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शिक्षण संस्थानों में होने वाले भेदभाव की वास्तविकता और सिनेमा

क्या शिक्षण संस्थानों में भेदभाव होता है? क्या जातीय आधार पर अध्यापक अपने विद्यार्थियों से भेदभाव करते हैं? क्या सिनेमा में इस भेदभाव को यथार्थ ढंग से चित्रित किया गया है? क्या सुधारात्मक कानून समाज के विभिन्न वर्गों के बीच दूरी बढ़ा देते हैं? यह बहुत जटिल, बड़ा और वर्तमान का सबसे ज्वलंत सवाल है, क्योंकि इस सवाल को देखने और समझने की दृष्टि प्रायः पूर्वाग्रहों से भरी हुई होती है। सामाजिक स्तरीकरण और सामाजिक विभेदीकरण दुनिया के सभी समाजों में पाया जाता है। जाति, धर्म, लिंग, रंग और वर्गीय आधार पर लोगों के साथ भेदभाव करना, पूर्वाग्रहों और थोपी हुई निर्योग्ताओं पर आधारित व्यवहार करते हुए एक निश्चित आबादी को उसके मूलभूत, मानवाधिकारों और अवसरों से वंचित करना सामाजिक भेदभाव कहलाता है। पढ़िए जाने-माने कवि और सिनेमा के अध्येता राकेश कबीर का विश्लेषण जिसमें उन्होंने शिक्षण परिसरों में घटनेवाली घटनाओं के बहाने सिनेमा में उसके चित्रण पर कई सवाल उठाये हैं। 

सिनेमा में ग्रीनलैंड : असाधारण जीवट की कहानियों पर ट्रम्प की लोलुपता की बढ़ती छाया

अमेरिका खुद को विश्व व्यवस्था में लोकतंत्र और शांति-व्यवस्था का संरक्षक मानता है जबकि वास्तविकता इसके उलट है। नब्बे के दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनिया से दो ध्रुवीय व्यवस्था समाप्त हो गई और अमेरिका सबसे बड़ी शक्ति के रूप में उभरा और वहीं से उसकी दादागिरी और बढ़ गयी। अमेरिका और यूरोप के विकसित देशों ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं को अपनाकर एक खुली हुई विश्व व्यवस्था की वकालत की ताकि पूंजी और श्रम का बेरोकटोक प्रवाह हो सके। इस कार्य में विश्व व्यापार संगठन, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। खुली विश्व व्यवस्था का लाभ उठाकर चीन, अमेरिका और कई यूरोपीय देशों ने नव साम्राज्यवाद को बढ़ावा दिया। विकासशील और गरीब देशों के संसाधनों की लूट बढ़ गयी। जिन देशों ने इस लूट में सहयोग नहीं दिया उनके ऊपर वामपंथ, तानाशाही, परमाणु हथियार बनाने का आरोप मढ़कर, प्रायोजित विद्रोह कराकर वहां की शासन व्यवस्था को अस्थिर कर दिया गया। कमजोर और अमेरिकापरस्त लोगों के हाथ में सत्ता देकर अप्रत्यक्ष रूप से अपनी दादागिरी थोप दी गयी। अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, लेबनान, फिलिस्तीन, बांग्लादेश सभी इसके शिकार हो चुके हैं। फिल्म ‘अगेंस्ट द आइस’ दो बहादुर खोजी यात्रियों द्वारा अपने निजी अनुभवों पर लिखी गयी किताब पर आधारित फिल्म थी जिसने ग्रीनलैंड को अमेरका की विस्तारवादी नीति से बचाया था लेकिन एक शताब्दी बाद अमेरिका जैसे साम्राज्यवादी देश यह समझने को तैयार नहीं कि देश जमीन पर बना नक्शा नहीं होता। उसमें लोग भी रहते हैं जो अपने देश और लोगों से प्यार करते हैं और किसी बाहरी देश का कब्ज़ा या हस्तक्षेप नहीं चाहते। सबसे रार ठानकर अमेरिका अकेले नहीं रह सकता। उसके राष्ट्रपति को नहीं पता लेकिन वहां की जनता को पता है, इसलिए यूनाइटेड स्टेट के नागरिक अपने राष्ट्रपति के फैसलों के खिलाफ मुखर विरोध भी कर रहे हैं। पढ़िये ग्रीनलैंड के सिनेमा के बहाने साम्राज्यवाद के गहराते संकट पर राकेश कबीर का लेख।

