारी सामान्य वर्ग अर्थात सवर्णों की है, जबकि दलित-आदिवासी समुदायों की हिस्सेदारी मात्र 2.8 %। वहीं भारत के विशालतम समुदाय ओबीसी की देश की धन- संपदा में महज 9 % की हिस्सेदारी है।
आज यदि कोई गौर से देखे तो पता चलेगा कि पूरे देश में जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हैं, उनमें 80-90 प्रतिशत फ्लैट्स संघ के चहेते सवर्ण वर्ग के नजर आएंगे। मेट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग मॉलों में 80-90 प्रतिशत दूकानें इन्हीं की है। चार से आठ-आठ लेन की सड़कों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता है, उनमें 90 प्रतिशत से ज्यादे गाड़ियां इन्हीं की होती हैं। देश के जनमत निर्माण में लगे छोटे-बड़े अख़बारों से लेकर तमाम चैनल प्राय इन्ही के हैं। फिल्म और मनोरंजन पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा इन्ही का है। संसद, विधानसभाओं में वंचित वर्गों के जनप्रतिनिधियों की संख्या भले ही ठीक-ठाक हो, किन्तु मंत्रिमंडलों में दबदबा इन्हीं का है। मंत्रिमंडलों में लिए गए फैसलों को अमलीजामा पहनाने वाले 80-90 प्रतिशत अधिकारी इन्हीं वर्गों से हैं। न्यायिक सेवा, शासन-प्रशासन, उद्योग-व्यापार, फिल्म-मीडिया, धर्म और ज्ञान क्षेत्र में भारत के अपर कास्ट जैसा दबदबा आज की तारीख में दुनिया में कहीं नहीं है।
संघ के इसी चहेते वर्ग का कॉलेज/ यूनिवर्सिटियों के प्रशासनिक पदों, प्रोफ़ेसर और एसोसिएट प्रोफेसरों के पदों पर 80-90 % कब्ज़ा है। मोदी की नीतियों से शक्ति के स्रोतों पर जिसकी स्थिति दलित, आदिवासी, पिछड़ों एवं अल्पसंख्यकों से भी बदतर हुई है। वह है भारत की आधा आबादी, जिसकी संख्या 70 करोड़ है। 2006 से वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम की ओर से हर वर्ष प्रकाशित हो रही ग्लोबल जेंडर गैप की 2021 की रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत की आधी आबादी की स्थिति हमारे पड़ोसी मुल्कों बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, चीन, म्यांमार, पकिस्तान इत्यादि से तो बदतर है ही, उसे आर्थिक रूप से भारत के पुरुषों की बराबरी में आने में 250 साल से ज्यादा लगेगा। सारांश में देखा जाय तो साफ़ नजर आएगा कि आज के भारत में दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यक और आधी आबादी जितने न्यूनतम शक्ति के स्रोतों पर गुक्जर-बसर करने के लिए विवश है, उससे बहुत बेहतर स्थिति उन देशों के अवाम की नहीं रही, जहां अतीत में स्वाधीनता संग्राम संगठित हुए।




