Monday, February 16, 2026
Monday, February 16, 2026




Basic Horizontal Scrolling



पूर्वांचल का चेहरा - पूर्वांचल की आवाज़

होमराजनीति

राजनीति

मोहम्मद दीपक : देश में बिगड़ती दोस्ती के हालात में भाईचारा बनाए रखना

लोकतंत्र को एक सांप्रदायिक राष्ट्रवादी देश में बदलने की इस कोशिश के दौरान, उन्होंने खासकर मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ नई-नई भाषाएं और नारे बनाए। अब हालात बहुत खराब हैं। सामाजिक कॉमन सेंस मुसलमानों के खिलाफ नफरत से भरा है और यह दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है। लेकिन हिंदू राष्ट्रवाद के मानने वालों की फैलाई गई नफ़रत की बाढ़ में इंसानियत पूरी तरह खत्म नहीं हो जाएगी। दीपक उन गहरे हिंदू-मुस्लिम रिश्तों का जीता-जागता उदाहरण हैं जो यहां पहले थे लेकिन अब एक अपवाद बन गए हैं।

वेनेज़ुएला पर हमला असभ्य गुंडागिरी की निशानी

दुनिया अच्छे से जानती है कि रूस और यूक्रेन के दरम्यान जंग छेड़ने और नाटो के मसले के पीछे भी अमेरिकी षड्यंत्र है, और फ़लस्तीन के ग़ज़ा में जारी नरसंहार के पीछे भी इजरायल को हासिल अमेरिकी शह है और अब अमेरिकी राष्ट्रपति एक सनकी की तरह व्यवहार करते हुए अपनी सनक में दुनिया को नाभिकीय युद्ध के मुहाने पर ला रहे हैं।

अल्पसंख्यक ईसाइयों की दुर्दशा

यह प्रोपेगेंडा कि ईसाई धर्म परिवर्तन कर रहे हैं, इस पर फिर से विचार करने की ज़रूरत है। ईसाई धर्म भारत में एक पुराना धर्म है, जो 52 ईस्वी में सेंट थॉमस के ज़रिए मालाबार तट पर आया था। यह सामाजिक धारणा कि यह ब्रिटिश शासन के साथ आया, इसका कोई आधार नहीं है। 52 ईस्वी से 2011 तक, जब आखिरी जनगणना हुई थी, जनगणना के आंकड़ों के अनुसार ईसाइयों का प्रतिशत बढ़कर 2.3% हो गया। यह कोई नहीं कह सकता कि कुछ जानबूझकर धर्म परिवर्तन का काम नहीं हुआ होगा।

वंदे मातरम् : पहले परहेज अब मौका देख विवाद खड़ा कर रही संघी ताकतें

सांप्रदायिक धारा अब पूरा वंदे मातरम् गाना लाने की मांग कर रही है, उसने यह गाना कभी नहीं गाया था। यह मुख्य रूप से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की बैठकों में गाया जाता था। वंदे मातरम् का नारा अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वालों ने लगाया था। चूंकि RSS आज़ादी के आंदोलन से दूर रहा और अंग्रेजों की 'बांटो और राज करो' की नीति को जारी रखने में उनकी मदद की, इसलिए उन्होंने यह गाना नहीं गाया और न ही यह नारा लगाया।

सांप्रदायिक राष्ट्रवाद और ‘कर्तव्यों-अधिकारों’ की अवधारणा

जैसे-जैसे भारत में हिंदू राष्ट्रवाद बढ़ रहा है, हमारे राष्ट्रीय आंदोलन और संविधान में मौजूद 'अधिकारों' की अवधारणा को हिंदुत्व की राजनीति द्वारा धीरे-धीरे कमज़ोर किया जाना है। यहीं से नॉन-बायोलॉजिकल नरेंद्र मोदी अधिकारों को कमज़ोर करने और कर्तव्यों को हाईलाइट करने के लक्ष्य को हासिल करने की यात्रा शुरू करते हैं। लॉर्ड मैकाले द्वारा शुरू किए गए डंपिंग एजुकेशन सिस्टम की मांग इसी दिशा में एक छोटी सी कोशिश थी। अब 26 नवंबर को संविधान दिवस पर इसे और साफ़तौर पर कहें तो, 'हाल ही में संविधान दिवस (26 नवंबर, 2025) पर भारतीय नागरिकों को लिखे एक लेटर में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों के लिए अपने आधारभूत कर्तव्यों को पूरा करने के महत्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि इन ड्यूटीज़ को पूरा करना एक मज़बूत डेमोक्रेसी और 2047 के लिए उनके 'विकसित भारत' विज़न की दिशा में देश की तरक्की की नींव है।

विभाजन की विभीषिका के बहाने क्या साधने में लगी है भाजपा

एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों से मुगलों को पहले ही हटा दिया है; आरएसएस ने हिंदुत्व राष्ट्रवाद के अपने दावे को मज़बूत करने के लिए आर्यों को इस भूमि पर प्रथम आगमनकर्ता के रूप में महिमामंडित करने के लिए प्राचीन इतिहास भी प्रस्तुत किया है, क्योंकि आर्य जाति हिंदू राष्ट्रवाद के स्तंभों में से एक है। इस श्रृंखला में नवीनतम भारत के विभाजन का गलत चित्रण है। उन्होंने 'विभाजन विभीषिका दिवस और विभाजन' पर दो मॉड्यूल जारी किए हैं।