वीरेंद्र यादव बनाम ज्वालामुखी यादव

आज सुबह अभी हम इलाहाबाद से आई प्रो राजेंद्र कुमार के न रहने की दुखद खबर से उबरे भी नहीं थे कि लखनऊ से प्रख्यात आलोचक वीरेंद्र यादव के जाने की स्तब्धकारी खबर आई। सहसा भरोसा करना मुश्किल था कि यह कैसे हो सकता है? दो दिन पहले उनके बीमार होने की सूचना मिली थी, लेकिन यह बीमारी इतनी घातक है यह न मालूम था। उनके जाने से बहुत कुछ खाली हो गया. वह गर्मजोशी से भरे बुद्धिजीवी थे जो केवल किताबी आलोचना तक सीमित नहीं थे, बल्कि लगभग सभी समकालीन मुद्दों पर लिखते और बोलते थे और बेलाग बोलते थे। उनके व्यक्तित्व के इन्हीं पहलुओं को छूता प्रख्यात कथाकार मधु कांकरिया की एक छोटी टिप्पणी जो उनके बहत्तरवें जन्मदिन पर चार साल पहले प्रकाशित की गई थी। आज पुनः उनको श्रद्धांजलिस्वरूप प्रकाशित की जा रही है।

भिखारी ठाकुर के अथक राही, अन्वेषक, संपादक और आश्रम के संस्थापक महामंत्री रामदास   

रामदास राही के जीवन का सबसे बड़ा हासिल भिखारी ठाकुर थे। उन्होंने आजीवन उनके बारे में खोज की। उनकी बिखरी रचनाओं को इकट्ठा किया, सँजोया और संपादित किया। जिससे भी मिलते उसको भिखारी ठाकुर के बारे में इतनी बातें बताते कि उसके ज्ञान में कुछ न कुछ इजाफ़ा करते। सच तो यह है कि रामदास राही ने जीवन भर भिखारी ठाकुर की पूजा की। अगर वह थोड़े चालाक होते तो भिखारी ठाकुर के नाम पर कोई एनजीओ खड़ा करते और बड़ी गाड़ियों से चलते लेकिन उनका तो सिर्फ इतना सपना था कि किसी तरह भिखारी ठाकुर पर एक किताब और छप जाये। कल यानि 4 दिसंबर को उन्होंने इस संसार को अलविदा कह दिया। बनारस में उनके बहुत प्रिय रहे अध्यापक और कवि दीपक शर्मा उनके यहाँ आने पर गाँव के लोग के दफ़्तर में ले आते। राही जी अद्भुत व्यक्ति थे और उनसे बात करना हमेशा सुखद रहा। उनके प्रयाण पर पेश है दीपक शर्मा का श्रद्धांजलि लेख।

