होमसंस्कृति
संस्कृति
सिनेमा
विभाजन और वापस आने की बेचैनी : एक बार फिर तकलीफ़ उकेरती हुई फिल्म
आज़ादी के साथ ही तोहफे में मिला विभाजन भारत के करोड़ों लोगों की त्रासदी है जो जब भी खुलती है तो एक नया दर्द लेकर आती है। यह कल्पना की जा सकती है कि दोनों तरफ से अपना देश छोड़कर जाते लोगों ने कितने दुःस्वप्नों के बीच अपना जीवन गुजारा होगा और किस तरह अपनी बिखरी ज़िंदगियों को फिर से पटरी पर चलने लायक बनाया होगा। दुर्भाग्य से आज़ाद भारत में अभिव्यक्ति का सबसे ताकतवर माध्यम बन जाने वाले भारतीय सिनेमा ने उसे चलते-फिरते निपटा दिया है। पिछली सदी के अंतिम दशक तक आते-आते हिन्दी सिनेमा ने जहाँ भारत-पाकिस्तान के बीच के अंतर्विरोधों को बिकाऊ माल बना दिया वहीं विभाजन की विभीषिका के साथ वह न्याय नहीं कर सका। अब तो सिनेमा को दो देशों के बीच विद्वेष को राजनीतिक औज़ार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। कहना जरूरी है कि ऐसा सिनेमा नफरत को बढ़ाते हुए दिमाग में फफोले पैदा कर रहा है। इसी बीच आई इम्तियाज़ अली की फिल्म मैं वापस आऊँगा एक अलग अनुभव के साथ आई है। इस फिल्म ने एक अधूरे छूट गए प्रेम के बहाने त्रासदियों और तकलीफ़ों का जो जखीरा पेश किया है वह स्तब्ध कर देता है। इसे देखकर विचलित हुए बिना नहीं रहा जा सकता। इसके बहाने विभाजन और उसके अनेक आयामों के साथ इम्तियाज़ अली के सिनेमा का गंभीर विवेचन करता सिनेमा के अध्येता डॉ राकेश कबीर का यह लेख -
सुपौल : कोसी के बाढ़ पीड़ितों की सेवा करते हुए शहीद हुए युवा चिकित्सक को दी गई श्रद्धांजलि
महाराष्ट्र के एक युवा डॉक्टर, चंद्रकांत पाटिल ने कोसी के दुख को अपना समझा। वर्ष 2008 की राष्ट्रीय आपदा के दौरान बाढ़ पीड़ितों की सेवा करते हुए डॉ पाटिल शहीद हुए। 18 वर्ष बाद कटैया ने शहीद हुए डॉ पाटिल को याद किया। कार्यक्रम में उनकी शहादत को याद करते हुए कबीर के निर्गुण भजन हुए, जिसमें इंसानियत ने एक बार फिर सरहदों, भाषाओं और पहचानों से ऊपर उठकर अपना चेहरा दिखाया।
यादवों ने किस कृष्ण का निर्माण किया है?
पिछड़ों के साहित्य की खोज में जेल की कोठरियों की छानबीन, अदालती पराजयों का गहन अध्ययन, फांसी के फंदों और थानों की हवालातों के विश्लेषण से पिछड़ों का साहित्य खोजने की परिकल्पना की गई है। इसके साथ ही आदि लिपिकार पथरकटों, आदि आविष्कारक चरवाहों, किसानों, देशों के अन्वेषक और खोजी मल्लाहों, नाइयों, धोबियों, बुनकरों की ऐतिहासिक जीवन यात्राओं के अलावा विभिन्न घटनाओं के प्रभावों का गहन अध्ययन भी एक मुख्य परिकल्पना है और मुझे लगता है इन्हीं सब में एक विराट पिछड़ा साहित्य मौजूद है।
फिलिस्तीनी जनता का प्रतिरोध : हम किसी भी हालत में अपना देश नहीं छोड़ेंगे
नई दिल्ली में 2 जुलाई, 2026 को में गाज़ा में नरसंहार के 1000वें दिन को कविताओं और एकजुटता भाषणों के साथ याद किया गया। सभा के विशेष अतिथि, फ़िलिस्तीन राज्य के राजदूत डॉ. अब्दुल्ला एम. अबू शावेश ने आईपीएसएन को इस सार्थक कार्यक्रम के आयोजन पर धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि वे फ़िलिस्तीनी लोगों के लिए न्याय, आज़ादी और सम्मान की माँग में आईपीएसएन के साथियों की इस एकजुटता और प्रतिबद्धता से बहुत प्रभावित हैं।
बांडुंग से ब्रिक्स : अमेरिकी साम्राज्यवाद के विकल्प की संभावनाएँ और चुनौतियाँ