मोहन भागवत जो भी कहें लेकिन आरएसएस में कुछ नहीं बदलेगा

भागवत द्वारा विज्ञान भवन में 2018 में दिए गए व्याख्यानों को कितनी महत्ता दी गई थी। उन्हें सुनकर कई नादान राजनैतिक समीक्षकों को यह लगने लगा था कि आरएसएस बदल रहा है। आरएसएस के अंदरूनी मामलों की जानकारी रखने वाले और उससे जुड़े एक सज्जन की टिप्पणी थी  कि आरएसएस ग्लासनोस्त  की प्रक्रिया से गुजर रहा है।  मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। उसके बाद का घटनाक्रम आरएसएस के एजेंडे के मुताबिक विघटनकारी कृत्यों से ही भरा रहा। 

नेहरू के भूत से ही नहीं राहुल गाँधी के वजूद से भी डरते रहे हैं मोदी

नरेंद्र मोदी को प्रधानमत्री बने 11 साल हो गए हैं, इन ग्यारह वर्षों में वह प्रायः अप्रतिरोध्य रहे। हाल के वर्षों में राहुल गांधी को छोड़ दिया जाय तो पक्ष या विपक्ष का कोई भी नेता उन्हें चुनौती देने की स्थिति में नहीं रहा। बावजूद इसके वे बुरी तरह किसी से परेशान रहे तो वह नेहरू-गांधी परिवार है। इस कारण वे विगत ग्यारह वर्षों में समय-समय इस परिवार को लेकर तीखी आलोचना करते हुए अपनी परेशानी जाहिर करते रहे हैं। ताज़ी घटना संसद के मानसून सत्र की है, जिसमें ऑपरेशन सिंदूर पर अपनी बात रखने के क्रम में उन्होंने 14 बार पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का जिक्र किया। उन्होंने अपने 102 मिनटों के भाषण में नेहरू की इतनी गलतियाँ गिनाई कि श्रोता ऊंघने लगे। संसद के बाहर एक जनसभा में उन्होंने कहा कि नेहरू-गांधी परिवार सबसे भ्रष्ट परिवार है। बहरहाल एक बार फिर नेहरू को निशाने पर लेने के बाद राजनीतिक विश्लेषक उन कारणों की खोज में व्यस्त हो गए है , जिन कारणों से वह नेहरु-गांधी परिवार को निशाने पर लेने का कोई अवसर नहीं चूकते।

छत्तीसगढ़ को नफरत की नर्सरी बना रही है भाजपा

अंग्रेजों के समय से आज तक इस देश में ईसाई शैक्षणिक संस्थाएं सेवा और उत्कृष्टता के केंद्र हैं। ईसाई समुदाय, विशेष रूप से ननों और पादरियों ने स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सेवा क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया है। यही कारण है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा सहित संघी गिरोह के कई बड़े नेता, जो आज हिंदुत्व के पुजारी बने हुए हैं, इन्हीं शिक्षा संस्थाओं से पढ़कर निकले हैं और उनका हिंदुत्व की कोई नसबंदी नहीं हुई है। इसलिए ईसाई संस्थाओं पर धर्मांतरण का थोक के भाव में आरोप लगाने का एक ही उद्देश्य है कि उनकी धार्मिक स्वतंत्रता को प्रतिबंधित किया जाए और समाज में सांप्रदायिक विभाजन किया जाए।

एनसीईआरटी : पाठ्यक्रम को साम्प्रदायिक रंग और नफरत को बढ़ावा देने के लिए इतिहास का इस्तेमाल

 राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) वह संस्था है जो स्कूली पाठ्यपुस्तकों की सामग्री के संबंध में अंतिम निर्णय लेती है। पिछले कुछ दशकों से विद्यार्थियों को तार्किक व निष्पक्ष ढंग से हमारे अतीत के बारे में ज्ञान देने की बजाए इसकी किताबें साम्प्रदायिक नजरिया पेश करने का जरिया बन गई हैं। चूंकि इतिहास युवा दिमागों की समझ को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, इसलिए पाठ्यक्रम को साम्प्रदायिक रंग देने से विभिन्न तरीकों से पहले ही बेगाने बना दिए गए समुदाय (मुसलमानों) के प्रति मौजूदा नफरत और बढ़ेगी।

जन सुरक्षा अधिनियम के मुद्दे पर महाराष्ट्र में विपक्ष की नीयत साफ क्यों नहीं है?

अब वर्तमान महाराष्ट्र सरकार ने जन सुरक्षा अधिनियम  के नाम से विधानसभा और विधान परिषद दोनों सदनों में विधेयक पारित कर दिया है। विधानसभा के एकमात्र कम्युनिस्ट सदस्य को छोड़कर सभी दलों के विधायकों ने इस विधेयक को दोनों सदनों में पारित करने के लिए अपनी सहमति दे दी है। लेकिन उद्धव ठाकरे राज्यपाल से इस पर हस्ताक्षर न करने का अनुरोध करने वाले हैं। तब सवाल उठता है कि उद्धव ठाकरे, शरद पवार और मंच पर लगातार संविधान की प्रतियाँ लहरा रहे कांग्रेस विधायकों ने दोनों सदनों में इस विधेयक को पारित करने के लिए वोट क्यों दिया? और अब राज्यपाल से इस पर हस्ताक्षर न करने के लिए कहना कैसी राजनीति है?
Bollywood Lifestyle and Entertainment