अभिनेता धर्मेन्द्र के प्रयाण पर उनकी फिल्मों पर कुछ बातें

वरिष्ठ कथाकार ज्ञान चतुर्वेदी का उपन्यास बारामासी एक परिवार के बहाने समय के बदलने की भी एक कहानी कहता है। उपन्यास के अंतिम दृश्य में गुच्चन के बेटे के कमरे का दृश्य है जिसमें धर्मेंद्र का एक पोस्टर लगाए लगा हुआ है। वह उस पोस्टर को उखाड़कर फेंक देता है और उसकी जगह एंग्री यंगमैन अमिताभ बच्चन का पोस्टर लगाता है। यह समाज के बदलते ट्रेंड का रूपक है। अब नायकों के चरित्र में व्यवस्था और उसकी संरचना के खिलाफ एक गुस्सा जरूरी है ताकि नई पीढ़ी का मानस उसके साथ तादात्म्य बैठा सके और अपने कर्मों को जायज़ बना सके। धर्मेंद्र ने सत्तर के दशक के आदर्शवादी युवाओं के चरित्र को साकार किया जिसे हम नमक का दारोगा कह सकते हैं लेकिन बदलती अर्थव्यवस्था और सत्ता तंत्र ने अलोपीदीनों की दुनिया में नमक के दरोगाओं को पचा लिया और हर तरह के षडयंत्रों में महारत हासिल कर लिया है जिनसे लड़ने का माद्दा केवल एंग्री यंगमैन में है। ज़ाहिर है समाज और सिनेमा की अन्योन्यश्रित चेतना में धर्मेंद्र की प्रासंगिकता खत्म हो गई थी। पढ़िये अभिनेता धर्मेंद्र को श्रद्धांजलि देते हुये कवि और सिनेमा के अध्येता राकेश कबीर का यह लेख।

वन नेशन, वन इनॉगरेशन

क्या अब भी इसके लिए किसी और सबूत की ज़रूरत है कि मोदी जी के विरोधी ही टुकड़े-टुकड़े गैंग हैं। बताइए! अब ये मोदी...

क्या 50 साल बाद एंग्री यंग मैन बाज़ार का खिलौना बन गया है

अमिताभ बच्चन की फिल्म जंजीर 11 मई, 1973 को रिलीज हुई थी। इस महीने इस 'घटना' को 50 साल हो गए। 'घटना' इसलिए कि...

इतिहास की प्रतिध्वनियों से भविष्य का संधान करता ‘महासम्राट’

विश्वास पाटील मराठी भाषा के लोकप्रिय लेखक हैं, हाल ही में राजकमल प्रकाशन से उनके दो उपन्यास दुड़िया और महासम्राट का पहला खंड झंझावात...

देशभक्ति की चाशनी में रची बॉलीवुड सिनेमा की महिला जासूस और राज़ी

भारत-पाकिस्तान के द्विपक्षीय संबंधों को देखें तो वे कभी भी सामान्य नहीं रहे हैं। संबंधों में तनाव और अविश्वास के कारण गुप्तचर संस्थाओं की अहमियत रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। बॉलीवुड ने दोनों देशों के बीच रणनीतिक मुद्दों को ध्यान में रखते हुए कई जासूसी फिल्में बनाई हैं। यद्यपि फिल्में मनोरंजन, समाजीकरण और सांस्कृतिक तत्वों के प्रसार का सबसे सरल परंतु अत्यंत प्रभावी माध्यम हैं। सिनेमा साहित्य की एक विधा है जो सामाजिक वास्तविकताओं का चित्रण करती है। एक कला माध्यम के रूप में इसमें कल्पना और नई व्याख्याओं का भी सहारा लिया जाता है। फिल्में प्रोपेगण्डा और छवि निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और एक साथ बहुत बड़े दर्शक वर्ग को प्रभावित कर धारणा निर्माण में मदद करती हैं। भारत-पाकिस्तान संबंधों पर बनीं फिल्मों को दर्शक पसंद भी बहुत करते हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में हम सन 2018 में रिलीज हुई फिल्म राज़ी के बारे में आगे चर्चा करेंगे।

आखिरी खत राजेश खन्ना के स्टारडम का पहला पत्र था

राजेश खन्ना के फिल्मों की बात की जाती है तो सामान्य रूप से उनकी पहली फिल्म आखिरी खत का उल्लेख नहीं होता। इसके दो...

कुशीनगर में बुद्ध ने मुझे अलग दुनिया महसूस कराई

जो लोग पचास लोगों से प्रेम करते हैं, उनके पास खुश होने के पचास कारण हैं। जो किसी से प्रेम नहीं करता उसके पास, खुश...
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