ब्रिक्स के सहयोग के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं: राजनीतिक और सुरक्षा, आर्थिक और वित्तीय तथा सांस्कृतिक और जन-जन के बीच आदान-प्रदान। आज अमेरिका को डॉलर-आधारित वर्चस्व का लाभ प्राप्त है। लगभग 67 देशों पर अमेरिकी शक्तियों द्वारा प्रतिबंध लगाए गए हैं। इस वर्चस्व को ध्वस्त करने के लिए ब्रिक्स ने द्विपक्षीय व्यापार, वैकल्पिक वित्तीय संदेश प्रणालियों तथा चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) जैसे व्यापारिक विकल्पों पर ध्यान केंद्रित किया है। ये छोटे, किंतु प्रभावशाली कदम एक बहुध्रुवीय आर्थिक व्यवस्था के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
सिनेमा में ग्रीनलैंड : असाधारण जीवट की कहानियों पर ट्रम्प की लोलुपता की बढ़ती छाया
अमेरिका खुद को विश्व व्यवस्था में लोकतंत्र और शांति-व्यवस्था का संरक्षक मानता है जबकि वास्तविकता इसके उलट है। नब्बे के दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनिया से दो ध्रुवीय व्यवस्था समाप्त हो गई और अमेरिका सबसे बड़ी शक्ति के रूप में उभरा और वहीं से उसकी दादागिरी और बढ़ गयी। अमेरिका और यूरोप के विकसित देशों ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं को अपनाकर एक खुली हुई विश्व व्यवस्था की वकालत की ताकि पूंजी और श्रम का बेरोकटोक प्रवाह हो सके। इस कार्य में विश्व व्यापार संगठन, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। खुली विश्व व्यवस्था का लाभ उठाकर चीन, अमेरिका और कई यूरोपीय देशों ने नव साम्राज्यवाद को बढ़ावा दिया। विकासशील और गरीब देशों के संसाधनों की लूट बढ़ गयी। जिन देशों ने इस लूट में सहयोग नहीं दिया उनके ऊपर वामपंथ, तानाशाही, परमाणु हथियार बनाने का आरोप मढ़कर, प्रायोजित विद्रोह कराकर वहां की शासन व्यवस्था को अस्थिर कर दिया गया। कमजोर और अमेरिकापरस्त लोगों के हाथ में सत्ता देकर अप्रत्यक्ष रूप से अपनी दादागिरी थोप दी गयी। अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, लेबनान, फिलिस्तीन, बांग्लादेश सभी इसके शिकार हो चुके हैं। फिल्म ‘अगेंस्ट द आइस’ दो बहादुर खोजी यात्रियों द्वारा अपने निजी अनुभवों पर लिखी गयी किताब पर आधारित फिल्म थी जिसने ग्रीनलैंड को अमेरका की विस्तारवादी नीति से बचाया था लेकिन एक शताब्दी बाद अमेरिका जैसे साम्राज्यवादी देश यह समझने को तैयार नहीं कि देश जमीन पर बना नक्शा नहीं होता। उसमें लोग भी रहते हैं जो अपने देश और लोगों से प्यार करते हैं और किसी बाहरी देश का कब्ज़ा या हस्तक्षेप नहीं चाहते। सबसे रार ठानकर अमेरिका अकेले नहीं रह सकता। उसके राष्ट्रपति को नहीं पता लेकिन वहां की जनता को पता है, इसलिए यूनाइटेड स्टेट के नागरिक अपने राष्ट्रपति के फैसलों के खिलाफ मुखर विरोध भी कर रहे हैं। पढ़िये ग्रीनलैंड के सिनेमा के बहाने साम्राज्यवाद के गहराते संकट पर राकेश कबीर का लेख।
वीरेंद्र यादव बनाम ज्वालामुखी यादव
आज सुबह अभी हम इलाहाबाद से आई प्रो राजेंद्र कुमार के न रहने की दुखद खबर से उबरे भी नहीं थे कि लखनऊ से प्रख्यात आलोचक वीरेंद्र यादव के जाने की स्तब्धकारी खबर आई। सहसा भरोसा करना मुश्किल था कि यह कैसे हो सकता है? दो दिन पहले उनके बीमार होने की सूचना मिली थी, लेकिन यह बीमारी इतनी घातक है यह न मालूम था। उनके जाने से बहुत कुछ खाली हो गया. वह गर्मजोशी से भरे बुद्धिजीवी थे जो केवल किताबी आलोचना तक सीमित नहीं थे, बल्कि लगभग सभी समकालीन मुद्दों पर लिखते और बोलते थे और बेलाग बोलते थे। उनके व्यक्तित्व के इन्हीं पहलुओं को छूता प्रख्यात कथाकार मधु कांकरिया की एक छोटी टिप्पणी जो उनके बहत्तरवें जन्मदिन पर चार साल पहले प्रकाशित की गई थी। आज पुनः उनको श्रद्धांजलिस्वरूप प्रकाशित की जा रही है।
भिखारी ठाकुर के अथक राही, अन्वेषक, संपादक और आश्रम के संस्थापक महामंत्री रामदास
रामदास राही के जीवन का सबसे बड़ा हासिल भिखारी ठाकुर थे। उन्होंने आजीवन उनके बारे में खोज की। उनकी बिखरी रचनाओं को इकट्ठा किया, सँजोया और संपादित किया। जिससे भी मिलते उसको भिखारी ठाकुर के बारे में इतनी बातें बताते कि उसके ज्ञान में कुछ न कुछ इजाफ़ा करते। सच तो यह है कि रामदास राही ने जीवन भर भिखारी ठाकुर की पूजा की। अगर वह थोड़े चालाक होते तो भिखारी ठाकुर के नाम पर कोई एनजीओ खड़ा करते और बड़ी गाड़ियों से चलते लेकिन उनका तो सिर्फ इतना सपना था कि किसी तरह भिखारी ठाकुर पर एक किताब और छप जाये। कल यानि 4 दिसंबर को उन्होंने इस संसार को अलविदा कह दिया। बनारस में उनके बहुत प्रिय रहे अध्यापक और कवि दीपक शर्मा उनके यहाँ आने पर गाँव के लोग के दफ़्तर में ले आते। राही जी अद्भुत व्यक्ति थे और उनसे बात करना हमेशा सुखद रहा। उनके प्रयाण पर पेश है दीपक शर्मा का श्रद्धांजलि लेख।
अभिनेता धर्मेन्द्र के प्रयाण पर उनकी फिल्मों पर कुछ बातें
वरिष्ठ कथाकार ज्ञान चतुर्वेदी का उपन्यास बारामासी एक परिवार के बहाने समय के बदलने की भी एक कहानी कहता है। उपन्यास के अंतिम दृश्य में गुच्चन के बेटे के कमरे का दृश्य है जिसमें धर्मेंद्र का एक पोस्टर लगाए लगा हुआ है। वह उस पोस्टर को उखाड़कर फेंक देता है और उसकी जगह एंग्री यंगमैन अमिताभ बच्चन का पोस्टर लगाता है। यह समाज के बदलते ट्रेंड का रूपक है। अब नायकों के चरित्र में व्यवस्था और उसकी संरचना के खिलाफ एक गुस्सा जरूरी है ताकि नई पीढ़ी का मानस उसके साथ तादात्म्य बैठा सके और अपने कर्मों को जायज़ बना सके। धर्मेंद्र ने सत्तर के दशक के आदर्शवादी युवाओं के चरित्र को साकार किया जिसे हम नमक का दारोगा कह सकते हैं लेकिन बदलती अर्थव्यवस्था और सत्ता तंत्र ने अलोपीदीनों की दुनिया में नमक के दरोगाओं को पचा लिया और हर तरह के षडयंत्रों में महारत हासिल कर लिया है जिनसे लड़ने का माद्दा केवल एंग्री यंगमैन में है। ज़ाहिर है समाज और सिनेमा की अन्योन्यश्रित चेतना में धर्मेंद्र की प्रासंगिकता खत्म हो गई थी। पढ़िये अभिनेता धर्मेंद्र को श्रद्धांजलि देते हुये कवि और सिनेमा के अध्येता राकेश कबीर का यह लेख।
जुबीन गर्ग : लोक का दुलारा और अपना कलाकार जिसे भूल पाना असंभव है
जुबीन गर्ग को गए हुए 23 दिन बीत गए हैं। आज भी आसाम के किसी भी हिस्से में चले जाइए, हर तरफ़ बस जुबीन ही मौजूद हैं। उनकी याद में तमाम कार्यक्रम हो रहे हैं और उनको श्रद्धांजलि अर्पित की जा रही है। सोनापुर में उनकी समाधि पर कामाख्या मंदिर के बाद सबसे ज़्यादा लोग इकट्ठा हो रहे हैं और मुझे लगता है कि कुछ महीनों में ही यह एक तीर्थस्थल जैसा बन जाएगा। सचमुच यह प्यार, यह भावना अकल्पनीय है और नेपाल, भूटान तथा बांग्लादेश में भी लोग दर्द में डूबे हुए हैं। हम लोगों ने उनकी याद में पासीघाट, अरुणाचल प्रदेश, में भी पेड़ लगाए और वहाँ के लोगों ने इसमें बढ़कर भाग लिया। स्थानीय लोग तो मानते ही नहीं हैं कि ऐसा हुआ है, कहीं कहीं पोस्टर पर उनकी जन्मतिथि तो लिखी है लेकिन उसके बाद अंतिम तिथि की जगह हमेशा के लिए लिखा है। पढ़िये गुवाहटी से विनय कुमार का आँखों देखा हाल ..
नवयान दर्शन की प्रासंगिकता की पड़ताल करती एक किताब
एकदम सरल, व्यवहारिक, रोचक, किंतु तर्कशील और सकारात्मक अंदाज़ में लिखी रत्नेश कातुलकर की पुस्तक नवयान दर्शन : बुद्ध की शिक्षाओं का आधुनिक विवेचन, बौद्ध धर्म से जुड़ रहे नए पाठकों को धम्म की जानकारी मिलेगी।

